स्वराज को शीर्ष पद से पुनः शुभकामनायें ..............? तीरंदाज


व्ही.एस. भुल्ले 

4 जनवरी 22 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


भैया - म्हारी तो गाड़ी भरी कलम घिस ली मगर आज तक कोई संदेश नही आया । जैसै धीर गंभीर समाज पहले भी अहम मौको पर चुप रहा आज भी वह मुॅह में मिश्री डाल शांत बैठा है मगर जब आज सत्ता के शीर्ष पद से पुनः शुभकामना संदेश आया वह भी साॅसल मीडिया के ईमेल पर तो म्हारे को विश्वास हो लिया कि इस महान देश में कोई तो ऐसा पुरूशार्थी है जिसने स्वराज को समझ उसे सम्मान जनक तरीके से शुभकामना संदेश भेजने की कोसिश तो की अगर यह संदेश 130 करोड़ का नेतृत्व करने बाले शीर्ष पद से है तो उसकी सराहना भी होना चाहिए और आभार भी , भले ही मामला साॅसल इन्टेेलीजेन्सी का हो या कम्पियूटर इन्टैलीजेन्सी का हो , फिलहाॅल भाव जिसका जैसा भी हो वह कम से कम अन्तरमन भाव की स्वीकारोक्ति तो किसी को है स्वराज कि जो स्वराज को पुनः शुभकामना संदेश मिला । सच बोल्यू तो भाया मने तो धन्य हो लिया , मगर मने स्वयं को तो धन्य तब समझूगा जब म्हारी महान संस्कारिक विरासत का मार्ग निशकंटक भाव से प्रस्त होगा , और मने अपनी आॅखो से देख उसकी अनुभूती कर सकू । मगर यह तभी संभव है जब बाबा विश्वनाथ के दरबार मे हुये संकल्प को पूरे सामथ्र्य पुरूषार्थ से पूरा करने की शुरूआत युद्ध स्तर पर की जाये कहते समृद्ध सजृन मानव जीवन ही नही समुचे जीव जगत का मूल है । और उसकी सिद्धि सदकर्म मे निहित है जो मानव का मूल है । अब हमे करना यह है कि हम संकल्प को नाझी साक्षी मान अपने अपने सामथ्र्य अनुसार अपना अपना पुरूषार्थ करे । लोग सार्थक सफल पुरूषार्थ करे इसके लिये सत्ता शासको को संसाधन और निरभिग्न उस पुरूषार्थ की रक्षा , संरक्षण , संर्बधन करना होगा जिससे यह राष्ट्र् समृद्ध खुशहाॅल बनेगा और समृद्ध सजृन सृष्टि का आधार । क्योकि शस्त्र हार सकते और हारते रहै है मगर शास्त्रो को आज तक कोई पराजित नही कर सका जिनका आधार अध्यात्म , विज्ञान है और शस्त्र से अधिक शास्त्र सृजन मे कारगार सिद्ध रहै है । और सजृन की ही सुसंस्कृत संतान समृद्धि खुशहाॅली रही है जिससे हर जीवन को समृद्ध खुशहाॅल वातावरण जीवन निर्वहन के लिये नसीब होता है । 

भैयै - मुॅये कै थारे को मालूम कोणी कि म्हारी महान संस्कृति शिक्षा संसाधनो के अभाव मे म्हारा सामथ्र्य पुरूषार्थ या तो बांझ या फिर कंगाल हो लिये और म्हारी कीर्ति कलंकित सच बोल्यू तो गैंग गिरोहबंदी ने मानव सरोकार इस हद तक तार तार कर दिये है कि अब न तो वह महान इतिहास बचा न ही वह महान ग्रन्थ जो समुचे जीव जगत को दिशा देने मे सक्षम समर्थ थे न ही वह खुला शास्त्रार्थ बचा जिससे प्रतिभा या दिव्य भव्य व्यक्तित्व का खुला मुल्यांकन होता था और विलक्षण प्रतिभाओ को सम्मान अब गूगल गुरू और कम्पियूटर महान का दौर है जिससे जीवन की समृद्धि खुशहाॅली कैसै लौटेगी यह तो बाबा विश्वनाथ ही जाने । जिस दौर मे जीवन का नेतृत्व मशीनो सहारे हो वहा कैसा जीवन होगा यह तो वह दिगदृष्टा ही जाने म्हारे को क्या ? 

