गैंग गिरोहबंद सियासत में बड़े सियासी गैंगबार के आसार
आम आशा अंकाक्षाओ के नाम छिड़ा सियासी संग्राम
सेवा कल्याण अनाथ तो सर्बकल्याण हुआ बांझ
विनाश नीति से थर्राई राजनीति
व्ही.एस.भुल्ले
22 मई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
सर्बकल्याण के भाव के बीच गहरी जड़े जमा चुका स्वकल्याण गैंग गिरोहबंद सियासत में कभी इस तरह बांझ होगा किसी ने शायद सपने में भी न सोचा होगा । और सेवा कल्याण अनाथ बन अपनो के ही बीच इस तरह बिलाप करेगा तथा आम आशा अकांक्षाओ के नाम छिड़े सियासी संग्राम के बीच ऐसा घमासान मचेगा जिससे आज आम जन जीवन ही नही राजनीति तक थर्रा रही है । इससे साफ है कि सियासत में पनपते नये नये गैंग गिरोहो में बढ़ती महात्वकांक्षाओ , स्वकल्याण के भाव के बीच अब जबरदस्त गैंगबार होना तय है । मानो वैचारिक आधार पर सर्बकल्याण का नारा बुलंद करने बाले वह सियासी दल भी आज बौने साबित हो रहै हो । जिस दल का कार्यकर्ता सत्ता में बैठ अपने दल के वैचारिक आधार को मजबूत करने के साथ आम आशा अकांक्षाओ को पूर्ण करने ऐड़ी चोटी का जोर लगा स्वयं को धन्य समझते थे आज ऐसे दलो के मुखिया सत्ता के पिछबाड़े बैबस खड़े नजर आते है और आज कल सत्ता ही नही कई संगठनो मे पनपते अघोषित गैंग गिरोह इतने मजबूत होते जा रहै है कि अब न तो उन्है आम आशा अकांक्षाओ का कोई भय रहा न ही उनके मन में वह आदर सम्मान खास कर अपने ही नेताओ के प्रति जो दल या संगठनो का नेतृत्व करने का दम भरते है अगर सीधे सीधे कहै तो आज विचार और वैचारिक संगठन सत्ता के पिछलग्गू बन न तो राज के प्रति अपनी जबाबदेही सुनिश्चित कर पा रहै है न ही उन नीतियो को मूर्त रूप दे पा रहै है जिनके लिये उनका वैचारिक आधार और अस्तित्व है । ऐसे सर्राटे भरती विनाशनीतियो से अब तो मानो स्वयं राजनीति तक थर्रा रही है । परिणाम कि आज वैचारिक विरोध का स्थान और कल्याणकारी नीतियो का स्थान सर्बकल्याण का न होकर व्यक्तिगत या स्वकल्याण तक सीमित हो चला है और सत्ता को लेकर तल्खी इस हद तक जा पहुॅची है कि आरोप प्रत्यारोपो के बीच मानो गैंगबार चल रहा हो । जो कार्य सर्बकल्याण मानव , जीव जगत कल्याण के लिये होना थे वह तो आज तक शुरू ही नही हो सके । बल्कि प्रयोग दर प्रयोगो ने मानव जीवन को अब एक प्रयोग शाला बना कर छोड़ दिया है आज समाधान का स्थान झूठे आश्वासन और प्रचार प्रसार ने सम्हाल रखा है । एक चोर को पकड़ने सिपहसालार के उपर सिपहसालार नियुक्ति का जो फाॅरमूला चला अब तो वह भी दम तोड़ने लगा है । जिसका स्थान अब भाई लोग को लगाया जा रहा है क्योकि समाधान देने बालो का तर्क यही है कि अब व्यवस्था का आधार वैधानिक न होकर व्यवहारिक हो जिससे सत्ता बची रही और आम आशा अकांक्षाओ के बीच समाधान को लेकर लठम लठठा मचा रहै । जो मानव के नैसर्गिक आधार पर कंलक तो है ही साथ ही उस सामथ्र्य पुरूषार्थ का कायराना प्रदर्शन भी है जो न तो हमारा इतिहास है न ही बर्तमान और न ही भबिष्य रहने बाला । यह विचार उन मूड़धन्यो को अवश्य करना चाहिए जो आज तक स्वकल्याण मे आस्था रखते आये है । और जिनके लिये सर्बकल्याण का नारा सोने की खान । आज बड़ा दर्द भी होता है और दुख भी हम सुसंस्कृत समृद्ध सामथ्र्यशाली होने के बाबजूद स्वयं का जीवन तो लांछित कर ही रहै है । साथ ही अपने पूर्वजो कि कीर्ति को भी कलंकित कर रहै है । नही तो हम आज विश्व गुरू तो हम पहले ही थे और आज भी होते मगर न तो हम अपने को ही समझ पाये न ही हम उन समझदारो का अपने अपने अहंम अहंकार के चलते और स्वस्वार्थो के चलते सर्बकल्याण में सोच पाये जो हमारी पहचान कायम कर हम पृथ्वी के श्रेष्ठ मानवो की श्रेणी में लाकर खड़ा कर सकता था । और हमारी समृद्धि श्रेष्ठता का ढंका स्वयं हम भारतवंसियो का यसोगान करता कास हम ऐसा कर पाये जो कोई दूर की कोणी नही इसे हम कर सकते है । अपनो कौउ नैया रे , बिना राम रघुनंदन अपनो कोउ नैया रे ।। जय स्वराज ।।

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