फूल से कोमल , बज्र से कठोर


स्वछंद शास्त्रार्थ के अभाव में , दम तोड़ती श्रेष्ठता 

स्वयंभू शास्त्रार्थ , ज्ञान , कल्याण में डूबा मानव 

व्ही. एस. भुल्ले 


16 अप्रेल 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

जम्बूदीपे भरत खण्डे , सुसंस्कृत , शोधश्री , शिक्षित , श्रेष्ठ संस्कारी , सर्बकल्याणकारी भाव के उत्तराधिकारी , रहबासी होने पर हर श्रेष्ठ मानव को गर्व भी होता है और उसे गौरव की अनुभूति भी होती है । जो कभी समक्ष सभा , तार्किक , यथार्त शास्तार्थ से सिद्ध था । मगर जब से काल परिस्थिति अनुसार स्वयं स्वार्थ सत्ताओ के अहंकार , महात्वकांक्षाओ के चलते इनका क्षरण हुआ , स्वकल्याण में डूबी मानवता ने सर्बकल्याण का अनादर कर उसे अपमानित किया तब से लेकर अब तक अहंम अहंकार , महात्वकांक्षा , स्वकल्याण का ही झण्डा बुलंद होता रहा । अब इसके उत्तराअधिकारी समय काल परिस्थितिजन्य जो भी रहै हो उनका जो भी सामथ्र्य , पुरूषार्थ रहा हो मगर मानव जीवन और शेष जीवन उतना श्रेष्ठ संस्कारी शोधित शिक्षित सुसंस्कृत सर्बकल्याण में सिद्ध नही हो सका जिसके लिये वह सृजन मे जीवन के रूप मे अस्तित्व मे रहा । कारण वही जो आज भी मौजूद है । जो पहले भी रहा अगर जीवन का इस महान सृष्टि मे यही यथार्त है तो फिर सारी निष्ठा और कर्तव्यबौध स्वतः बैमानी हो जाती है । मगर यह सम्पूर्ण सत्य नही । इतिहास धर्म ग्रन्थ , किवदन्तियो कहानियो मे ऐसे अनेको अनेक उदाहरण है जो यह सिद्ध करने काॅफी है कि मानव जीवन के अलावा सृष्टि मे मौजूद जीवन का क्या अर्थ आधार कर्तव्य है । और श्रेष्ठजीवन का क्या निदान है । क्योकि यह प्रमाणिक सत्य है कि मानव जीवन को छोड़कर इस पृथ्वी पर एक भी जीवन ऐसा नही जो अपने नैसर्गिक स्वभाव मे परिवर्तन कर अपने कर्तव्य से विमुख हो सके । भले ही उसके प्राणो की ही आहूति उसे अपने श्रेष्ठतम नैसर्गिक कर्तव्य निर्वहन के साथ ही क्यो न देना पढ़े । जैसै पृथ्वी पर मौजूद पेड़ पौधे वृक्ष , जीव जन्तु जानवर पशु , पक्षी सभी को सृष्टि मे स्वछंद रूप से जीवन निर्वहन और विसर्जन का अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप है । मगर मानव सृजन की वह श्रेष्ठतम कृति है पृथ्वी पर मौजूद जीवनो मे श्रेष्ठजीवन है जो इन सारे जीवनो मे श्रेष्ठ सक्षम और सुसंस्कृत है और उसका नैसर्गिक आधार समस्त जीव जन्तुओ श्रेष्ठ इसिलिये पृथ्वी पर मौजूद हर जीवन का संरक्षण उनका संवर्धन करना उसका नैसर्गिक कर्तव्य भी है । जो विभिन्न विद्याओ वैद पुराणो इतिहास से भी स्पष्ट है । आज जब हम सर्बकल्याण की बात करते है मानव जीवन की श्रेष्ठता उस समृद्ध खुशहाॅल जीवन की बात करते है जिसे हमारे पूर्वजो ने पूरे मान सम्मान स्वाभिमान के साथ जिया और अपने नैसर्गिक कर्तव्यो का पालन करते हुये इस मानव जीवन को धन्य किया । उसकी कीर्ति स्थापित कर समस्त मानव जगत को श्रेष्ठ जीवन का संदेश स्वछंद शास्त्रार्थ , तार्किक प्रमाणिकता से साथ दिया । जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी मानव जीवन  मेहसूस कर उसका जीवन में सार्थक एहसास करता रहा । और जो क्रम आज भी जारी है मगर जिस तरह से आज या कुछ हजारो बर्ष पूर्व स्व कल्याण अहंम अहंकार , महातवकांक्षाओ की पूर्ति हेतु स्वशास्त्रार्थ  का क्रम शुरू हुआ उससे सृजन जनित निष्ठाओ का विनाश तो हुआ ही बल्कि उसने मानव की नैसर्गिक आस्थाओ उसकी नैसर्गिक निष्ठाओ को भी खण्ड खण्ड कर दिया । जो आज सिर्फ मानव जीवन ही नही शेष जीवनो के लिये भी बज्र की भांति कठोर नजर आते है । अब ऐसे फूल की तरह जीवन की कल्पना , समृद्ध खुशहाॅल जीवन की आशा आकांक्षा बांझ नजर आती है । मगर ऐसे में मानव जीवन का न उम्मीद होना उसका न तो नैसर्गिक स्वभाव हो सकता है न ही उसके जीवन का आधार सो जब तक जीवन है उसे अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप अपने निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन को करते रहना चाहिए । क्योकि हमें यह नही भूलना चाहिए कि सृष्टि विधान विरूद्ध विधि मानव ही नही किसी भी जीवन संस्कृति संस्कारो शिक्षा , शास्त्रार्थ को श्रेष्ठ समृद्ध खुशहाॅल नही बना सकती । यह कटु सत्य है । इसलिये सृष्टि मे या पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीवनो को समान अवसर , स्वछंद वातावरण और संरक्षण अवश्य मिलना चाहिए और यह तभी संभव है जब हम तर्क प्रमाणिकता के आधार पर श्रेष्ठतम शास्त्रार्थो के लिये वातावरण निर्मित करे और श्रेष्ठता , सज्जनता का मान सम्मान करे । वरना स्वश्रेष्ठता हमे न तो उन श्रेष्ठजनो का उत्तराधिकारी रहने देगी न ही मानव जीवन के उस आधार के रूप मे पहचान दिला सकेगी जिसकी मान्यता किसी सीमा संस्कृति संस्कारो की मोहताज होती है । अब विचार हमे करना है । कि हम कैसे मानव जीवन के रूप मे अपनी कर्तव्य निष्ठा और मानव जीवन को विसर्जित करना 

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