पशुवत आचरण व्यवहार से संघर्ष करता समृद्ध जीवन


ऐको हम द्वितीय नास्ति के अहंकार में डूबा सामथ्र्य पुरूषार्थ 

अनाथ सेवा कल्याण के आगे बिलखता सर्बकल्याण 

जबाबदेह स्वास्थ शिक्षा सुरक्षा के अभाव दम तोड़ता विश्वास 


व्ही. एस. भुल्ले 

26 जून 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है जिन कंधो पर जीवन की सुरक्षा स्वास्थ शिक्षा अर्थात ऐसे संस्कार सिद्धांत का भार हो जिनसे समृद्ध खुशहाॅल जीवन निमार्ण का मार्ग प्रस्त हो जिसमे वह अक्षम असफल सिद्ध हो और अहंम अहंकार वस वह स्वार्थी वन पशुवत आचरण व्यवहार को श्रेष्ठ सिद्ध करने मे अपने समृद्ध श्रेष्ठ सामथ्र्य पुरूषार्थ को लगाने जुट जाये तो कैसा समाज और कैसी सत्ताये अस्तित्व और कैसी जबाबदेही अस्तित्व में होगी कल्पना कर पाना आम जीवन के बस की बात नही मगर अभी बहुत समय नही बीता है जो लगभग 50 से उपर की पारी खेल रहै है उन्होने देखा होगा समृद्ध जीवन का वह अंश जो सिर्फ स्वाभिमानी ही नही श्रेष्ठ समृद्ध आचरण व्यवहार से समृद्ध हुआ करता था लोग उस जीवन पर नाज कर स्वयं को धन्य मेहसूस करते थे और अपने पूर्वजो की विरासत को सिद्ध कर श्रेष्ठ मानव होने का प्रमाण प्रस्तुत करते थे । यू जो जीवन की लंबी यात्रा है जिसमें समय समय पर जीवन की श्रेष्ठता अपनी छाप छोड़ती रही है । जीवन को समृद्ध बनाये रखने जल से लेकर भोजन और शिक्षा सुरक्षा से लेकर संस्कारो की अकूत संपत्ति से समुचा समाज समृद्ध था मगर विगत 50 बर्षो मे जीवन जो अर्जित किया अपने सामथ्र्य पुरूषार्थ से अब उनके रूझान आना शुरू हो गये है जो बड़े ही डराबने है बिचलित कर देने बाले है । क्या हमारे पूर्वजो की हजारो साल की त्याग तपस्या अनगिनत कुर्बानियाॅ बैकार जाने बाली है । क्या मानव जीवन की वह समृद्धि बांझ होने बाली है जो हमे पशुवत आचरण व्यवहार से अलग करती थी । आखिर इन 50 बर्षो में हम ऐसा क्या नही कर पाये जो जीवन के इतने वीभत्स परिणात हमे देखना पढ़ रहै । जो शिशु कभी ढाई किलो से लेकर बजन मे 3 किलो तक का होता था उसका बजन अब क्या रह गया है । जिस देश की पहचान पग पग नीर , कुआ बाबड़ियो से हुआ करती थी उनकी क्या हालत है ? जिन गाॅबो मे सर्दी में गर्म तो गर्मी में ठण्डा जल मिला करता था शहरो के गली मोहल्लो मे दो वक्त नल घरो के अन्दर आते थे । ताल तलैयो से पटे गाॅब शहर प्राकृतिक रूप से जिन्है ठण्डा बनाये रखते थे आज उन शहरो गाॅबो कि क्या स्थति है । जो विद्यालय गुरूकुल ओर सुरक्षा का भाव यह कि पुलिस न दिख वहा अपराध ही जघन्य अपराधो का भण्डार भय ऐसा कि न्याय मांगने बालो का ही न्याय पाने से ही विश्वास उठ जाये ऐसी भयाभय स्थति को क्या नाम दिया जाये यह वह आम बाते है जिनका संबध आम जीवन से है और उस जबाबदेही से भी जिसके लिये वह अस्तित्व मे होती है फिर उसका स्वरूप सत्ताओ के रूप मे हो या फिर समाज के जबाबदेह जीवन के रूप स्वरूप कई हो सकते है मगर सभी लक्ष्य सेवा कल्याण और सर्बकल्याण ही होता है जिसके लिये वह स्वयं के बल से अर्जित सामथ्र्य पुरूषार्थ का उपयोग सर्बकल्याण और मानव जन जीवन की समृद्धि के लिये करते है । मगर आज टूटते बिलखते विश्वास के बीच आम जीवन बिलखने बिलबिलाने पर मजबूर है यह जीवन की श्रेष्ठता सिद्ध नही करती और जो अहंम अहंकार अनादिकाल से मानव सभ्यता का बड़ा नुक्सान करता आ रहा है वह क्रम आज भी जारी है । वरना क्या कारण है कि इतना शिक्षा स्वास्थ सुरक्षा नीतियो के बाबजूद न तो वह संस्कार आचरण व्यवहार हमारे बीच नजर आता जिस पर हर जीवन गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सके । शायद आज के जीवन की यही सबसे बड़ी बिडंबना है । जिससे आने बाले समय में हर जीवन को जूझना ही पढ़े तो इसमे किसी को कोई अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । जय स्वराज । 

 


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