कर्तव्य विमुख राजधर्म और समृद्ध जीवन की दुर्दशा

 

सृजन में जीवन रक्षा , न्याय सबसे बड़ा मानव धर्म 

जीवन की रक्षा उसका संरक्षण ही सत्ताओ का अस्तित्व आधार 

पशुवत संस्कृति से थर्राया सुसंस्कृत मानव जीवन 

नैसर्गिक जीवन हुआ निढाल 


व्ही. एस. भुल्ले 

30 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

सत्ताओ की स्वार्थवत उदारता के चलते जिस तरह से अपनी अपनी आस्थाओ को न्याय पाने दिलाने बगैर राजसत्ता , राजधर्म की परवाह किये सड़क पर संग्राम देखने मिल रहा है उसे देख कर तो बस यही कहा जा सकता है कि सत्ताये आजकल स्वयं ही अपने आधार के अस्तित्व को अस्वीकारने पर आमदा है और ऐसे मे नैसर्गिक समृद्ध जीवन निढाल हो चुका है कर्तव्य विमुख मानव , राजधर्म में जिस तरह से समृद्ध जीवन विलख रहा है और अपनी दुर्दशा पर आंॅसु बहा रहा है । वह उसका यह नैसर्गिक स्वभाव नही क्योकि सृजन मे मानव जीवन रक्षा का बड़ा आधार सिद्ध रहा है । मगर जिस पशुवत संस्कृति का शिकार , आज समृद्ध जीवन हो रहा है वह किसी महापाप ही नही किसी जीवन द्रोह से कम नही है । अगर हम यो कहै कि आज संुसस्कृत सभ्यता जिस तरह से थर्रा रही है उसके परिणाम आने बाले समय में कोई बहुत अच्छे रहेने बाले नही । छद विच्छद स्वार्थ वत प्रयासो के बीच पनपता अंधा सम्राज्य वाद आखिर कार कहा ले जाकर छोड़ेगा फिलहाॅल कहना मुश्किल मगर इतना तय है कि अगर सत्ताओ ने सुनिश्चित सुरक्षा न्याय आधार तय नही किये जो उसका नैसर्गिक अस्तित्व का आधार है वह भी आने बाले समय में सुरक्षित रहने बाला नही बात साधारण हो सकती है मगर इसके आधार निर्मूल नही हो सकते । जहां तक पशुवत संस्कृति का सबाल है तो पशुवत संस्कृति में जीवन सुरक्षा का आधार का उसके नैसर्गिक स्वभाव पर निर्भर करता है जिसमें अपनी जान मान की सुरक्षा उसके स्वयं के सामथ्र्य के आधार पर सुनिश्चित होती है शेष नैसर्गिक पशुवत व्यवस्था अनुसार सुनिश्चित होती है । मगर मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने नैसर्गिक स्वभाव और स्थापित संस्कृति संस्कार अनुसार सभी के लिये न्याय और सुरक्षा तथा समृद्ध जीवन के आधार सुनिश्चित करने में सक्षम सफल रहा है जिसने जीवन मे सत्ता के आधार और अस्तित्व की स्थापना की और आम जीवन ने उसे सहर्ष मान्यता दे उसे स्वीकार अंगीकार किया । आज जब न्याय , सुरक्षा को जीवनो के बीच संघर्ष छिड़ा ऐसे मे सत्ता सामथ्र्य की कर्तव्य विमुखता जो आम जीवन को स्वयं के विवेक अनुसार न्याय सुरक्षा प्राप्त करने खुला छोड़ समृद्ध जीवन की कलपना करती हो ऐसे मे कैसै न्याय सुरक्षा के सिद्धान्त का पालन हो सकता है कैसै समृद्ध जीवन सुरक्षित रह सकता है हमें यह नही भूलना चाहिए कि हमारे महान भूभाग का आधार नैसर्गिक रूप से ही नही अध्यात्म वैज्ञानिक आधार पर भी सिद्ध है और इस भूभाग का सृजन समुचे भूभाग से अलग अद्यभुत चमत्कारी और श्रेष्ठ है जहां आज भी बड़े बड़े वैज्ञानिक आधार के प्रत्यक्षदर्शी प्रमाण तो अद्यभुत प्रतिभाओ के भण्डार है । मगर ज्ञान के अभाव में षड़यत्रकारी , स्वार्थवत इतिहास कारो के दबाब में आज भी हम सच्चाई से कोशो दूर है जिसे लोग आज आस्था आध्यात्म का आधार मानते है वह अनादि काल से ही मौसम को पहचानने का वैज्ञानिक आधार है मांॅ गगा का जो धर्मग्रन्थो मे उल्लेख है उसका प्रमाणिक आधार आज भी हमारे बीच है मगर समझ का अभाव जिस तरह से आज तक हमें सृजन मानव धर्म का विज्ञान समझने समझाने मे अक्षम असफल रहा वह क्रम आज भी जारी है । और श्रेष्ठ सृजन योग्य जीवन कर्तव्य विमुखता के चलते न्याय सुरक्षा देने मे अक्षम सिद्ध हो रहा है । जिसे आने बाले समय मे मानव जीवन की सबसे बड़ी अक्षता ही कहा जायेगा जो मानव जीवन पर कलंक ही नही एक काला धब्बा सिद्ध होगा और जीवन की श्रेष्ठता बांॅझ । क्योकि अनुभूति एहसास ही हर निष्ठ जीवन के कर्तव्य की प्रमाणिकता होती है जिसका सिद्ध होना ही मानव जीवन की श्रेष्ठता रही है । जय स्वराज ।  


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