मूल को चुनौती देती , महात्वकांक्षाये
विध्वंश की व्याख्या से अनभिज्ञ , मानव हुआ बैलगाम
बैड़ागरग के कागार पर हजारो लाखो बर्ष की त्याग तपस्या
टूटते विश्वास पर चुप्पी खतरनाक
व्ही. एस. भुल्ले
23 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
अगर सत्ता सर्बकल्याण की कीमत लोकतंत्र में इतनी वीभत्स खतरनाक है । तो ऐसे समृद्ध खुशहाॅल जीवन से तो उस अभाव ग्रस्त जीवन और जीवन का घोरतम संघर्ष ही , अब मानव और मानवता का सर्बोत्तम संस्कार होना चाहिए । क्योकि जिस तरह से लोेकतंत्र मे आशा अकांक्षाये टूट रही है और बांझो की तरह अपने खुशहाॅल समृद्ध जीवन के लिये विलाप करने बैबस मजबूर हो रही है । वह किसी वीभत्स सपने से कम नही क्योकि महात्वकांक्षाये अपने ही मूल को भूल हजारो लाखो बर्ष की त्याग तपस्या से स्थापित उस विश्वास को तोड़ने मे जुट चुकी है जो समृद्ध जीवन का मूल आधार है विभिन्न रूपो में मानव जीवन के बीच अपनी गहरी पैठ जमाती आर्थिक सियासी सामाजिक महात्वकांक्षाये आज इतनी बैलगाम हो चली है जिसे न तो अब स्थापित सत्ताओ का कोई भय है न ही उस विधि विधान का डर जिसे अध्यात्म त्याग तपस्या से समृद्ध खुशहाॅल जीवन के लिये उन महामानवो ने तैयार किया जिसमे सिर्फ मानव ही नही समस्त जीव जगत के समृद्ध खुशहाॅल जीवन का यथार्त निहित था । कहानी किस्से दोहा चैपाई से लेकर गीत ग्रन्थो मे जिनका उल्लेख था जिनकी अपनी प्रायोगिक सैद्धान्तिक प्रमाणिकता ऐहसास अनुभव था वह आज जिस तरह लज्जित कलंकित हो रहै है वह किसी से छिपा नही । मगर जिस तरह से लोकतंत्र मे सत्ताये निहित स्वार्थ महात्वकांक्षाये सर्बकल्याण के नाम विश्वास तोड़ने और स्थापित विश्वास से आम मानव जीवन को भ्रमित कर अपनी अपनी महात्वकांक्षाये पूर्ण करने का कार्य करने में जुटी है वह बड़ा ही घातक है । और उस पर आम मानव जीवन की चुप्पी खतरनाक है । अगर यो कहै कि विध्वंश की व्याख्या से अनभिज्ञ मानव जीवन जिस तरह से बैलगाम हो रहा है और सत्ताये सर्बकल्याण में मौन है तो ऐसे में समृद्ध खुशहाॅल जीवन का बैड़ागरग होना तय मानिये । अगर हम बात करे संवाद शिक्षा , संस्कार व नव उदित संस्कृति और समाज को जाग्रत कर उसे उसका मूल याद रखने का संज्ञान कराने बाली मीडिया की तो मौजूद मीडिया के भी कई भाग हो सकते है उसमे बर्तमान मे सबसे ज्यादा खतरनाक साॅसल मीडिया ही नही अन्य मीडिया को भी देखा जा रहा है जो आज महात्वकांक्षियो के लिये सबसे अचूक अस्त्र साबित हो रहा है । लेकिन सम्पूर्ण दोष साॅसल मीडिया पर फैक देना यह उस महान तकनीक विद्या के साथ अन्याय होगा जिसका अचूक इस्तमाल निहित स्वार्थो के लिये महात्कांक्षी लोग भ्रामक प्रायोजित ऐजन्डा चला कर रहै है और स्थापित उस विश्वास को भी तोड़ रहै है जिसे स्थापित रखने इस विद्या का अविष्कार कड़ी तपस्या त्याग के पश्चात किसी विद्यवान ने लोककल्याण के लिया किया होगा । आज धन सत्ता लालचियो ने समस्त विद्या तकनीक शिक्षा संस्कारो को अपने सामथ्र्य के बल पर उस विनाश की भटटी में झोक दिया है जिससे किसी का भी भला होने बाला नही , न तो उन लोगो का ही भला होने बाला जो समृद्ध जीवन के आकांक्षी है और न ही उनका और उनकी पीढ़ी का भला होने बाला है जो अपनी अपनी महात्वकांक्षओ के चलते इस विनाश से खेल रहै है । ऐसे मे सबसे बड़ी जबाबदेही उन विद्ववानो , तकनीक विशेषज्ञो की हो जाती है जिनकी आस्था सर्बकल्याण में मानव के रूप मे है अमेरिका के पूर्व राष्ट्र्पति बराक ओबामा का इसारा इस बात का संकेत है जो बात स्वराज बाले भी करते नही थकते कि मानव मूल के बिना उसका आधार तब तक ही सुरक्षित है जब तक कि आम मानव अपने मूल के प्रति जाग्रत रहेगा वरना बैलगाम महात्वकांक्षी स्वार्थवत मानवो की फौज तो अपने अपने निहित स्वार्थ , महात्वकांक्षाओ की खातिर यह घृड़ात्मक कृत सत्ता और स्वकल्याण के लिये करने मे लगे ही है इसलिये जरूरी है हम अपने मानव स्वभाव और अपने महान पूर्वजो और आने बाली पीढ़ी को इस मानवीय द्रोह से बचाने संयुक्त प्रयास करे तभी हम मानव जीवन को सिद्ध कर उस टूटते विश्वास को कायम रख पायेगे जो आज निढाल खला है । जय स्वराज ।

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