पशुवत संस्कुति में स्वाहा होता मानव आधार
शिक्षा , स्वास्थ , सुरक्षा हुई तारतार
बैलगाम हुये सियासी सरोकार
व्ही. एस. भुल्ले
2 मई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
मानव आधार से संघर्ष करते पशुवत संस्कार कभी मानव सभ्यता में इतने प्रभावी हो सकते है शायद ही किसी ने सपने में सोचा होगा । मगर तार तार शिक्षा , स्वास्थ , सुरक्षा की सिद्धता इस बात का प्रमाण है कि बैलगाम सियासी सरोकार समृद्ध जीवन की विद्या को किस तरह से रौधने में लगे है । साम्राज्यवादी सोच की छत्रछाया मे पनपते पशुवत संस्कार मानो अब जीवन आधार बनते जा रहो हो जिस पर गर्व गौरव मेहसूस करने मे आज न तो सत्ताये , न ही शिक्षा , स्वास्थ , सियासी माफिया और न ही सुरक्षा सरोकार शर्म मेहसूस करतेे है । मगर आज का यथार्त सत्य यही है । जहां सत्ता का आधार ही संख्याबल हो और वही संख्या बल का आधार विवेक पर भारी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम किस व्यवस्था का भाग है । और उस व्यवस्था से आम मानव जीवन को क्या उम्मीद रखनी चाहिए मगर यथार्त के बीच हम मानव जीवन के मूल को ही भूल जाये यह भी संभव नही जो शिक्षा कभी समर्थ सुस्कुत जीवन समाज का मूल आधार हुआ करती थी जिसमे स्वास्थ ज्ञान वर्धन के साथ विवेक निर्माण का श्रेष्ठतम सामथ्र्य निहित होता था और एक ज्ञान वान स्वस्थ शरीर का निमार्ण होता था तथा सुरक्षा भाव जीवन संस्कारो मे निहित था आज वह बैलगाम सियासी सरोकारो के चलते चारो खाने चित पढ़ा है । जिसमें सुधार की संभावना अब दूर दूर तक नजर नही आती क्योकि यह क्षैत्र अब साम्राज्यवादी सोच की छत्रछाया मे माफिया के गढ़ बन चुके है । और वह अब इतने प्रभावी सक्षम हो चुके है कि अब उनका बाल उखाड़ पाना भी दूर की कोणी हो चुका है । यही हाॅल आज बैलगाम सियासत है । कोई लोकतंत्र की सियासत मे कितनी ही दुहाई क्यो न दे मगर हकीकत यह है कि आज हर दल बिशेष मे माफिया सोच का साम्राज्य खड़ा होता जा रहा है । बजाये लोकतांत्रिक सोच के , मगर यह वह व्यवहारिक सच है , पनपती पशुवत संस्कृति के चलते शायद ही इस अहम मुददे पर किसी को विचार करने की फुरसत हो मगर समृद्ध जीवन की पहली शर्त यह कि सर्बकल्याण का आधार उसके संसाधन और उनकी श्रेठता पर निर्भर करता है । परिणाम कि आज न तो वह जीवन्त शिक्षा , स्वस्थ , सुरक्षित जीवन के समृद्ध आधार बन पा रहै है न ही लोगो मार्ग समृद्ध जीवन के लिये प्रस्त कर पा रहै है जो हर जीवन के लिये अहम मसला होना चाहिए । बारूद की तरह फूकते अपने सामथ्र्य पुरूषार्थ संसाधनो का दर्द यही है कि आखिर जीवन को मानव संस्कृति और पशुवत संस्कृति का अन्तर कैसै समक्षा पाये जिससे मानव जीवन एक मर्तवा फिर से श्रेष्ठ समृद्ध जीवन में जाना पहचाना जा सके । जो मानव सभ्यता की शेष पूॅजी के रूप में जाना जा सके । क्योकि मानव जीवन मे आज जिस तरह से ज्ञान या अज्ञानताबस जो क्रम श्रेष्ठ समझ का टूटा है सबाल यह है कि वह कैसै जोड़ा जा सके जिसका आज कोई ओर छोर नही आता काश जितनी जल्द हम इस सत्य को समझ पाये उतना ही मानव सभ्यता के लिये उचित होगा वरना मौजूदा हालात मौजूदा पनपती संस्कृति के बीच बहुत सुरक्षित या मेहफूज नही । जय स्वराज ।

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