कर्तव्य , जबाबदेही पर भारी पढ़ते , अधिकार
गैंग ,गिरोह , माफिया संस्कृति से जूझते ,जीवन सरोकार
प्रायवेट , लिमिटेड , बहुराष्ट्र्ीय होता , सेवा कल्याण
भ्रमित होता सृजन आधार , डूबती समृद्ध संस्कृति संस्कार
जीवन सिद्धान्त को आयना दिखाते , स्वार्थवत सरोकार
व्ही. एस. भुल्ले
3 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है किसी भी जीवन का नैसर्गिक स्वभाववस स्वार्थी होना स्वभाविक है । और कर्तव्य के प्रति दृढ़ होना उसकी नैसर्गिक संस्कृति संस्कार जिसका निर्वहन उसे हर कीमत , हर हाल मे जीवन पर्यन्त करना होता है जिसका पालन , सृष्टि मे मौजूद वह हर जीवन करता भी है और उसके लिये वह प्राप्त अपनी नैसर्गिक क्षमता अनुसार बाध्य भी होता है । जो वह अपने जन्म और आधार से लेकर अस्तित्व के साथ लेकर आता है । फिर वह जीवन पैड़ पौधे वनष्पति , जीव जन्तु , पशु पक्षी या फिर मानव के रूप मे हो उनकी जीवन मे अपनी अपनी श्रेष्ठता और सृजन मे उपयोगिता कर्तव्य है जिसका वह अपने जीवन में निष्ठा पूर्ण निर्वहन भी जीवन पर्यन्त करते है । मगर सबसे अहम जीवन मानव का माना गया जिससे उम्मीद विद्याता रख छोड़ी है जिसे सर्बकल्याण के लिये अपने प्राप्त नैसर्गिक आधार स्वभाव अनुसार अधिक सक्षम सफल सिद्ध माना गया जो सृष्टि में मौजूद सभी जीवनो के संबर्धन ,संरक्षण मे सफल सिद्ध हो जिससे सृष्टि मे समृद्ध जीवन का मार्ग प्रस्त हो और सृष्टि में मौजूद समस्त जीवन समृद्ध खुशहाॅल जीवन का निर्वहन कर अपनी जीवन या़त्रा सफल सिद्ध कर सके । मगर हजारो बर्षो का मार्ग तय करते करते जीवन की श्रेष्ठतम कृति और श्रेष्ठ संस्कृति संस्कार कहा आ पहुॅचे है जिसके आगे का रास्ता कितना कंटको से भरा रहने बाला इसका आभास शायद मानव को अभी कुछ बर्षो न हो क्योकि जिस गिरोह , गैंग , माफिया संस्कृति का प्रभाव सियासी , व्यवसायिक , सामाजिक तोैर पर बढ़ रहा हे और सेवा कल्याण का दायरा प्रायवेट , लिमटेड , बहुराष्ट्र्ीय होता जा रहा है वह बड़ा ही डराने बाला है । जो आज क्या ? न तो पहले न ही भबिष्य में समृद्ध खुशहाॅल जीवन का आधार सिद्ध होने बाला है । मगर आज सबसे बड़े चिंता का विषय तो वह भ्रमित मौजूद जीवन आधार है जिस पर सबकी निगाहै टकटकी लगाये बैठी है जब जीवन को लेकर आधार ही भ्रमित होगा तो जीवन समृद्ध खुशहाॅल कैसे होगा ? जिस तरह से आज स्वार्थवत जीवन सरोकार समृद्ध जीवन की बाधा बन मानव जीवन को जिस तरह से कलंकित करने पर उतारू है उससे वह महान संस्कृति संस्कार तो कलंकित लज्जित हो ही रहै बल्कि वह पुरूषार्थ सामथ्र्य सहित वह महान कीर्ति भी बांझ सिद्ध हो रही है । सच कहा जाये तो आज हमारा संघर्ष जीवन से कम अपने स्वयं के मूल से ज्यादा है । जिसे आक्रांताओ ने तो अपनी महात्वकांक्षाओ के चलते जमीदोस किया साथ ही उन साम्राज्यवादी ताकतो ने भी समय समय पर लहुलुहान किया है और हमारा दुर्भाग्य की हम आज भी उसे सरक्षण सुरक्षा देने मे उसे प्रस्फुटित करने मे अक्षम असफल सिद्ध हो रहै है । बजाये हम श्रेष्ठतम संस्कृति संस्कारो को संरक्षण देने के स्थान पर उसे आयना दिखाने मे अपने सामथ्र्य पुरूषार्थ की सिद्धि करने मे लगे है जो मानव के नैसर्गिक स्वभाव उसके आधार को कलंकित लज्जित करने काॅफी है । और मानव जीवन के रूप मे लज्जाजनक भी अब विचार हमे करना है कि कैसै हम मानव जीवन को उसके नैसर्गिक स्वभाव उसके आधार अनुरूप सिद्ध सफल कर सकते है । जय स्वराज ।

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