गैंग गिरोहबन्द सियासत में गैंगबार के आसार


गोलबन्दी को मजबूत करते सियासी सरगना 

खबरियो पर टिका भबिष्य का आधार 

वीरेन्द्र शर्मा 


2 दिसम्बर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है किसी भी लोकतंत्र का सियासी आधार भले ही वैचारिक होने के साथ संगठनात्मक हो और जबाबदेही भी सामूहिक हो मगर कहते है परिबर्तन ही प्रकृति का नियम है सो अगर अब लोकतांत्रिक सियासत का आधार गैंग गिरोहबन्दी की ओर अग्रसर है तो इसमे किसी को कोई संदेह या अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । शब्दो का उल्लेख अप्रिय हो सकता है मगर सियासत का सच अब यही शेष दिख रहा है । जहां नीति मूल्य सिद्धांतो से इतर सियासी शक्ति हासिल करने वह सब कुछ देखने सुनने में आता है जो समृद्ध सियासत मे मनाही है मगर अपने अपने अस्तित्व को भयाग्रस्त सियासी लोगो की मजबूरी यह है कि वह सियासी जीवन मे कोई रिस्क नही लेना चाहते जिससे उनके भबिष्य को कोई खतरा हो उनकी सियासत को कोई जोखिम हो इसलिये यश मेन से लेकर ऐसे लोगो को सियासत में अधिक तरजीह मिल रही है जो धन जन बल जुटाने मे अधिक सक्षम और कारागार हो जिनके पास ऐड़ी से लेकर चोटी तक की खबर रखने बालो का नेटवर्क हो फिर भले ही उनकी सेवा कल्याण कोई आस्था हो या न हो उनके आदर्श सिद्धांत जो भी हो ऐसे लोगो की आस्था सर्बकल्याण से इतर भले स्व कल्याण मे हो उसके दूरगामी परिणाम सार्बजनिक जीवन के लिये कितने ही घातक हो मगर उनके शक्ति का केन्द्र को कोई खतरा न हो परिणाम की एक समृद्ध समाज मुफलिसी कंगाली का साक्षी बन रहा है बहर हाॅल सच्चाई के कई पैमाने हो सकते है मगर कटु सच यह है कि बर्षो के सत्ता भोगी या सियासत मे अश्वमेद्य की मंशा लिये ध्वजपताखा लहराने बाले यह बताने यह तैयार नही कि उनके सार्बजनिक जीवन की ऐसी कौनसी उपलब्धि अंकित की जाये जिस पर मानव जीवन गर्व कर मानव के रूप में स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सके । और समाज सियासत को वह दिशा मिल सके जिसका मार्ग समृद्धि की ओर जाता हो । डाटने बांटने समेटने के खेल मे तब्दील सियासत को कया पता कि जीवन आज किस मुकाम पर खड़ा है । मगर कहते है जब मानव किसी बड़े परिवर्तन मे असफल अक्षम सिद्ध हो जाता है तो फिर नियती बदलाब करती है और अब लगता है कि नियती का यह बदलाव ही है कि सियासत मे स्व स्वार्थो को सिद्ध करने जो गैंग गिरोह बन्दी चल रही है अब उसमे सियासी गैंगबार के आसार प्रबल है । तो सड़क पर वह भले ही अभी सार्बजनिक न हो मगर उसका असर सियासत मे स्पष्ट नजर आता है आम जीवन की चिन्ता यह नही की उसे कैसा भबिष्य मिलने बाला उसकी चिन्ता यह है कि लोकतंत्र का आधार कैसै बचने बाला है । क्योकि जब भी कोई संगठन के बुर्ज दरकते है तो वह निश्चित ही उस अदृश्य गैंग गिरोहबन्द सियासत के पदचिन्ह छोड़ जाते है जिसे सियासत में दखल रखने बाले बखूबी समझते है मगर कोई इस सियासी खेल की समझ से अछूता है तो यह जीवन की बड़ी न समझी ही कही जायेगी देखना होगा कि अब वह दिन लोकतंत्र मे आस्था रखने बालो कब देखने मिलेगा जो इस बात कि पुष्टि करे कि अब वैचारिक ही नही संगठनात्मक सियासी आधार भी इसके शिकार हो रहै है शायद आज की सियासत के लिये यह उचित न कहा जाये क्योकि बड़े बर्षो बात इस समाज को एक बड़ा अवसर और अच्छे नेतृत्व मयस्सर हुये है । अगर यह मौका भी जाता रहा तो यह जीवन की बड़ी बिडंबना ही मानी जायेगी ।  


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