भैया - थारे जैसै काली पीली चिन्दी , पन्ना धीमिगति के समाचार बालो की यही तो खराबी है कि शुभ अवसर पर भी अशुभ सुर अलापते हो फिर कहते हो फिल्म पिट गई । कै थारे को मालूम कोणी जबसे म्हारे बालो ने चकृवति सम्राट बनने अश्व क्या छोड़ा अन्दर से लेकर बाहर तक फैले फूटे असुर प्रवृतियो मे सनाका खिचा पढ़ा है । और सारा अखाड़ा मय लश्करो के बीच मैदान मे खड़ा है न जाने कैसै कैसै पुरूषार्थ सामर्थ आर पार के मूड मे खड़े है मगर अफसोस की जो लावो लश्कर म्हारे बालो के साथ खड़े होने थे वह दुश्मनो से जा मिले है और सिर्फ राष्ट्र् दोहीयो की ही नही कुल द्रोहियो की भाषा बोल रहै है । आज हमारा अस्तित्व वह महान संस्कृति निढाल पढ़ी है और थारे को मशखरी सूझ रही है । 

भैयै - कै थारे को मालूम कोणी नियती से कोई भी नही लड़ सका है जीतना तो दूर उसके आज तक दर्शन नही कर सका है । लेकिन अगर संकल्प सार्थक सिद्ध है सर्बकल्याणकारी है तो इतिहास गबाह है कि नियती को भी झुकना पढ़ा है । फिर काल खण्ड जो भी रहा हो । 

भैया - मने जाड़ू मगर कै करू उन मूड़धन्यो का जो बर्तमान पर भूत , भबिष्य की बलि देना चाहते है । और स्वकल्याण के महल खड़े कर सर्बकल्याण को खून के आंसू रूलाना चाहते है 

भैयै - तने तो बाबला शै कै थारे को मालूम कोणी यह संघर्ष तो मानव जीवन ही नही समुचे जीव जगत में अनादि काल से चल रहा है । समुद्र मंथन के दौर से एक दूसरे को पटखनी देने का पुरूषार्थ होता रहा है मगर आखिर में जीत सर्बकल्याण और मानव धर्म की ही हुई है मानव ही इस सृष्टि मे वह जीवन है जिसके कंाधो पर सर्बकल्याण का भार है । जीवन में नियती जीवन का न्याय स्तंभ तो सन्तुलन समृद्ध खुशहाॅल जीवन का आधार है और सन्तुलन ही सृष्टि का आधार है । सृष्टि मे मानव जीवन ही वह अनमोल कृति है जिस पर सर्बकल्याण का भार है अब इस पर विचार म्हारे और थारे को करना है । 

भैया - मने समझ लिया थारा इसारा अब मने भी स्वकल्याण बालो के झासे मे नही आउगा जरूरत पढ़ी तो सर्बकल्याण के लिये कोई नया मजमा जमाउगा क्योकि फिलहाॅल तो गैंग गिरोहबंदी के चलते समुची सियासत काप रही है और स्वकल्याण मे डूबे लोगो कि नई नई रियासते सियासी तौर पर खूब फलफूल रही है अब ऐसे मे मने कहां अड़ी लगाउ और हाथो हाथ माथे की लकीरो को सुदृण बना म्हारे जैसै को भाग्य चमका पाउ मने तो पहले भी करोड़ो लोगो को रोजगार दे सम्मानजनम जीवन निर्वहन का पांसा फैका था मगर भाई लोग बीच मे ही ले उड़े परिणाम की वह अब गले की फांस साबित हो रही है और विगत कुछ बर्षो से बीच सड़क ही सरेयाम बैभाव धुल रही है मगर म्हारे को पूर्ण विश्वास है यह भी नियती के आगे हार नही मानेगे जब तक कुनवा नही डूबेगा तब तक रार ही ठानेगे बहरहाॅल अगर फिर भी बात न बनी तो मने भी बाबा विश्वनाथ के ही किसी शहर मे अपना अखाड़ा जमाउगा और स्वराज के लिये भजन कीर्तन मण्डल बना सारे साजो सामान के संकल्प के साथ पुरूषार्थ मे लग जाउगा जिससे म्हारा समृद्ध खुशहाॅल जीवन अक्षुण अविरल बना रहै और म्हारी थारी महान विरासत खूब फलती फूलती रहै । जय स्वराज । 


 


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