बैहरूपियो का मंच और सड़क पर बिलाप

 

सार्बजनिक मंथन से समाधान समृद्ध जीवन को खुली चुनौती 

महात्वकांक्षा की बलि चढ़ता खुशहाॅल जीवन 

नपुशंक हुआ पुरूषार्थ 

झूठ बोलती सत्ताये , बिलबिलाते लोग 

व्ही. एस. भुल्ले 


23 जुलाई 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

यू तो मानव , जीव जगत कल्याण और उच्च सांस्कारिक परमपराओ , के लिये सत्ताये अनादिकाॅल से अस्तित्व में रही है । मगर सभी का लक्ष्य समय परिस्थिति अनुसार जन कल्याण सृजन कल्याण ही रहा जो यह करने मे सफल सिद्ध रहै उन्है आज भी पूजा सराहा या याद किया जाता है तो कई आज भी पूज्यनीय सम्माननीय है । क्योकि जो त्याग तपस्या उन्होने सत्ता या संस्कार प्रमुख होने के नाते अपने जीवन की उसी का परिणाम है कि वह आज तक जन जन के दिलो दिमाग में छाये है और जिनका नाम आज भी इतिहास में स्वर्ण अक्षरो से दर्ज है । मगर आज का आचार व्यवहार जिस तरह से सत्ता सिंहासनो या सत्ताओ के गलियारो से आम जन को अचंभित कर रहा है वह बड़ा ही विचारणीय है । आजकल जो दौर सार्बजनिक मंथन से समाधान का चल पढ़ा है इससे यह तो स्पष्ट है कि इस पहल के सुखद परिणाम न तो आज आने बाले है न ही कल सिबाय एक और नई जघन्य समस्या के और न ही उस पुरूषार्थ का कुछ होने बाला है । जो अब नपुशंको की श्रेणी में जा पहुॅचा है । ऐसे मे सबसे बड़ी जबाबदेही सत्ताओ की होती थी कि वह स्थापित न्याय व्यवस्था की रक्षा करे मगर सत्ता गलियारो से ही झूठ के पुलंदे वहा वाह वाही बटोरने का खेल चल पढ़ा हो और सत्ताये जन धन की ताकत से स्वयं अन्तरमुखी बन अपने अपने कर्तव्यो कि इतिश्री कर रही हो जैसै उसके लिये यह लोक हो ही और शेष जीवन वह धन वैभव के आधार पर किसी अन्य लोक में बिताने बाले हो यही कारण है हर क्षैत्र मे कोहराम मचा है । हर जगह माफिया राज कायम हो चुका हे कई क्षैत्र. तो ऐसे है जहां माफिया शासकीय हाकिमो से सीधे दो दो हाथ करने मे जुट चुके है । हालियाॅ देश मे माफियाओ द्वारा तीन अलग अलग घटनाओ मे पुलिस अधिकारियो की सरेराह जान ले ली गई तो वही दूसरी ओर गैग गिरोह बन्द धन लालची शिक्षा स्वास्थ सेवा के क्षैत्र मे कूद चुके जहां वह जन धन को शासकीय योजनाओ के माध्ययम से लूट रहै है तो निरीह जनता को सीधे लूट रहै मानो आमजन का अब कोई खैरो गार न बचा हो मगर सबसे बढ़े शर्म की बात तो यह है कि सत्ताये अपने संस्थान समृद्ध बनाने के बजाये रैबड़िया बांट सत्ता के व्यवसाय में कूद रही है यही इस लोकंतंत्र जनतंत्र की सबसे बड़ी बिडंबना है । जिससे छुटकारा पाना फिलहाॅल दूर की कोणी ही जान पढ़ती है मगर सबसे बड़ा हास्यपद पहलू तो यह है जिस तरह से बैहरूपिया मंच सजते है और वाहवाही के मेले लगते है मगर बिलबिलाते जीवन का क्या जो आज भी अपने कल्याण की उम्मीद और न्यायप्रिय सत्ताओ की उम्मीद गढ़ाये बैठा है। इससे हमारे अपने किसको कैसै पहलाना फुसलाना चाहते है यह तो वही जाने मगर यह जन जीवन के कल्याण ओर समृद्ध जीवन के हित मे नही काश हमारी सत्ताये जितनी जल्द सच को समझ पाये वरना जो भी फसल समाज व सत्ता गलियारो मे बौई जा चुकी है उसके फल आने बाले हर एक को चखना पढ़े तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । जय स्वराज । 


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