समाधान में चूक सिपहसालारो की कर्तव्यविमुखता या बैबसी


सर्बकल्याण में पुरूषार्थ का संरक्षण हर सामथ्र्यशाली का धर्म 

कीर्ति , कलंक के भंबर मे फंसा पुरूषार्थ 

व्ही. एस. भल्ले 

6 जनवरी 22 विलज टाइम्स समाचार सेवा म. प्र. 


कहते है सृजन मे कर्तव्य मार्ग पर कलंक कीर्ति का जोड़ा होता है और संतुलन उसका आधार मगर जब सामर्थ का पुरूषार्थ सर्बकल्याण में हो तो ऐसे में हर सामथ्र्य शाली का धर्म कर्म होना चाहिए कि वह उसका संरक्षण , रक्षण का कार्य अपना कर्तव्य समझे । अपनी कीर्ति का एहसास कराये जो यश के साथ यशस्वी भी हो भले ही इस कर्म के लिये उसकी कीर्ति स्थापित हो या फिर कलंक हासिल हो मगर पुरूषार्थ के वक्त दिल दिमाक में संकोच नही होना चाहिए । यही जीवन का यथार्त होता है जो सत्य भी है और युगो युगो से सिद्ध भी । हमें यह नही भूलना चाहिए के जीवन का काल चक्र मे बड़े बड़े मानव महामानव कलंक कीर्ति से अक्षुण नही रख सके इतिहास गबाह है । अगर यह सत्य है तो साधारण या आम मानव की क्या वैशाख है इस सत्य से आज हर पुरूषार्थी सामथ्र्यशाली को अवगत होना चाहिए । क्योकि हर जीवन के दो पहलू होते है जीवन मे यश और अपयश जिसका निर्धारण मानव के कर्म अनुसार होता है । 

आज जब सर्बकल्याण मे पुरूषार्थ हो रहा है तो आलोचना के साथ सराहना भी होनी चाहिए और उसका सम्मान संरक्षण भी यही मानव धर्म है । मगर प्रायः देखने में आ रहा है कि तो बगैर तथ्य प्रशंसा या फिर विरोध का दौर चल रहा है रही सही सत्ता तो सिपहसालारो मे ही अन्तरविरोध का स्वर भूट रहा है जो सर्बकल्याण मे किसी भी दृष्टि से उचित नही कहा जा सकता । हमें यह भी नही भूलना चाहिए कि सत्ता का सामथ्र्य पुरूषार्थ का अपना एक स्वभाव होता है । और सामाजिक सरोकारो का अपना स्वभाव मगर दुर्भाग्य कि आज के कर्तव्य निर्वहन मे सत्ता और सामाजिक सरोकारो का नेतृत्व एकल हो चला है परिणाम कि समाधान के लिये बीच के मार्ग बन्द होते जा रहै है । और ध्रुर्वीकरण के रास्ते अब सामाजिक असंतोश के स्वर प्रबल हो रहै है अगर ऐसा ही कुछ और समय चला तो निश्चित ही मानिये कि सर्बकल्याण , समाधान के रास्ते सार्वजनिक मार्ग पर मुश्किल होना तय है । पनपती इस गंभीर समस्या पर विचार अवश्य होना चाहिए । कही ऐसा न हो कि हम ऐसे पुरूषार्थ सामथ्र्य पर कभी विलाप करने , बैबस मजबूर हो जो न तो हमारा प्रारव्ध रहा न ही बर्तमान फिर हम अपनी आने बाली पीढ़ियो को विरासत मे कैसै ऐसी सत्ता सियासत समाज सौप सकते है जो हमारी कीर्ति से अधिक हमारे कलंकित जीवन पर चर्चा करे अब विचार हम सभी को करना है चाहै वह सामथ्र्यशाली हो या पुरूषार्थी या सामान्य मानव । जय स्वराज । 


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