धैर्य ध्रुर्बीेरण के अचूक अस्त्र से अस्तित्व से जूझते दल


स्वस्वार्थ महात्वकांक्षाये ले डूबी वैचारिक आधार 

बैलगाम सियासी सरोकारो के बीच अधर मे अस्तित्व ,आधार 

बैरहम संघर्ष से सहमा जीवन आधार 

व्ही. एस. भुल्ले 


7 मई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

यू तो सत्ता से सर्बकल्याण , सर्बकल्याण के नाम सामथ्र्यशालियो द्वारा आम आशा अकांक्षाओ की लूट खसोट का अध्याय इस महान देश में नया नही है । इतिहास गबाह है जब जैसी सत्ताधारियो की मंशा समझ रही आशा आकांक्षाओ को बैसा कुछ भोगना सहना पढ़ा मगर जब हम उस जघंन्य इतिहास को बिसार जनता द्वारा जनता लिये जनता द्वारा संचालित व्यवस्था में और सर्बकल्याण के लिये सत्ताये अस्तित्व में है । जनता के शासन को आज लगभग सात दशक का समय हो गया है और अब वह आशा आकाक्षाये निर्मूल सिद्ध होने लगी है । ऐसे में सबाल यह उठता है कि आखिर चूक कहा हुई जो आज हम एक मर्तवा फिर से संघर्ष के मुहाने पर आ पहुॅचे है । कारण साफ है स्वस्वार्थ और अनियंत्रित महात्वकांक्षाये जो न तो उन वैचारिक आधारो को सुरक्षित रख पायी न ही उस अस्तित्व को संरक्षित रख पायी जो एक मजबूत लोकतांत्रिक सत्ता का आधार होता है । आज जब ऐसे विचारो का आधार अस्तित्व दोनो संकट में है ऐसे में ऐसा कोई रास्ता शेष नही रह जाता जो सत्ता सौपान तक जाता है । तब की स्थति में जब धैर्य और धुर्बीेकरण का अचूक अस्त्र सियासी गलियारो मे ब्राम्हास्त्र सिद्ध हो रहा है और डर के कल्याण से आशा अकांक्षाओ का सर्बकल्याण हो रहा है । अब ऐसे मे कैसै तो सियासी अस्तित्व बचेगे कैसै आधार शेष रहेगे मगर जघन्य संघर्ष की ओर बढ़ता सियासी कारबां किसका कितना भला कर सकेगा यह अलग बात है मगर इस संघर्ष से इतना तय है कि स्वस्वार्थ में डूबी महात्वकांक्षाओ का अब सर्बकल्याण मे शायद ही कोई आधार अबसर बचे । अब सर्बकल्याण में शेष बचे दलो का संकट सिर्फ जनाधार तक शेष नही रहा बल्कि वह अकूत धन संपदा तक जा पहुॅचा जिसका अभाव होना भी अब आढ़े आ रहा है क्योकि जिस आधार पर विगत 72 में लोकतंत्र फलाफूला है और जिस तरह से सत्तासुशोभित करने बालो ने स्वकल्याण में पुरूषार्थ किया और वैचारिक आधार कंगाल होता रहा अब ऐसे में वैचारिक आधार बचाने कौन खजाना लुटा सर्बकल्याण में अपना सब कुछ दांब पर लगा कल्याण करना चाहेगा । यही कारण है कि आज कल धैर्य और धुर्बीकरण का अस्त्र सियासी मैदान में कोहराम मचा रहा है और एक ही बार में न जाने किस किस को सियासी धूल चटा रहा है । ये अलग बात है कि स्वयं का अस्तित्व बचाने कुछ असफल दल अपने अपने सेनापतियो के सहारे या स्वयं मोर्चा ले गुरिल्ला युद्ध मे अपना आधार बचा मजबूत अस्तित्व तलाश रहै मगर परिणाम क्या होगे यह वह भी अच्छी तरह जानते है । मगर हालिया उठी वैचारिक चिंकारी ने अपनी जगह बना रखी है । अगर यह चिंगारी ऐसे ही परवान चढ़ती रही तो अहंम अहंकार में डूबे उस वैचारिक आधार को भी कही लेने के देने न पढ़ जाये जो अपने अपने बालो के सहारे इस भय से कही उससे से भी कोई ऐसी चूक न हो जाये जो इतिहास में होती रही है । और वह एक बढ़े लक्ष्य साथ सृजन सिद्धान्त से खेल रहै है और जो को कार्य सत्तागत होना चाहिए वह सड़को पर हो रहै जो एक वड़ी चूक साबित हो सकती है और सारी त्याग तपस्या नष्ट कर सकती है । जब तक अहंम अहंकार मे डूबी सत्ताये दल प्रतिभा , संपदा सम्मान तथा आत्म सात का सिद्धान्त स्थापित कर आत्मसात के सिद्धान्त को अंगीकार नही करती तब तक खतरा बना रहने बाला है । जो आने बाले समय में बड़े से बड़े संकल्प त्याग तपस्या को खण्डित करने काफी होगा । जिसके परिणाम शेष दलो के रूप मे सर्ब कल्याण मे सभी के सामने है । क्योकि हमें यह नही भूलना चाहिए कि यह कोई साधारण भूभाग नही और इस भूभाग की संस्कृति संस्कार इतने साधारण नही जो अपनी विरासत अस्तित्व आधार को भुला सके अब विचार सभी को करना है और भक्त विभीषण , सुग्रीव को नही भूलना है। जय स्वराज । 

 

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