विधान से इतर सड़क पर समाधान की ओर बढ़ता लोकतंत्र

 

बढ़े अस्त्र के रूप मे उभरता निष्ठा में व्यावधान 

हको की जंग मे हाफनी भरता लोक - तंत्र 

वीरेन्द्र शर्मा 


16 दिसंबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

यू तो किसी भी सेवा का पहला चरण उस सफत से शुरू होता है जो सौपे गये कार्य के प्रति निष्ठा समर्पण को ज्ञात कराती है और उसे निमित का धर्म ठहराती है फिर बात है उसे पवित्र विधान की जिसे सेवा लेने या देने बाले दोनो अंगीकार करते है जिसके निपटान के लिये तमाम संस्थाये है मगर कुछ दिनो से हको के नाम जिस तरह से लोक और तंत्र दोनो हाफिनी भरने पर मजबूर है उसने जीवन का ककहरा ही बदल दिया अगर दुर्घटना हो जाये तो जाम हड़ताल अगर बिबाद हो जाये तो जाम हड़ताल अर्थात मौजूदा गतिविधि यह बताती है कि न तो कानून का अब कोई काम रह गया न ही उस विधान का जिसको अंगीकार कर लोग हक हुकूको का कबच पहन जनभावनाओ को उस सेवा कल्याण को लहुलुहान करने से नही चूक रहै जो शफत उन्है सेवा मे आने से पूर्व दिलायी जाती है । फिर चाहै वह शासकीय सेवाओ से जुड़ी सेवाये हो या स्वास्थ , सुबिधा से जुड़ी सेवाये अब तो ऐसे ऐसे महकमो मे भी हड़ताल के अचूक अस्त्र पैर पसार रहै है जो सेवा के दाम लेते है और जिनके कार्य अतिसंवेदन शील सेवाओ मे आते है । मगर इस दर्द की परवाह न तो भोगने बालो को है न ही सेवा कल्याण का भाग समझने बाले उन संस्थानो को जिनके कंधो पर यह भार है मगर यह किसी भी जबाबदेह व्यवस्था सत्ता सियासतो के लिये भी उचित नही जो सिर्फ और सिर्फ भोग को ही अपना दायित्व कर्तव्य समझ बैठे है और न ही यह उन लोगो के लिये जो बात बात पर चक्का जाम हड़ताल कर विधि से इतर सड़क पर न्याय पाने की असफल कोसिश करते है अगर इसी तरह विश्वास टूटता रहा तो वह दिन दूर नही जब कानून और विधान दोनो शून्य नजर आये इसलिये विधि विधान ही वह मार्ग हैेेेेेेेेेेेेेेेेेे जिससे जीवन को जबाबदेह बनाया जा सकता है । 

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