मेकाले के साये में दम तोड़ता समृद्ध देश


कई पीढ़ियो की आत्मसात शिक्षा बनी कलंक 


मूल संरचना , संस्कार तो दूर अपनी संस्कृति , मूल जीवन आधार बचाने में भी अक्षम असफल सिद्ध हुये है , हम 

आर्थिक , बौद्धिक , समृद्धि ही नही रोजगार आज कोई समस्या  नही , बशर्ते हम मेकाले की विरासत से निजात पा सके  

व्ही. एस. भुल्ले 

18 फरबरी 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है अगर अहंकार न होता तो रावण , कंश सहित महाबलियो का शर्मनाक अंत न हुआ होता । न आज पवित्र गीता का उल्लेख होता न ही जगह जगह गीता पाठ होता । मगर कहते है अगर नियती ने समय के सरोकार सिद्ध किये है तो अहंकार का अंश भी श्रेष्ठ मानव जीवन मे रख छोड़ा है जो हर युग में काल परिस्थिति अनुसार सिद्ध हो , नियती को प्राप्त होता रहा है । मगर जब आज हम मानव जीवन में है तो आज समय भी है और काल परिस्थिति भी जो अपना असर दिखाती रही है मगर दुर्भाग्य की तब भी अहंकारियो को समझाया बुझाया गया मगर लगता है आज कोई सामथ्र्यवान बलवान ,सिद्ध पुरूष यह समझाने बाला शायद कोई नही जो यह बता सके की जिस शिक्षा संस्कार की बदौलत पीढ़िया बरबाद हो घिसटने के कागार पर है जीवन असंतोश अशांति को धारण कर अभाव या आर्थिक समृद्ध जीवन जीने पर बैबस मजबूर है उससे कैसै निजात पायी । अगर कुछ है भी तो न तो उनके पास वह सामथ्र्य है न ही वह शक्ति जिससे वह मानव धर्म का पालन कर जीवन के आधार को समृद्ध खुशहाॅल बना पाये । पीढ़ी दर पीढ़ी मेकाले के साये में दम तोड़ते जीवन भले ही बैबस हो मगर इतना सत्य है कि यह महान भूभाग न तो अकूत संपदा से बांझ है न ही पहुरूषार्थ से अनाथ । मगर उजड़ता बरबाद होता समृद्ध जीवन अपना मूल आधार भूल बिनाश के कागार पर है । इसे नियती कहै या फिर समय क्योकि जब तक अहंकार का आधार सृजन कल्याण न्याय नही होगा तब तक यह दंश समृद्ध जीवन को कलंकित करता ही 

रहेगा । जय स्वराज । 


 

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