सत्ता लालसा में हदे तोड़ती सियासत
स्थापित मान्यताये शेष न रही तो सत्ता , सियासत के मार्ग भी सुरक्षित नही रह पायेंगे
लोकतंत्र की कमजोरी का लाभ उठाते कर्तव्य बिमुख लोग
व्ही. एस. भुल्ले
22 जनवरी 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
लोकतंत्र की कमजोरी का लाभ उठा कर्तव्य बिमुख लोग जिस तरह से वोट की बैबसी की आढ़ में जिस तरह से अपना अपना इकबाल बुलन्द कर सत्ता तक पहुॅचना या सतत सत्ता में बने रहना चाहते है उन्है यह समझना होगा कि अगर स्थापित मान्यताये शेष न रही तो सत्ता सियासत के मार्ग भी सुरक्षित नही रह पायेगे । क्योकि जिस तरह से सियासत सत्ता के लिये हदे तोड़ने तैयार है उससे किसी का भी भला होेने बाला नही है । फिर वह सेवा कल्याण की आढ़ मे स्थापित मान्यताये तोड़ने का सबाल हो या फिर सत्ता हथियाने के नाम सिद्धान्त तोड़ने का सबाल हो बल्कि होना तो यह चाहिए था कि सत्ता में रहने बाले या सत्ता तक पहुॅचने ऐड़ी चोटी का जोर लगाने बाले उन बिषयो पर विचार करते उन्है लागू करने पुरूषार्थ करते जिससे सर्बकल्याण ही नही सभी का भला और सभी का जीवन समृद्ध होने का मार्ग प्रस्त होता मगर दुर्भाग्य आजादी के 70 बर्ष बाद भी ऐसा नही हो सका न ही कोई आज तक ऐसी कोई रूपरेखा प्रस्तुत कर सका जिससे बिगड़े ढर्रे को सुधार एक ऐसा मार्ग तैयार होता जिससे मानव के मान सम्मान के साथ उसका स्वाभिमान सुरक्षित हो पाता इतना ही नही मौजूद बौद्धिक , प्राकृतिक संपदा के सृजनात्मक दौहन से लोगो जीवन समृद्ध खुशहाॅल बन पाता और यह तभी संभव था जब सत्तासीन लोग लोकतंत्र का सम्मान करते हुये अपनी अपनी हदो मे रहते हुये अपने अपने कर्तव्यो का निष्ठा पूर्वक निर्वहन करते ऐसी नीतियो नियम कानून का निर्माण करते जिससे हमारी लुट पिट चुकी संपदा के वह मार्ग खोजे जा सके जिसके लिये इस महान भूभाग को जाना जाता रहा है जो हम समृद्ध शालियो की विरासत भी है और हमारी पहचान भी इससे बढ़ी दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि हम आज तक अपनी अहम मशीनरी क्रीमिलेयर तंत्र को ही अपनी विरासत , बर्तमान आवश्कताओ के अनुकूल प्रशिक्षित कर उनका योगदान अपने समाज राष्ट्र् के हित मे नही कर पाये परिणाम कि हम आज भी ब्रितानियां हुकूमत के अनुकूल हमारा सिस्टम आज भी हमारे अनुकूल नही बन पाया उस पर से वोट की बैबसी के साथ ढोते सत्ता सिहासन पर आसीन लोग उन्है संरक्षित नही रख पाये जिन्है लोकतंत्र की रीढ़ और वह तंत्र कहा जाता है जो किसी भी निर्मित वैधानिक रीति नीति का पालन करने मे शासन के अंग के रूप मे अपना निष्ठापूर्वक कर्तव्य निर्वहन करते है । परिणाम न तो हम उस तंत्र को ही लोकशाही के अनुरूप ढाल पाये और न ही मौजूद सियासत को वोट की बैबसी से निजात पाने का कोई मार्ग ढूढ़ पाये । अगर आज सियासत हदे तोड़ने उतारू है तो इसके लिये सीधे सीधे वह सियासत और वह सत्ता ही दोषी है जो सत्ता के लिये सियासत कर सेवा कल्याण के नाम स्वयं का इकबाल बुलंद करना चाहते है । और फ्री फ्री की सियासत से सत्ता तक पहुॅच या सत्ता मे रह स्थापित मान्यताओ की कीर्ति को कलंकित करना चाहते है । बैहतर हो समय रहते इस समस्या पर विचार हो और जो लोग निस्वार्थभाव से सर्बकल्याण के कार्य मे सत्ता सियासत में जुटे हो उनका मार्ग प्रस्त करने में अपना योेगदान दे । जय स्वराज ।
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