जीवन में सत्य की स्वीकार्यता शर्म नही गर्व का बिषय 

संयम ही हो सकता है समृद्ध जीवन का आधार 

अल्प समय में अकूत धर्नाजन बड़ी बाधा 


दिशा विहीन पुरूषार्थ कभी कल्याणकारी नही रहा 

व्ही. एस. भुल्ले 

20 जनवरी 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है जीवन में सत्य कि स्वीकार्यता पर शर्म नही गर्व होना चाहिए क्योकि जीवन में संयम ही समृद्ध जीवन का आधार हो सकता न कि अल्पसमय में अकूत धनार्जन की प्रवृति जो समृद्ध जीवन के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है । और न ही दिशा विहीन पुरूषार्थ कभी सर्बकल्याण मे सार्थक सिद्ध रहा है मगर इन बिषयो पर जिस तरह से मानव जीवन में कर्तव्य विमुखता देखी जा रही है वह बड़ा चिन्ता का विषय है जिस विचार होना आज के मानव जीवन मे अतिआवश्यक है क्योकि मानव जीवन जिस तरह से धर्म मत पंथ , जाति क्षैत्र या विचारो के नाम आक्रमक देखा जा रहा है वह किसी के भी हित मे नही मानव का यह आचरण व्यवहार न तो उनके हित मे है जो स्व कल्याण के लिये समूहबन्द हो या व्यक्तिगत तौर पर हवा दे स्वयं के हित साधना चाहते है या साध रहै है और न ही उस मानव समूह या मानव जीवन के हित मे है जिनके कल्याण सेवा के नाम यह प्रवृति पनप रही है जो आज सत्ता मे है या शासन का भाग है वह या जो सत्ता सीन होने की आस में है । यह हर व्यक्ति , मानव , या मानव समूहो को नही भूलना चाहिए कि सत्य हमेशा सत्य रहा है और आज कल तथा भबिष्य मे भी रहैगा जिसमे किसी को संदेह नही होना चाहिए । जब तक स्वयं मानव , मानव समूह इनके संरक्षक , सेवक संयम के सिद्धांत अर्थात अनुशासन के सिद्धान्त का पालन कर अपनी कर्तव्य निष्ठा सिद्ध नही करेगे तब तक असंयमित जीवन , अकूत धनार्जन की प्रवृति से समृद्ध खुशहाॅल जीवन का सपना कभी पूरा होने बाला नही । आयदिन सेवा कल्याण या सर्बकल्याण , मानव जीवन को सहज खुशहाॅल बनाने सत्ताओ सेकड़ो हजारो कानून , सेवा भावी योजनाओ के लिये निर्णय कानून नियम बनाये जाते और बर्षो से बनाये जा रहै है मगर उन नियमो कानून की अनुभूति से अनभिज्ञ मानव जीवन आज भी बिलख रहा है । जहां सत्ता हासिल के जोड़ अजमाये जा रहै है वहा भी संयम अनुशासन का अभाव यह सिद्ध करने काॅफी है कि सत्ता जिसकी भी बने मगर जीवन समृद्ध होने बाला नही कहते है जैसा बौया जायेगा बैसा ही काटना होगा । मगर इस बीच लोकशाही मे मानव के अपने मुख्य कर्तव्य से विमुखता उसका आपसी विखंण्डन इस बात का प्रमाण है कि दिशा भ्रमित पुरूषार्थ मानव जीवन में कितना बिघटनकारी हो सकता है ऐसे सामथ्र्य और सामथ्र्यशालियो को चाहिए कि अगर उनका ध्यैय वाक्य मे सर्बकल्याण है मानव जीवन की समृद्धि और जीवन मे संयम अनुशासन है तो उन्है पुरूषार्थ करते वक्त इस बात पर कतई विचार नही करना चाहिए कि परिणाम क्या होगे उन्है सिर्फ सर्बकल्याण में सामथ्र्य अनुसार सत्य को साक्षी मान पूरे सामथ्र्य मनोयोग से व्यक्तिगत या समूहबन्द हो मानव जीवन की उस अन्तरआत्मा को जगाना चाहिए जो स्वंस्वार्थो के चलते सोई हुई है । लोगो को बताना चाहिए कि जीवन मे संयम ही वह सबसे बड़ी दौलत है जो समृद्ध खुशहाॅल जीवन दे सकती है न कि अकूत धनार्जन और स्व कल्याण के बंधन जिनकी चकाचैंध मे स्वस्वार्थ मे डूबे लोग या समूह जीवन की समृद्धि लूट स्वयं को समृद्ध बनना चाहते है । समय की नजाकत है कि आजादी के 70 बर्ष बाद तो सूचना क्रान्ति के दौर मे हम सत्य पर विचार करे और ढूढ़ ढूढ़कर ऐसे लोगो को सत्तासौपानो तक पहुॅचने से रोके जिनके पास न तो संयम , अनुशासन है न ही सर्बकल्याण का भाव आखिर इस महान भारतबर्ष के उत्तराधिकारी , आने बाला भबिष्य और कब तक समृद्ध , खुशहाॅल जीवन और सर्बकल्याण के नाम छले जाते रहैगै । जय स्वराज । 

 

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