बदले परिवेश में पत्रिकारिता , कलंकित होती कीर्ति
बिमुख निष्ठा से तार तार होते सरोकार
वीरेन्द्र शर्मा
20 दिसंबर 21 शिवपुरी
कहावत तो ये थी कि गोली और बोली का इस्तमाल सोच समझकर करना चाहिए इसी तरह लेखन भी पूरी समझबूझ और तथ्यो के आधार पर होना चाहिए । क्योकि किसी भी व्यवस्था मे यह वह कारगार हथियार है जो लक्ष्य भेद कर ही दम लेता है मगर इस अस्त्र का उपयोग किसी भी व्यवस्था मे समृद्ध समाज और जीवन के लिये होता रहा है जिसके लिये इसे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ भी कहा गया मगर आज जिस तरह से इस विद्या का स्व या सामूहिक स्वार्थ के लिये हो रहा है वह शर्मनाक ही कहा जायेगा । अब इसके पीछे के कारण जो भी हो मगर कीर्ति को कलंकित करने का जो कांरबा चल पढ़ा है वह कहां जाकर थमेगा फिलहाॅल कह पाना मुश्किल है आज कल तथ्यो से परे जिस तरह से साॅसल मीडिया को माध्ययम बना समाज या समाज के अंग या फिर संस्थाओ कि बखिया उधेड़ हुनर चमकाने का दौर नामचीन माध्यमो मे चल पढ़ा हे अगर कुछ दिन और ऐसे चलता रहा तो विश्वास खोती समाज मे सम्मानित बिरादरी कब पहचान के अधंकार मे समा जायेगी शायद ही किसी भान हो क्योकि विजय रथ पर सबार सम्राट बनने का जो सपना भाई लोगो ने सजा रखा है वह यह भूल रहै है कि इस पवित्र हुनर को समाज मे ससम्मान स्थापित करने मे कितनी पीढ़िया डूब गयी मगर अफसोस कि कोई भी सीख लेने तैयार नही आज जिस तरह निष्ठा जिनके लिये होती है अगर वही सरेयाम चीरहरण पर उतारू हो जाये तो फिर शिकायत कैसी ? आज यही सबसे बड़ा यक्ष सबाल हर उस जबाबदेह के मन मे रहता है जो स्वयं के जीवन के साथ समाज को भी उत्तरदायी देखना चाहता है ।
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