आस्था तोड़ता विश्वास
सामथ्र्य पुरूषार्थ को लेकर बड़े सबाल
बचपन , जबानी , बुढ़ापा हुआ निढाल
अवसर की अनदेखी से बिगड़ते हालात
व्ही. एस. भुल्ले
21 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
ये अलग बात है कि टूटते विश्वास के बीच सामथ्र्य , पुरूषार्थ को लेकर बड़े सबाल हो और अवसरो की अनदेखी के चलते बिगड़े हालात हो मगर इस बीच आम मूल आस्था का जो विश्वास टूट रहा है वह बड़ा ही घातक है । लोकतंत्र मे निजाम बनाने या बनाये रखने सियासी दलो की अपनी बैबसी मजबूरी हो सकती है । सेवा कल्याण को लेकर उनके अपने अपने सत्तागत लक्ष्य हो सकते है मगर मौजूद परिणाम इस बात के प्रमाण है कि लोककल्याण जनकल्याण , जीवन की समृद्धि में उसका सामथ्र्य पुरूषार्थ आज भी उतना ही अक्षम असफल सिद्ध हो रहा है जितना कभी पहले हुआ करता था । ये अलग बात है कि बाजार के साथ नये नये आचार विचार व्यवहारो का तो विकास हुआ तो वही अधौसंरचना मे भी अमूलचूल परिवर्तन हुआ मगर समृद्ध जीवन के मूल का जो विनाश हुआ है और पानी की तरह पैसा जनधन समय बरबाद हुआ है वह दुखद ही कहा जायेगा क्योकि इसका इतिहास तो होगा मगर वह स्वर्णिम हो यह शायद ही संभव हो अगर म.प्र. मे विगत लगातार 10 और 18 बर्षो की सत्ताओ कुल लगभग 28 बर्षो के सामथ्र्य पुरूषार्थ का आकलन करे तो पायेगे कि न तो सामाजिक सुरक्षा , सृजन , शिक्षा के क्षैत्र मे वह प्रमाणिक कार्य हो पाया न ही उस विधि का राज का कायम हो सका जिसे लोगो ने राष्ट्र् जनकल्याण मे अंगीकार कर गाहै बगाहै अपने कर्तव्यो का निष्ठा पूर्ण निर्वहन कर अंगीकार किया है। आज वही आस्थाये हैरान परेशान है । जो बचपन कभी अपने घर आंगन मे अठखेलिया करता था अपने शिक्षण संस्थानो मे दिन रात एक कर अपने सामथ्र्य पुरूषार्थ को एक कर खुद का धन फूक समृद्ध जीवन के सुनहरे सपना गढ़ता था वह आज सड़क पर है । जो जबानी आज से 28 बर्ष पूर्व कभी लड़खाती बलखाती थी सिर्फ इस उम्मीद मे कि वह अपने और अपने बालो के साथ समाज राज्य के लिये एक मजबूत संबल सिद्ध होगा वह निराश है और जो उतर्राध की ओर अग्रसर थे उनमे से न जाने कितने लोग सारे जीवन की कमाई अपनी पीढ़ी की शिक्षा दीक्षा पर फूक निकल लिये सिर्फ इस उम्मीद मे कि उनका न सही कम से कम उनकी मौजूद या आने बाली पीढ़ी का जीवन समृद्ध खुशहाॅल होगा । मगर दुर्भाग्य ऐसा हो न सका और सियासत सत्ताओ का कांरबा अनवरत समृद्ध खुशहाॅल माहौल मे चलता रहा । अगर हम मूल को छोड़ उधार की बात करे तो 10 बर्षीय सत्ता प्रदेश को लगभग 36000 करोड़ के कर्ज मे छोड़ गयी थी तो मौजूदा सत्ता फिलहाॅल 2 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज ले चुकी है । तो वही दूसरी गाॅब गली मे बैगार हाथो की फौज बढ़ रही है । रहा सबाल शिक्षा सुरक्षा का तो क्या हाॅल है यह तो पूरे प्रदेश की जमात देख रही है । हर तरफ स्वकल्याण कारियो की फौज कूद पढ़ी है ऐसे मे सर्बकल्याण कैसे होगा यह तो सेवा कल्याण बाले ही जाने मगर जो स्थति बन रही है वह आम जीवन के लिये हितकारी नही । मगर रक्षा सुरक्षा कल्याण सेवा के नाम सत्ता सियासत का कांरबा बढ़ रहा है मगर इसका भबिष्य क्या होगा यह तो उनको भी नही पता जो सेवा कल्याण के नाम बड़े बड़े धनकुबेरो के फाॅरमूलो को भी मात कर रहै है और एक सेवक की जगह किसी कम्पनी के सी.ई.ओ को भी मात कर रहै है । यह सही है कि आज लोकतंत्र मे जो जीता वही सिकंदर है । मगर सूचना क्रान्ति के दौर में यह फाॅरमूला कितना चले इस पर आज संसय है । बैहतर हो आज अभी भी समय है विचार हो कही ऐसा न हो कि विचार सिर्फ और सिर्फ विचार ही रह जाये । और टूटती आस्थाये कही बगावत पर न उतर आये तब न तो सियासत बचेगी न ही ऐसी सत्ता सामथ्र्यशालियो का अस्तित्व शेष रहेगा जो अपने मूल को भूल आशा अकांक्षाओ का उपहास उड़ा उन्है मुॅह चिढ़ाने मे लगे है । थोड़ा कहा बहुत समझना यह टूटते उस विश्वास का मसला है जिस पर मानव अस्तित्व टिका है इसलिये विचार तो अवश्य होना ही चाहिए । जय स्वराज ।

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