नजर , नजराना , और दरबार .............? तीरंदाज
सभासदो की परिषद में लोककल्याण की चर्चा
भैया - मने न लागे कि राजतंत्र के गुलामी के बाद सेवा कल्याण का चेहरा कुछ बदल पाया है । कहने को तो बरस महिनो बाद दरबार सजा था रैययन को उम्मीद थी कि बख्सीस बटेगी , सभासदो को उम्मीद थी कि किल्लत मिलेगी मगर जैसै ही नजरानो के बाद दरबार बर्खास्त हुआ भाई लोगो को बड़ी मायूसी हाथ लगी । सुना निजाम का बजीर कम से कम आम दरखास्तो पर तो नजर करेगा और बिलबिलाते लोगो के जख्मो पर मरहम का इन्तजाम करेगा । मगर जय जय कारो की गूॅज और दरबारियो की आओ भगत मे सब धरी की धरी रह गयी । और देखते ही देखते दरबार बर्खास्तगी के साथ ही निजाम के बजीर मय लावोलश्कर के साथ आगे बढ़ लिये। सुना है दरबारियो की तो बल्ले बल्ले हो ली और उनकी रसद पानी की भी सुन ली अगर यो कहै कि सारी सभा शुभचिंतक सह पाटियो के मसले सुनने सुलटाने मे ही सुलट ली । अब बैचारी आशा अकांक्षाये छाती कूट रही है और उस दिन को कोस रही है जब राजा रैययन का रिवाज शुरू हुआ और सेवा कल्याण का जन्म हुआ ।
भैयै - महिनो बाद लगे दरबार पर तनै क्यो बिलाप कर रहा है कै थारे को फ्री का राशन तेल नही मिल रहा है ।
भैया - बात सिर्फ राशन तेल की होती तो चल जाती बात तो खादय खनिज शराब माफिया के खात्मे की हुई थी इस पर तो सभासदो की सभा में कुछ नही हो सका । और नजर नजरानो का दौर दरबार बर्खास्त होने तक चलता रहा है । जागीरो में बटी सल्तनत के अलमबर दारो की ऐसी जमी कि कुछ तो हाकिमो से गलबैया करते रहे तो कुछ माथे कि सिलबटे नजराने की सुन मसलते रहे ।
भैयै - तनै तो बाबला शै कै थारे को मालूम कोणी सत्ता सल्तनत का मिजाज ही कुछ ऐसा होता है और फिर सत्ता सल्तनत जिसकी भी रही हो या हो यह तो सत्ता निजामो का दस्तूर सो अगर व दस्तुर ऐसा तो चलता रहता है इसमे खास क्या ? फिर म्हारा वह अमूल्य सबाल भी तो चारो खाने चित हो लिया जिसे पूछने हमारे गुरूल्लो का लावोलश्कर मोचा्र्र लगाये इस भीषण गर्मी मे डटा रहा और नैतिक पतन का जीता जागता उदाहरण मय सबालो के अनसुलझा रह गया ।
भैया - मने जाड़ू थारे सबाल तो आज नही तो कल हो ही लेगे मगर उन अभागी आशा अकांक्षाओ का क्या जो महिनो से बाठ जो इस उम्मीद में थी कि उन्है सुना जायेगा समाधान मिले या न मिले आश्वासन तो हाथो हाथ मिल ही जायेगा । नजराने किल्लत उन्है मुबारक कम से कम हम दीन हीनो को सुन तो लिया जायेगा मगर लावोलश्कर के अखाड़े और जय जय कार के नारो के बीच सब धरा का धरा रह गया । और साहब का लश्कर आगे बढ़ गया । अब भगबान ही जाने अब कब दरबार सजेगा और म्हारे थारे जैसै लोगो का नम्बर सुनबाई के लिये लगेगा । मगर मने तो बोल्यू भाया फिलहाॅल तो निजाम का अहंम अहंकार सर चढ़ कर बोल रहा है । और सेवा कल्याण तो फिलहाॅल बातो के बतासौ से भर्राटे भर ही रहा है । हे राम ।

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