अपारदर्शिता का शिकार नई आबकारी नीति

 

न तो उपभोक्ता का ख्याल न ही संसाधनो का ध्यान 

लगभग 40,000 करोड़ के व्यवसाय और 15000 करोड़ के राजस्वदाताओ से बैरूखी

वीरेन्द्र शर्मा 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

मद्यपान या मद्यनिषेध की सच्चाई की म.प्र. में जो भी हो , और समुचे प्रदेश में रोजगार के लाले मगर इस बीच लगभग 40,000 करोड़ के शराब व्यवसाय से संभावित 15000 के राजस्व में कटौती कर राहत कि बात हुई हो मगर नई आबकारी नीति का मजमून जानने बालो का कहना है कि यह तो अपारदर्शी नीति है जिसमे पारदर्शिता अहम विषय से नदारद नजर आती है फिर चाहै वह उपभोक्ता संरक्षण की बात हो या फिर मौजूद संसाधनो की बात हो । जब सरकार के लिये मद्यनिषेध को नकार राजस्व अहम हो तो फिर मुॅह माॅगे दाम चुकाने बाले उपभोक्ता के संरक्षण की बात न हो तो उन उपभोक्ताओ के साथ अन्याय ही माना जायेगा जो अपने गाड़े पसीने की कमाई स्वयं के स्वास्थ को दांव पर लगा सरकार को इतना मौटा राजस्व देता है जिसे सामाजिक तानो के साथ दण्ड विधान का भी निष्ठापूर्वक पालन करना होता है । साथ ही वह अमला जो संख्या बल मे तो अर्पाप्त है ही कही कोई घटना दुर्घना होने पर दण्ड का भागीदार भी होना पड़ता है । स्टाॅप या अमले के नाम पर कई जिले में तो 1- 2 कांसटेवल , दरोगा , इन्सपेक्टर तो आबकारी , सहायक आबकारी अधिकारी मिल जायेगे जिन्है समुचा जिला देखना होता है जिन्ह राजस्व के अलावा अबैध शराब बिक्रय तो अन्य जबाबदेही अर्थात कोर्ट कचहरी मे उपस्थित हो अपनी जबाबदेहियो का निर्वहन करना होता है । रहा सबाल उपभोक्ता का तो उसे तो सामाजिक डर के चलते न जाने कितने आर्थिक सामाजिक अत्याचार को खुशी से झेलना पढ़ता है न तो उसकी कोई च्वाइस पसंद न पसंद सुरक्षित रह जाती न ही उसे वह क्वालिटी और बाजिव दामो की गारंटी मिल पाती जिसका वह हकदार है । शराब कीमत , डियूटी , ठेकेदार का मुनाफा , वैट न जाने उसे कौन कौन से खर्चे कीमत के साथ चुकाने पढ़ते है । मगर इन सबका नई शराब नीति मे कोई उल्लेख नही है । जो अहम विषय इस व्यवसाय मे प्रभावी है उनका भी नीति मे कोई स्पष्ट उल्लेख नही है मगर कहते है जो जाये सो कम । नई नीति को लेकर सरकार तो अपना पक्ष स्पष्ट कर चुकी है तो विपक्ष नई दुकानो की बढ़ने बाली संख्या पर शंका प्रकट कर प्रदेश को शराब मे डुबाने का आरोप लगा अपनी जबाबदेही सिद्ध कर चुका मगर जो नही हो सका वह न्याय आबकारी संसाधन और उपभोक्ता के साथ जो हर नीति मे इसी तरह शराब नीतियो के नाम शिकार होते रहै है । अगर यो कहै कि यह वह व्यापारिक क्षैत्र है जिसमे नगद तत्काल भुगतान के साथ शासन सरकारो को सीधे राजकोष प्राप्त होता है । अगर सरकार शासन को लोगो की जान की कीमत पर शराब से प्राप्त होने बाला राजस्व इतना अहम है तो फिर उपभोक्ताओ की और राजस्व संग्रहण करने बाले उस अमले की ऐसी अनदेखी उनसे बैरूखी क्यो ?


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