सत्ता लूट में समय गबांते जीवन सरोकार
सियासी सूत्रो से सहमी सियासत
भययुक्त व्यक्ति , परिवार , समाज , सियासत , सत्ताओ की भयाभय स्थति
समय और स्वकल्याण के आगे दम तोड़ता सर्बकल्याण
व्ही. एस. भुल्ले
29 जनवरी 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
कहते है सर्बकल्याण मे ईश्वर की श्रेष्ठत्तम कृति के रूप मे प्राप्त अमूल्य मानव जीवन के वह बहुमूल्य भाग बचपन युवा यौवन और अपने उत्र्तराध को गलाने बाले उन महामानवो उनकी भव्य दिव्य कीर्ति जो उन्होने अपनी त्याग तपस्या सामथ्र्य पुरूषार्थ के बल स्थापित की ऐसी भव्य दिव्य विरासत को उनकी आने बाली पीढ़ी इस तरह कभी कलंकित शर्मसार करेगी उन्होने सपने में भी न सोचा होगा । जिस सामथ्र्य पुरूषार्थ कीर्ति पर गर्व कर मानव स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सकता था क्या वह इतनी क्रूर , निर्दयीे , और हिसंक हो सकती है जिसे दया , प्रेम , त्याग , अहिंसा , शांति सर्बकल्याण की घुटटी पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कारिक तौर पर पिलाई गयी हो । आज भी मानवता को जिन्दा रखने मानव के रूप मे मौजूद जीवन न जाने कितने दिवस , रीति , नीति , त्यौहार मनाते है मगर मानव जीवन मे संस्कारिक तौर पर मानव जीवन आज उनका कितना पालन कर रहा है कितने व्यक्ति , परिवार , समाज , सियासत , सत्ताये इन महान संस्कारो के प्रति समर्पित नजर आती है बर्तमान दौर मे मौजूद मानव का आचार व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि स्वकल्याण मे डूबा मानव का वह बढ़ा भाग उस महान संस्कृति , संस्कार से भिग्य या अनभिज्ञ रह कलंकित नजर आता है जो किसी भी सभ्य समाज के लिये खुशी या गर्व करने की बात नही हो सकती । जिस तरह से समृद्ध खुशहाॅल जीवन का आधार बांझ और मानव के रूप मे मौजूद जीवन की श्रेष्ठतम कृति कलंकित हो रही है । और जिस संषर्ष के मार्ग पर सर्बकल्याण दौड़ रहा है उससे सिर्फ अशांति या फिर कुसंस्कृति का ही मार्ग प्रस्त होगा न कि सर्बकल्याण और समृद्ध जीवन का , सही मायने मे देखा जाये तो आज भयग्रस्त व्यक्ति , समाज , सियासत , सत्ताओ की जो भयाभय स्थति है उसमे जहां विश्वास बांझ तो आत्मा वैवा नजर आती है । आज ही नही अनादि काल से जिस तरह से सत्ता की लूट या सर्बकल्याण का भाव रहा उनके प्रमाण भी आज हमारे सामने है मगर जिस तरह से अब सत्ता हासिल करने नये नये सूत्र इजात हो रहै वह बढ़े ही डराने बाले है । ऐसे मे समय और स्वकल्याण के भवर मे फसे सर्बकल्याण के लिये पुरूषार्थ कौन करे समृद्ध जीवन के लिये त्याग कौन करे सबाल बड़े है मगर समय की जरूरत भी आज हमारे सामने 45 और 17 बर्षो तक की हमारी सत्ताओ के प्रमाण हमारे सामने है और लगभग 600 से 200 बर्षो की सत्ताओ सत्य असत्य कहावत इतिहास हमारे सामने है ये सही है स्वकल्याण की होड़ हमे भ्रमित कर सकती है मगर सामथ्र्यविहीन नही क्योकि समय के साथ नैसर्गिक दण्ड का विधान है जिससे मानव का बच पाना असंभव ही नही नमुमकिन है । अगर किसी धन संपदा ऐश्वर्य को भोगने का अकल्पनीय प्रावधान है तो अनिति से प्राप्त वह पाप भोगने का प्रावधान भी किवदंतियो मे अवश्य होगा । सच क्या है इसका एहसास अनुभूति तो समय ही समय से करा सकता है और कर्म का आधार मानव जीवन को मुक्ति इसलिये सृजन मे सृष्टि मे सर्बकल्याण मे किये त्याग कर्म मान्यता जीवन मे रही है फैसला अब हमे करना है कि जीवन की इस अमूल्य कीर्ति का सदउपयोग हमे कैसै करना है । जय स्वराज ।
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