आन्तरिक सुरक्षा सिद्ध करने में अक्षम सिद्ध होती सत्ताये


स्वस्वार्थ और वोट लालसा मे टूटते जीवन आधार  

सत्ता मूल से द्रोह करते मौजूद संसाधन सरोकार 

वीरेन्द्र भुल्ले 


30 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

भोपाल म.प्र. - गत दिनो देश के ग्रह मंत्री अपने औजस्वी उदवोधन मे सुरक्षा की कमान सम्हालने बाले संसाधनो और म.प्र. की सत्ता को बड़े ही वैज्ञानिक तकनीक से सुसज्जित आधार को अपराध रोकने अपराधियो को कानूनी दायरे मे ला न्याय का राज कायम करने के कई टिप्स दे यह उम्मीद जाहिर कर गये हो कि मौजूद हालात मे सुरक्षा को लेकर क्या चुनौतिया हो सकती है और उनसे कैसै निपटा जाये मगर उनकी पीठ फिरते ही ऐसा कुछ म.प्र. के मौजूदा संसाधनो के बीच ऐसा कुछ नही दिखा जिससे यह कहा जा सके कि जिस संवेदनशीलता के साथ जिस गम्भीरता के साथ ग्रहमंत्री ने आन्तरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने अकेडमी मे बारिक से बारिक पहलू को समझाते हुये उम्मीद जाहिर की वह भली भूत होने बाली है । लगता है सत्ताओ मे अब सुरक्षा के मायने और संसाधनो पर्याय सियासी बनते जा रहै है और जिन संस्थाओ पर जीवन को सुरक्षा देने का भार है वह संस्कारी होते जा रहै है परिणाम की वह अपने मूल को भूल आग्रहीयो की श्रेणी में स्वयं को स्थापित कर अपने अपने कर्तव्य निभा रहै है परिणाम कि आम जीवन भय या दहसत के बीच जीवन निर्वहन को मजबूर है और खरगौन , राजस्थान मे करौली और दिल्ली सहित पटियाला मे हुई घटनाये को झेलने पर मजबूर है मगर कारण पर्याप्त सुरक्षा बल संसाधन और आम समाज मे सूचना , संबाद का अभाव । यह विचित्र दुर्दशा है कि बैबजह के कार्यक्रमो मे करोड़ो फूकने बाली सत्ताये जीवन रक्षा में न के बराबर धन खर्चने तैयार नही अगर हम म.प्र. का ही अदाहरण ले तो । 52 जिलो बाले इस प्रदेश मे एक लाख के करीब नगर सेना अर्थात होमगार्ड के सेवक बड़ा देते है । तो सरकार पर लगभग 3600 करोड़ का अतिरिक्त भार होगा । जिससे आम जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक बड़ी सफलता हो सकती है । मगर आज की सियासत में शायद जीवन रक्षा उतना बड़ा बिषय नही क्योकि चुनाव सुरक्षा से कम सेवा कल्याण के मार्ग के आग्रही हो चुके है भले ही कानून का राज तार तार होने को बिबस हो मगर सियासत कमजोर नही होनी चाहिए । बहरहाॅल जो भी आज नही तो कल अगर जीवन की रक्षा नही रही उसको सुसंस्कृत स्वस्थ बनाने के प्रति सत्ताओ की अरूचि ऐसे ही बड़ती रही तो वह दिन दूर नही जब कानून का राज तो होगा मगर वह बैबस मजबूर ही बना रहेगा और उसका खामियाजा आम जीवन को इसी तरह भोगना होगा । जय स्वराज । 


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