कर्तव्य बिमुख होते, सत्ता ,सामथ्र्य , संसाधन

 

झूठ के आंकड़ो ने बिगाड़ा खेल  

अनुभूति का अभाव बना आशा अकांक्षाओ का दुश्मन 

संकटो से घिरा लोकमत , बिलबिलाता लोकतंत्र 

व्ही. एस. भुल्ले 


6 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

तकनीक के आगे गिड़गिड़ाता बैबस लोकमत और सरेयाम बिलबिलाता लोकतंत्र भले ही 21सबी सदी की समृद्ध नजीर हो मगर समृद्ध जीवन की अनुभूति का अभाव आज निसंदेह आशा अकांक्षाओ का दुश्मन नजर आता है क्योकि कर्तव्य बिमुख होती सत्ताओ , सामथ्र्य और संसाधनो के बीच झूठ के आंकड़ो ने आजकल जबरदस्त पैठ जमाई है उससे समृद्ध जीवन बिचलित तो आमजीवन का विश्वास डगमगाया हुआ है । कभी करोड़ो को रोजगार तो हालिया आंकड़ा चंद महिने में ही लगभग 13 लाख लोगो को औपचारिक अनौपचारिक रोजगार मुहैया कराता सामथ्र्य भले ही अपने पुरूषार्थ प्रदर्शन पर नही थकता हो और हकीकत उससे भले ही जुदा हो मगर वरवाह किसे जो सत्ता मोह त्याग श्रेष्ठ मानव जीवन का उदाहरण प्रस्तुत कर अपनी संस्कृति संस्कारो को श्रेष्ठता प्रदान करे । अंधी सियासत का कायल हो चुकी सत्ताओ को अब तो यह भान भी न रहा कि जो वह सतत सत्ता के लिये कह सुन रहै है । जिस तरह का आचरण व्यवहार श्रेष्ठजनो के साथ कर रहै है ,और यह आकड़े जिन्है सुना दिखा वह भरमाना चाहते है वह अपने ही बीच के लोग है आज नही तो कल हमे उन्ही के बीच रह शेष जीवन व्यतीत करना है । मगर कहते है सत्ता मद होता ही ऐसा है । आज जब जन्मजात सत्ता का अधिकार लेकर पैदा होने बाले स्वयं का शेष जीवन आम मानव के साथ एक सामान्य मानव के रूप में जीना चाहते है तब की स्थति मे सत्ता का ऐसा अंधा व्यवहार और वह अहंकार समझ से परे है । हकीकत यह है कि मलाई काटने बालो के चेहरे आर्दश्य हो सकते है तो आर्दश्य लोगो के पुरूषार्थ पर मलाई काटने बाले अब लगता है अंधे बन माल कबाड़ने और सेवा कल्याण के नाम मौज मस्ती का जीवन बिताने पर तुले है । बात अप्रिय हो सकती है । मगर कहते है आखिर सत्य कहने मे क्या कोताही सो जो घट रहा है वह लोगो के सामने होे तो इसमे बुराई ही क्या ? मगर दर्द और दुख आज हर मानव को इस बात पर अवश्य होना चाहिए कि जो ऐसा आचरण अपने स्वार्थो के लिये व्यवहार अपनी झूठी शान बड़ाने के लिये कर रहै है वह भी हमारे अपने ही है हमारे बीच से ही है । हो सकता है उन्होने कोई अन्य संस्कृति संस्कारो मे अपनी आस्था रख छोड़ी हो मगर इतना तय है कि सार्थक सफल वही संस्कृति संस्कार रहने बाले है जिस पर मानव जीवन का आधार टिका है । अपने ही भोले भाले लोगो से कदाचरण समय सामथ्र्य संसाधनो का दुरूपयोग किसी को नही बख्सने बाला क्योकि उसका नैसर्गिक स्वभाव भी न्याय का है सो वह अनुभूति मे हो व्यवहार मे जीवन मे उसका सन्तुलन ही सबसे बड़ी कसौटी है । ऐसे अनेको उदाहरण जीवन मानव के हमारे सामने है आये दिन हम उन्है देखते भी है मगर मौजूद मानव जीवन तथागत मानने तैयार नही । यू तो मानव जीवन का विनाश उसकी समृद्धि का इतिहास लम्बा है कभी सनक लिये हजारो लाखो सत्ता के लिये एक ही दिन मर खब जाते थे मगर आज जिस तरह से जिन्दा लोग महात्वकांक्षाओ के लिये सरेयाम मौत से बत्तर जीवन बिताने के बैबस मजबूर है वह कभी भी नही सराहे जाने बाला । मगर दुर्भाग्य की इस कृत्य पर भी आखिर किसे शर्म का एहसास है और कौन इन बातो पर विचार करे आज यही सबसे बड़ा सबाल है नव समृद्ध जाति समाज निर्माण में जुटी वह कौम यह भूल रही है कि जीवन सीमित है । 100 मे 50 निद्रा मे तो 25 समृद्ध जीवन का आधार सुनिश्चित करने मे निकल जाते है शेष 25 के लिये जीवन से जघन्य द्रोह आखिर क्यो ? यही आज हम सभी को समझने बाली बात होना चाहिए । जय स्वराज । 


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