म.प्र.- सत्तागत नैतिक पतन की पराकाष्ठा


कोरोना योद्धाओ का शंखनाद 

अहम अहंकार में दम तोड़ता विश्वास का आधार 

मौत के बंबडर से खुद को छिपाने बालो ने दिखाये तेबर 

व्ही . एस. भुल्ले 


3 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

म.प्र. - कभी कभी को तो अब लिखने मे भी शर्म और लेखन से भी इतना घृणा होने लगती है कि आखिर क्या लिखो क्या न लिखो लेकिन जमीर है कि हमें चुप रहने ही नही देता । हाॅल ही मे म.प्र. के अन्दर जो सत्तागत नैतिक पतन देखा मानो उसने पतन की सारी सीमाये तोड़ अपने आप को यह सिद्ध किया कि सत्ता अहंकार कितना अंधा और अहंकारी तिरस्कारी हो सकता है जिसे यह भान भी न हो कि जो कृय वह अपने सामथ्र्य से करने जा रहा है उसका प्रभाव उस समाज उस व्यवस्था पर क्या पड़ेगा उस विश्वास की रक्षा का क्या होगा ? जिसके लिये उसका अस्तित्व है । कभी मौत के बबंडर से खुद को बंगलो बड़े बड़े प्रायवेट अस्पतालो मे छिपा लोगो से लोगो कि जान बचाने की अपील भीख मागने बाले तथा दवा संसाधनो के नाम अरबो फूकने बाले उन जिन्दगी मौत से जूझते कोरोना योद्धाओ कोरोना के सिपाही तो कभी देवदूत की उपमा दे उनका फूलमालाओ से स्वागत , मंचो पर उनकी शान मे कसीदे पढ़ते नही थकते थे उन्ही कोेरोना योद्धाओ से कोरोना जांच से वैक्सीनेशन के माध्ययम से कोरोना से आशिक निजात पाने बाले , अब काम निकलने के बाद उन्है दूध से मक्खी तरह बड़े ही बैहाई भरे अंदाज मे बाहर करने बालो को क्या पता कि जिन कोरोना योद्धाओ के सहारे कोरोना की यह जंग जीती गई है वह भी किसी भृत्य से कम मिलने बाले वेतन पर यह सिर्फ और सिर्फ दया नैतिकता के बल असहाय लोगो कि जान बचाने लड़ी गई वह कोरोना जंग थी जब घर के ही लोग अपनो को छूने या उनके सम्पर्क मे आने से डरते थे । जो फुल वेतन या मुॅह मांगे धन पर स्वास्थ सेवाये देने तैनात थे वह तब के लिये ऐसी सेवा से तौवा कर चुके थे और व्यवस्था तथा समाज का वह विश्वास सरेराह तोड़ रहै थे तब यही कोरोना योद्धा स्वयं की जान जोखिम मे डाल अपने परिजनो की परवाह किये बगैर मरते लोगो की जान बचा स्वयं भी मौत से खेलते रहे मगर उन्होने न तो समाज न ही व्यवस्था की पीठ दिखाई आज जब सत्ताये यह मान चुकी की कोरोना गया तब उन्है बाहर का रास्ता दिखा अपने नैतिक पतन का आगाज करना किसी भी समृद्ध समाज के लिये श्रेष्ठ आचरण नही कहा जा सकता । खास कर जब ऐसा आचरण संस्कृति संस्कारो की दुहाई देने बाले वह नागरिक समूह जो राष्ट्र्सेवा जनसेवा की बाते करते नही थकते । जो सियासी लाभ के लिये करोड़ो रूपया एक दिन फूक , हिसाब पूछना स्वयं की तौहीन समझते है ऐसे लोगो और उम्मीद भी क्या की जा सकती है यह अलग बात कि कोरोना योद्धाओ ने स्वयं के साथ हो रहै अन्याय से भले ही केन्द्रीय मंत्री को अवगत कराया हो मगर कहते है उन्होने इसे गंभीरता से सुना है कोई आश्वासन नही दिया है सो हालिया खबर यह है कि कोरोना से युद्ध करते करते ढगे गये युवा युवतिया अब ऐसी सत्ता को अपनी बात सार्वजनिक तौर पर बताने और विश्वास कायम रहै इसके लिये वह न्याय मांगने उसे हासिल करने का मन बना चुके है । देखना होगा कि हमारे अहंकारी श्रेष्ठजन अब क्या निर्णय कोरोना योद्धाओ का पटाक्षैप करते है । जय स्वराज । 


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