खुशहाॅल जीवन में विधान के साथ विधि का सम्मान भी अहम


नैसर्गिक निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन ही भय का निदान है 

भय न्याय का पुत्र तो समृद्ध जीवन , उसका आधार आस्था  

सुशासन में आत्ममुग्ध आस्था , और अवसरो से बंचित बौद्धिक संपदा , मानव संसाधन स्वराज में बड़ी बाधा 

व्ही. एस. भुल्ले 

10 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


कहते है किसी व्यक्ति , समूह , सत्ता , संगठन में हट और आत्म मुग्ध अहंकार होना कोई नई बात नही , इसका अस्तित्व तो जीवन मे अनादि काल से रहा है । शायद हो सकता है कि सर्बकल्याण से इतर उसका यह स्वभाव नैसर्गिक हो मगर यह कभी समृद्ध जीवन का आधार आस्था नही हो सकता किसी शिक्षा विद ने सेकड़ो बर्ष पूर्व भले ही यह सूत्र प्रतिपादित किया हो कि भय न्याय का पुत्र होता है मगर हमारी नैसर्गिक आस्था कहती है कि समृद्ध जीवन का सम्पूर्ण आधार ही उसकी नैसर्गिक निष्ठा कर्तव्य आधारित होती है जो उसका आधार भी होता है । आज जब विधान का मूल भूल जीवन विधि को भी सहर्ष स्वीकारने में कोताही करता है तो निश्चित ही समृद्ध खुशहाॅल सुरक्षित जीवन का मार्ग स्वतः ही अवरूध हो जाता है । क्योकि जब तक विधान के साथ विधि की मान्यता जीवन मे नही होगी तब तक जीवन वह मुकाम हासिल करने अक्षम असफल होता रहेगा जिसके के लिये वह अकांक्षी बना रहता है । मगर जब जब बौद्धिक संपदा , मानव संसाधनो का हट या अहंम अहंकार बस तिरस्कार हुआ है उसका परिणाम जीवन को भोगना ही पढ़ा है फिर काल , परिस्थिति जो भी रहै या रही हो । यह कटु सत्य है । कहते है की जीवन समृद्ध खुशहाॅल सुरक्षित तभी हो सकता है जब हम उस हुनर आस्था का सम्मान कर उसे वह अवसर दे जिससे वह अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप अपने कर्तव्य निष्ठा से उस विद्या का प्रदर्शन निर्भीक भाव से जीवन में कर सर्बकल्याण में जीवन के सामथ्र्य पुरूषार्थ का योगदान दे प्राप्त जीवन के आधार को सिद्ध कर सके । मगर यह न तो तब संभव हो सका न ही फिलहाॅल कोई उम्मीद की किरण नजर आती । कारण जब आधार से भ्रमित आस्था ही आत्म मुग्ध हो और हट , अहंम , अहंकार उसके सारथी हो तो कैसै संभव है कि अवसरो का मार्ग सहज सरल हो पाये और विद्या संपदा का उपयोग कल्याण मे हो पाये । क्योकि जिन जीवनो की आस्था सिर्फ विधान ही नही विधि के सम्मान को लेकर भ्रमित हो उनसे कैसै यह उम्मीद की जा सकती है । जो स्वकल्याण को ही श्रेष्ठजीवन का आधार बना चुके हो और मानव कीर्ति को कलंकित कर स्वयं को श्रेष्ठजन मान चुके हो फिर भी उम्मीद तो सुधार समझ की , की ही जा सकती है ऐसे जीवनो से जिनसे लाखो करोड़ो जीवनो को आज भी कल्याण की उम्मीद है । जय स्वराज ।  


 

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