सर्बकल्याण का अवसर गबांते सामर्थ पुरूषार्थ , बांझ होती कीर्ति


बर्तमान में डूबे भूत , भबिष्य के आगे विकट संकट 

अहंम अहंकार के आगे कलंकित होती मानवता 

व्ही. एस. भुल्ले 


7 दिसंम्बर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

किसी गीतकार विद्या विद्यवान ने सच ही लिखा है और किसी महापुरूष ने बखूबी गाया भी गाया भी है । विद्यना तेरे लेख निराले समझ न आते है । युग युग के साथी बिछड़े जाते है । हालाकि यह भावार्थ उन लोगो के कतई श्रावण योग्य या पठनीय नही हो सकते है जिनकी आस्था स्व कल्याण मे सर्बोपरि हो जो मानव जीवन में भय ग्रस्त हो , जिनके जीवन की समृद्धि का आधार सिर्फ और सिर्फ अत्यअधिक संग्रहण या समुचि जीवन व्यवस्था स्व संचालित कर समझ अनुसार कल्याण सेवा का भाव हो जो सृजन मे स्वयं की भूमिका सिर्फ स्वयं के सामथ्र्य से प्राप्त उस शक्ति संसाधनो को स्वयं के पुरूषार्थ का परिषाद मान भोगना और बांटना में विश्वास रखता है जबकि इतिहास भरा पढ़ा है ऐसे उदाहरणो से ऐसा लोग ने पूर्व मे किया और सोचा भी मगर बर्तमान इस बात का प्रमाण है कि ऐसे लोगो के नाम तो सुबिधा अनुसार लेने बाले है मगर पानी देने बाले उनकी कीर्ति को जिन्दा रखने बाले शायद ही मौजूद हो जिन लोगो ने भी मानव रूप मे बर्तमान को जी भर कर मनमाफिक ढंग से जिया और लोगो को अपने सामथ्र्य अनुसार प्रेरित किया या थोपा वह कितना सफल सक्षम रहा इस बात के प्रमाण भी है । आज वह लोग भी मौजूद है जिन्होने या तो पूर्व मे प्रयास किये या बर्तमान कर स्व सिद्ध होना चाहते माध्ययम जो भी हो मगर सच सिर्फ और सिर्फ सर्बकल्याण में ही निहित होती है । मगर अवसर गबां चुके या अवसर गबांते उन मानव जीवनो को कौन समझाये उन सामर्थ , पुरूषार्थो को कौन समझाये की बांझ कीर्ति से जीवन की कृतज्ञता सिद्ध नही होती न ही वह न ही उन संस्कारो का जन्म हो पाता जो सृजन के सारथी बन समृद्ध संस्कृति को सिद्ध कर सके । किसी भी मानव जीवन का सबसेे बड़ा दुख और सुख सृजन मे उसके कर्तव्य के प्रति निष्ठा मे निहित होता है । आज भी जिस तरह से अहंम अहंकार मे डूबी मानवता कलंकित है वह पूर्व में भी रही है जिसके दुस्परिणाम आज इतिहास है । जो संकट आज बर्तमान के मददेनजर भूत और भबिष्य के सामने है । हो सकता है वह सामथ्र्य पुरूषार्थ का बर्तमान मे आधार न हो मगर भूत , बर्तमान से स्वयं की अनभिज्ञता वह सिद्ध कर या भी भबिष्य मे संभव नही । जो उस कीर्ति का बांझ सिद्ध करने साक्षी होगी । जितने भी सिद्ध पुरूष आज संज्ञान मे है उन्होने अपने जीवन की सिद्धता सिद्ध करने बर्षो नही घन्टो मिनिटो या र्निधारित समय विद्यि मे ही सिद्ध किया है । और सेकड़ो हजारो बर्ष बाद भी उनकी कीर्ति को सराहा जाता है उन्है ससम्मान याद किया जाता है । क्योकि उन्होने मानव जीवन मिले उस अवसर का सर्बकल्याण मे पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन किया अगर यो कहै कि जिन्होने पूर्व या बर्तमान मे कर रहै है । उसे मानवता देख रही है आज भी उसकी आशा आकांक्षा का आधार वही है । मगर अफसोस नव सोच संस्कृति मे डूबे सामर्थ पुरूषार्थ विज्ञ होने के बाबजूद स्वयं अनभिज्ञ सिद्ध कर स्वकल्याण के मार्ग पर अग्रसर है कहते है सब कुछ उदय अस्त हो सकता , जो सृजन मे मौजूद है अगर कोई अस्त उदय नही होता तो वह है सर्बकल्याण मे किया गया कर्म और वह कीर्ति जो मानव जीवन मे स्वयं के सामथ्र्य पुरूषार्थ से प्राप्त कर उसे सिद्ध करता है । निश्चित ही अनादिकाल से ऐसी बातो का अर्थ उन लोगो को कतई बिचलित नही कर सका जो सृजन , सर्बकल्याण के भाव से अनभिज्ञ है और मानव कीर्ति से बांझ रहै है । मगर नव उर्जा मे सृजन संस्कारो का संचार हो और वह उर्जा उत्पादन , संग्रहण , निस्पादन के सिद्धांत से वह विज्ञ हो मानव रूप मे वह अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर जीवन के उस मूल आधार को सिद्ध करने मे सक्षम हो सके जो हम भारत बर्ष के लोगो श्रेष्ठतम होने का आधार रहा है जितनी जल्द हम इस सच के साक्षी होगे वही समृद्ध भबिष्य का सारर्थी सिद्ध होगा । जय स्वराज । 


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