प्रिय मेरे , जन और तंत्र में एक नागरिक हुॅ
क्या कर्तव्य के बजाय अधिकार ही अब सबसे बड़ा धर्म ?
जबाबदेही के अभाव में लज्जित होता मानव धर्म
खाद्य रसद , शिक्षा , स्वास्थ , संसाधन माफियो की जकड़ मे समृद्ध खुशहाॅल जीवन , तिल तिल मरने मजबूर
व्ही. एस. भुल्ले
19 जुलाई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
आज कुछ भी कह लो , कुछ भी कर लो , क्या होने बाला ?कौन पढ़ने कौन अमल करने बाला है ? शायद अब उनकी दुनिया अलग है । क्योकि आज उनके पास श्रोता वक्ता प्रायोजक आयोजक प्रसंसक संचालक सब उन्ही के है और उन नागरिको की दुनिया भी अब अलग है जो आस्था संस्कार बस कर्तव्य उन्मुख जीवन में आस्था रखते है। शायद यही कारण है कि समृद्ध खुशहाॅल जीवन को बचाये जाने के बजाये जीवन को और संघर्षशील मुश्किल बना उसे तिल तिल मरने बैबस मजबूर होना पढ़ रहा है । अब इस सबके के पीछे कौन है ? यह तो आने बाला समय ही तय करेगा मगर इतना तो विश्वास से कहा जा सकता है कि लज्जित इस कुकृत्य के लिये जबाबदेह न तो हमारा जन है और न ही तंत्र और न ही हमारे वह माननीय श्रीमान जिन्होने समुचे जीवन मानव जीव जगत कल्याण के लिये कठिन परिश्रम कर मानव धर्म का पालन कर स्वयं को धन्य किया है । और अपनी अपनी विद्या में स्वयं को सिद्ध भी किया है । आज उन्ही कि त्याग तपस्या का परिणाम ही कि मौजूद जीवन आज जिस भी स्थति में है कम से कम मौजूद तो है । मगर लज्जा और शर्म की बात तो यह है कि सृजन के मूल से द्रोह करते उन जीवनो को कौन समझाये जो जाने अनजाने आज समृद्ध जीवन से द्रोह कर समुची संस्कृति ही नही स्वयं मानव जीवन से द्रोह कर स्वयं को सिद्ध समझ अपनी ही मौजूद या आने बाली पीढ़ी के समृद्ध जीवन और महान भूभाग से द्रोह कर उसे बांझ अपंग बनाने में तुले है । चूकिं आज मौजूद जीवन इस भूभाग पर लोकतंत्र का हामी है जो विधि और विधान दोनो मे आस्था रखता है मगर विगत 70 बर्षो के परिणाम गबाह है कि न तो हम विधि के हो सके न ही हम विधान का सम्मान रख रसे और अधिकारो के अधंड़ मे ऐसे वहै कि कर्तव्य का ठिया ठिकाना ही खो बैठै । जिसके पीछे आज जन और तंत्र दोनो का कांरबा मय लाबो लश्कर के चल पढ़ा है । ये अलग बात है कि इस लाबो लश्कर के टापो तले रौंदे जा रहे जीवनो की चीथ पुकार सत्ता सीनो या उनके सिपहसालारो तक न पहुॅचे जहाज चैपरो में गरीबो का धन फूकने बालो के गड़गड़ाहट में सुनाई न दे जन धन से पगार बसूलने बाले प्रबंधक भले ही सच के नाम मुॅह न खोले , मगर सत्ता संघर्ष के नाम जो समृद्ध जीवन समृद्ध संस्कृति , सृजन संसाधनो का जो नाश बड़ी ही बैरहमी से जो हो रहा है वह कोई बढ़ी तबाही से कम नही । परिणाम विहीन शिक्षा , बैलगाम संस्कार खाद्न से लेकर स्वास्थ , जल एव प्राकृतिक संसाधनो पर माफिया राज यह वह उदाहरण है जिन्है हम या हमारे मूड़धन्य सेवक आज भले ही न स्वीकारे मगर इनकी मौजूद या आने बाली पीढ़िया इसके सुखद परिणामो से शायद अछूती न रह सकेगी जो सुखद के साथ आम जीवन के दुखद भी होगा । नदी जंगल तालाब झील झरनो को इस महान भूभाग पर इतिहास बनाने बाले यह भूल रहै है कि न तो नदियो , तालाबो झीलो का जल शुद्ध बच पा रहा है न ही जंगल जो हमे मूल कंद फल पत्ती छाल गाद के रूप मे भोजन औषधि उपलव्ध करा हमारे जीवनो को हमारे पूर्वजो को हजारो लाखो बर्ष तक हस्ट पुस्ट और स्वस्थ रखते आये , न ही वह शुद्ध वायु जो वृक्ष हमे प्राण वायु मुहैया कराते थे न ही वह पशुधन जिसका दूध पीकर हमारी पीढ़ियाॅ 100 से अधिक बर्ष की आयु बगैर किसी रोग व्याधा के तय करती रही मगर हो सकता है यह आज कि महात्वकांक्षी सत्ताओ स्वार्थी महात्वकांक्षियो के लिये और अपने बहुमूल्य मत का अर्थ न समझने बाले उस जन के लिये अहम न हो जो आज बेबस मजबूर और द्रग भ्रमित है । क्योकि सत्ता को हर कीमत पर सत्ता चाहिए और बैबस बैहाल लोगो को राहत तो फिर कर्तव्य का पालन कौन करे मगर कहते गिलहरी की तरह कर्म करना नही छोड़ना चाहिए भले प्रभुराम समक्ष हो या न हो । मगर जो लोकतंत्र के नाम नये नये इतिहास लिखे जा रहै वह किसी डराबने ग्रन्थ से कम नही चुनावो में वोट हासिल करने कि नई नई तकनीक उसमे आम जन की भागीदारी उसी तकनीक के माध्यम से सुनिश्चित करा लेना उसके बाद अपहरण होटलो हिल स्टेशनो की रबानगी इस बात साक्षात परिणाम है कि लोकतंत्र का कांरबा कल्याण सेवा के नाम आज कहां आ पहुॅचा । मगर यह उन लोगो के आगे बड़ा चैलैन्ज है जिनकी आस्था आज भी कर्म धर्म और कर्तव्य निर्वहन और सर्बकल्याण मे है । अब ऐसे संघर्ष सिर्फ उन महात्वकांक्षी स्वार्थी ताकतो से ही नही करना है , अब संघर्ष अपने बीच के लोगो से भी करना होगा जो बैबसी मजबूरी के चलते जाने अनजाने मे भटक स्वार्थी महात्वकांक्षीयो के चक्कर मे उलझ , विभिन्न प्रकार के लालच तथा जाति , धर्म , क्षैत्र की भावनाये अपने अपने स्वार्थो के चलते लोगो में प्रबल कर उन्है बर्बाद कर रहै है और मानसिक रूप से उन्है प्रभावित कर अधिकारो के नाम अपनी आने बाली पीढ़ियो को दांब पर लगाने बैबस मजबूर है । जय स्वराज ।

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