अस्तित्व से जूझता आधार , अस्थांचल की ओर वैचारिक आस्था आकांक्षा
कैडर बैस दल मे बढ़ता घमासान
वीरेन्द्र शर्मा
9 दिसम्बर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
जिन दलो मे पानी पानी पी पी कर मंच सभाओ में कार्यकर्ता सर्वोच्य , संगठन सर्वोच्य के नारे बुलंद किये जाते है ऐसे ही दलो में आजकल अस्तित्व आधार को लेकर जबरदस्त घमासान छिड़ा है ये अलग बात है कि इसकी आहट भले ही किसी हो या न हो मगर इतना तो तय है कि सुनामी से पहले जो शांति ऐसे दलो मे नजर आ रही है वह बढ़ी ही डराने बाली है । क्योकि जिस लोकतांत्रिक आधार पर आज जिन दलो का अस्तित्व है शायद वह आधार आतंरिेक अस्तित्व आधार के संकट से जूझ रहै है । लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर दलो की शोभा बढते पद सौपान जिस तरह से बढ़ दशा और दिशा तय करने में लगे है । या फिर कृपा से प्राप्त पद कार्यकर्ता की उपेक्षा कर रहै है उससे आशा आकांक्षा भले ही मायूस हो मगर उनका वैचारिक आधार अभी भी उनकी बैढ़िया बन उन्है वह सब कुछ करने से रोक देते है जिसके लिये आज सियासत खूखार मानी जाती है । अगर यो कहै कि म.प्र. देश का एक ऐसा प्रदेश है जहां लम्बे अर्से से दो ही दलो का बोलबाला रहा है मगर इस दंश से एक भी अछूता नही मगर सबसे बढ़ी चिन्ता तो उस कैडर बैस दल के लिये है जहां पद सौपान पर तो नाम बदल जाता है मगर योग्यता के आधार पर अवसर का आम कार्यकर्ता को न मिलना सबसे बढ़ा असंतोस का कारण बन रहा है । जिसके पीछे मूल रूप से दलो के अन्दर बढ़ रही क्ष़त्रप प्रथा है जो अपने अपने चैलो को या परिजनो को ही आगे बड़ते देखना चाहते है परिणाम कि कई जिले मे जिला सदरो को बर्षो पदभार सम्हालने के बाद वह अपनी कार्यकार्यणी की घोषणा तक नही कर सके न ही नई टीम मे नये नैतृत्वो को मौका दे सके जिससे आम कार्यकर्ता मे असंतोस का भाव हो स्वभाविक है । भले ही वह अनुशासन से बंधे हो अगर हम ग्वालियर चंबल से लेकर मालवा , बघेल , बुदेलखंड की बात करे तो सभी दूर एक जैसा ही आलम है । मगर मुख्य नेतृत्व का इस पर संज्ञान न लेना आम कार्यकर्ता के लिये हतास निराश होने का बड़ा कारण है कई जगह दलो के प्रशिक्षण वर्ग , प्रशिक्षण शिविर हो रहै अगर कुछ नही हो रहा तो वह आम कार्यकर्ता को सामथ्र्य अनुसार पुरूषार्थ प्रदर्शन के अवसरो का मौका । बहरहाॅल जो भी हो जिस तरह से आज आम आशा अकांक्षा सुरसा की तरह मुॅह वाये खड़ी है अगर जल्द इनका निदान न खोजा गया तो वह दिन दूर नही जब कैडर या वैचारिक आधार मौजूद सियासत के रथ पर सबार महात्कांक्षाओ की ध्वजा फेहराने मजबूर हो जो सियासत के लिये उचित नही कहा जा सकता । अब विचार उन दलो को करना है जिन्है अपने अस्तित्व पर गर्व है और जो सर्बकल्याण मे अपने वैचारिक आधार की कीर्ति स्थापित करना चाहते है ।
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