भव्य , दिव्य , विरासत को विकृत करती कर्तव्य विमुखता
अमूल्य धरोहर का माखौल उड़ाती सियासत
व्ही.एस. भुल्ले
8 जनवरी 22 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
जीवन के सर्बोच्यतम संस्कारो की विरासत , उसके उत्तराधिकारी समाज का , सत्ता , सियासत , स्वार्थ के लिये कभी इतना भी छरण हो सकता है शायद ही उस पीड़ी ने भी कभी सपने मे न सोचा होगा जिन्होने अपनी आने बाली नस्लो , पीढ़ियो या समस्त जीव जगत कल्याण के लिये अपने अमूल्य प्राणो की आहूति , यह भली भांती जान समझते दी कि वह जो इस अमूल्य जीवन को सर्बकल्याण में दाॅब पर लगा रहे है जिसे वह पूरे ऐश्वर्य विलासता से भोग सकते है । मगर उन्होने बगैर कोई छड़ गबाये 84 लाख यौनी बाद प्राप्त जीवन को कठिन तपस्या त्याग बलिदान के रास्ते उच्चतम संस्कार जीवन मे स्वीकार्य समृद्ध संस्कृति नीति , सिद्धान्तो की स्थापना के लिये न्यौछावर कर दिया जिससे वह बर्तमान पीढ़ी सहित भबिष्य की आने बाली पीढ़ियो को यह सुसंस्कृत संस्कार संस्कृति उपहार स्वरूप विरासत में छोड़ पाये । मगर आज मौजूदा हालात में यक्ष सबाल यह है कि हमारे पूर्वजो की अमूल्य विरासत इस तरह बांझ हो सत्ता , सियासत , स्वार्थो के इस तरह मातम मनायेगी जो मानव जीवन की अमूल्य धरोहर है । आज सत्ता , सियासत , स्वार्थ के लिये माखौल बनी हमारी सांस्कृतिक धरोहर और कर्तव्य विमुखता के चलते विकृत होता उसका भव्य , दिव्य , स्वरूप कलंकित हो स्वयं पहचान का मोहताज हो चला है और निष्ठा के सामने एक बड़ा धर्म संकट मगर फिर भी तर्क कुतर्को की छत्रछाया मे विकृत संस्कार खूब फलफूल रहै है । जिसे किसी भी सभ्य सुसंस्कृत , समृद्ध समाज के लिये हित कर नही कहा जा सकता । ये अलग बात है कि सुचिता सर्बकल्याण के नाम इस विकृति की शुरूआत जिसने भी कि हो मगर यह समृद्ध जीवन के खिलाफ द्रोह है । जो किसी भी जीवन ही नही परिवार , समाज , सत्ता , सियासत को कभी चैन से नही बैठने देगा और यह मानव कृत्य समृद्ध खुशहाॅल जीवन मे घातक ही सिद्ध होगा । यह बात हर उस मानव , जीवन को नही भूलना चाहिए जिसकी आस्था समृद्ध खुशहाॅल जीवन में है । बैहतर हो कि समझ रखने बाले अपनी अपनी विरासत को खंगाले उन त्याग तपस्वियो की कुर्बानी त्याग को पहचाने जिन्होने हमारे समृद्ध खुशहाॅल जीवन और सर्बकल्याण की खातिर कभी ज्ञानवान , सामथ्र्यवान , पुरूषार्थी , समृद्ध होने के बाबजूद अपने अपने कर्तव्यो से कभी मुॅह नही मोड़ा फिर कीमत जैसै जो भी चुकानी पढ़ी हो और कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर रह मानव होने के उच्चतम कीर्तिमान स्थापित किये मगर उन्ही के वंशज हम जो विकृत बीजो की फसल काट हम स्वयं को धनधान्य , समृद्ध समझ रहै है यह हमारी सबसे बड़ी भूल है । और मानव जीवन की सबसे बड़ी असफलता । अब विचार उन्है नही जो अकूत धन संपदा या छदम व्यवहार से समृद्धि सत्ता प्राप्त कर स्वयं सफल और सर्बकल्याण का जनक सिद्ध करने पर तुले है विचार तो उन लोगो को करना है जो इनकी कर्तव्य विमुखता का दंश भोग तिल तिल मर समृद्ध जीवन को जिहन्दुम समझ रहै है । हमे यह नही भूलना चाहिए कि ईश्वर ने हर मानव जीवन को समृद्ध बना कर ही जीवन मे भेजा है । इसलिये हम स्वयं को पहचाने अपने पुरूषार्थ को जाने हर जीवन मे समृद्धि सुनिश्चित है । जय स्वराज ।
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