मूल से द्रोह , पहचान अस्तित्व का संकट


भ्रम का शिकार जीवन दुर्दशा का शिकार 

नव संस्कृति , संस्कारो के सैलाब में तार तार होते सरोकार 

स्वार्थ महात्वकांक्षाये लेे डूबी समृद्ध सृजन , जीवन आधार 

व्ही. एस. भुल्ले 


3 मई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है जीवन या सृजन में जब भी कोई अपने मूल से द्रोह करता है तो वह निश्चित ही आने बाले समय में अपने अस्तित्व ही नही पहचान का भी मोहताज हो जाता है । जिसके मूल में वह भ्रम और वह नव संस्कृति , संस्कार होते है । जिनका मूल स्वार्थ और महात्वकांक्षा होती है । जो आज सीधे तौर पर समृद्ध जीवन को चुनौती देने में कतई कोई संकोच नही करती जो आज समृद्ध जीवन ही नही भबिष्य के लिये एक बड़ा संकट सिद्ध हो इसमें किसी को भी अब कोई संदेह नही होना चाहिए । तर्क तथ्यो से बिमुख परिणाम इस बात के प्रमाण है कि कही न कही जीवन अब उस संस्कृति , संस्कारो को अंगीकार करता जा रहा है । जो स्वयं मूल से द्रोह के कारक है । और बर्तमान ही नही भबिष्य में वह अस्तित्व ही पहचान के लिये बड़ा संकट पैदा करने बाले है । ये अलग बात है कि अपने अस्तित्व से विमुख सत्ताये निश्चित ही सही मार्ग समझ देने में आज तक जो अक्षम असफल सिद्ध रही उसी का परिणाम है कि नव संस्कृतिया संस्कार अपने अपने पैर पसार समृद्ध सृजन को पथभ्रष्ट कर पर अपनी महात्वकांक्षाओ और निहित स्वार्थो की प्राप्ति करना चाहते है । कहते है सत्ता का भय न्याय को संबल देता है । मगर समृद्ध जीवन में मौजूद भय को भयमुक्त संस्कारिक अनुशासित होना आवश्यक होता है जो सिर्फ सत्ता या व्यवस्था ही दे सकती है जिसके लिये उसका किसी भी जीवन में आधार होता होता और उसका मूल भी मगर मूल द्रोह करता जीवन आज जिस स्थति में आ पहुॅचा वह किसी भी तरह सृजन योग्य या संस्कारिक नही कहा जा सकता मगर ऐसे मे सत्ताओ की ऐसी क्या बैबसी है यह तो वही जाने मगर यह आम जीवन या सृजन के हित में कतई नही कहा जा सकता । बैहतर हो श्रेष्ठजन अपने कर्तव्य की अनुभूति से मौजूद समाज को उन जीवनो को मार्गदर्शित करे उन्है वह सत्य तर्क तथ्यो के आधार पर बतौर प्रमाण बताये कि समृद्ध जीवन सृजन का सही मार्ग क्या है किसे श्रेष्ठ जीवन कहा जा सकता है वरना परिणाम सामने जो सिर्फ घातक ही नही समझ बालो के लिये भी बड़े डराबने लगते है । बैहतर हो हम अपने निष्ठ जीवन  की उपादेयता सिद्ध करने अपने अपने सामथ्र्य अनुसार पुरूषार्थ करे और समृद्ध जीवन की पहचान और उसके अस्तित्व को बचाने मे अपना योगदान दे तभी हम मानव जीवन मे होने के नातेे गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर शेष मौजूद जीवनो को समृद्ध सांस्कारिक बना पायेगे । जय स्वराज ।  



 

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