सत्ता द्वारा , सत्ता के लिये , स्थापित सत्ता , लोकतंत्र से बड़ा घात
ऐसी सत्ताये कभी कल्याणकारी नही हो सकती
आम नागरिक और युवाओ की समीक्षा बन सकती सारथी
द्रोह पर उतारू सियासी आस्था
व्ही. एस. भुल्ले
6 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
आज जिस रास्ते या पूर्व से जो रास्ता सत्ताये सतत सत्ता मे बने रहने इख्तियार करती रही है या बर्तमान मे भी कर रही है कहते है ऐसी सत्ताये कभी कल्याण कारी नही हो सकती अगर वाक्य में ही हमारे लोकतंत्र मे ऐसी सत्ताओ का बोलबाला बढ़ रहा है और सियासत ऐसी सत्ताओ की गुलाम बन चुकी हो तो फिर शिकायत कैसी ? मगर द्रोह पर उतारू सियासी आस्था का आचरण व्यवहार इसी तरह सत्ता द्वारा , सत्ता के लिये , स्थापित सत्ता की चाकरी करने का बना रहा है । तो वह दिन दूर नही जब लोकतंत्र स्वयं ही बांझो की श्रेणी मे पहुॅच जाये तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । कल्याणकारी भाव के साथ जनतंत्र मे अस्तित्व हासिल कर अपना आधार सुनिश्चित करने बाली सियासत शायद यह भूल रही है कि उसका अस्तित्व भी तभी तक सुरक्षित है जब कि लोकतंत्र बरना अभी तो हालात चाकरी जैसे है आगे यही व्यवहार अगर गुलामी में तब्दील हो जाये तो अचरज की बात नही ऐसे कई सियासी दल आज अपने अस्तित्व से जूझ रहै है तो कई अपना खोया आधार तलाश रहै है मगर बर्तमान मे ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जी लेने की चाहत ने आम मानव को इतना अंधा कर रखा है कि न तो उसे सुचिता नजर आती है न ही उसका सेवा कल्याण से दूर दूर का कोई बास्ता रह गया । अगर ऐसे मे श्रेष्ठ जन जीवन मे आस्था रखने बाले नागरिक युवा जागे तो वह निश्चित ही एक ऐसी समृद्ध व्यवस्था , जीवन और खुशहाॅल जीवन के सारथी बन सकते है जो आजादी से लेकर आज तक आम जीवन मे अपेक्षित है जो हर जीवन का सपना है । काश यह समृद्ध कौम , समाज वह सामथ्र्यशाली पुरूषार्थी ऐसा कर पाये अपनी निष्ठा कर्तव्य को अपना धर्म कर्म और समृद्ध जीवन का सही मार्ग मान एक नई शुरूआत कर पाये तो यह आम जीवन के लिये सोन में सुहागा सिद्ध होगा क्योकि मौजूद आस्थाओ से अब यह उम्मीद करना बैबानी होगी जिन्होने समृद्धि का आधार आकड़े और जन धन पर स्वयं की समृद्धि और सत्ता द्वारा सत्ता के लिये सत्ता का सिद्धान्त बना स्वयं को सिद्ध निष्ठ समझ रखा है अब विचार हर नागरिक को करना है कि वह कैसा बर्तमान , भबिष्य मौजूद जीवनो के लिये चाहते है । जय स्वराज ।

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