अंधी चाहतो का बैबस अंदाज , दफन होता वैखोफ आगाज


कंगाल तकनीकी संस्कृति में कपकपाये सरोकार 

व्ही. एस. भुल्ले 

20 मार्च 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


यू तो अन्तरमुखी आनन्दक संस्कृति संस्कारो मे स्व पुरूषार्थ के चलते सर्बकल्याण भले ही अनाथ हो मगर जिस तरह से अंधी चाहत मे वह बैखोफ आगाज दफन होने के कागार पर जा पहुॅचा है जो समृद्ध खुशहाॅल जीवन के लिये वरदान हुआ करता था आज उसका बर्तमान वैहद ही बड़ा दर्दनाक है । जिसमें कंगाल तकनीक संस्कृति के आगे कपकपाते जीवन सरोकार भले ही निशब्द हो मगर उनका दर्द भी कम नही जो न तो अब व्यक्त होने की स्थति में है न ही अहसास कराने  कि स्थति में अब इसे बिडम्बना ही कहा जायेगा उस समृद्ध जीवन के लिये जिसे जन्म से ही नैसर्गिक स्वभाव अनुसार बैखोफ अन्दाज मे जीवन जीने का अंदाज और संस्कार मिला होता है और जीवन का अनुशासन उसका अमूल्य आभूषण होता है । मगर जितना छरण मानव जीवन जीने के अंदाज मे हुआ है देख कर लगता है कि उसने शेष जीव जगत को अपने आचरण व्यवहार से काफी पीछे छोड़ दिया है । आज समृद्ध जीवन के आगे जितने भी कंटक संकट है लगता है उसके पीछे छिन्न भिन्न हो चुकी वह समृद्ध मानव सभ्यता का स्थान ले चुका वह स्व पुरूषार्थ ही है जिसका संस्कार अब सर्बकल्याण से इतर अन्तरमुखी हो स्वकल्याण तक सीमित हो चुका है और वह उस बर्तमान को झिक के जी लेना चाहता है जिसका कोई सार्थक समृद्ध बर्तमान है न ही  अन्त अनन्त बल्कि उसे जिज्ञासा से लदा एक ऐसा अन्त प्राप्त होता है जो उसे एक मर्तवा फिर से कर्म अनुसार जीवन मे बापस लौटने पर बैबस मजबूर कर देता है फिर यौनी जो भी हो फिलहाॅल इसे हम अध्यात्म करार दे शेष जीवन जी सकते है । मगर हमे हर जीवन के आने जाने , खोने पाने , सृजन अन्त के संस्कार शिक्षा संस्कृति को नही भूलना चाहिए । सृजन का सर्बकल्याण मे सदउपयोग ही जीवन की सार्थकता रही है फिर पृथ्वी वह जीवन हो या बस्तु जो अक्षम असफल होते है उन्है जीवन पर्यन्त से लेकर प्रारब्ध का तक भोगना पढ़ता है और सफल सक्षम होता है वह मिले समय मे ही इतना सिद्ध कर जाते है जिन्है न तो बर्तमान न ही भबिष्य और न ही प्रारब्ध प्रभाबित कर पाता है क्योकि न तो जीवन न तो अस्तित्व मे आते ही किसी का गुलाम होता है और न ही खत्म होते वक्त किसी का इन्जार करता है । सत्य है । जय स्वराज । 


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