ऐड़ी से चोटी के शिष्टाचार पर सूवासदर की चुप्पी ...?तीरंदाज


अन्तिम सत्य पर मचा घमासान 

व्ही. एस. भुल्ले 

7 सितंबर 2022 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


भैया - ये मने कै देख सुन रहा हुॅ कै थारे को मालूम कोणी आज से ठीक 15 बर्ष पूर्व भय , भूख , भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात हुई थी । अलीबाबा , बंटाढार से मुक्ति दिलाने बड़ी रैलंम पैल मची थी मगर जब आज ऐड़ी से लेकर चोटी तक में फैलै शिष्टाचार कि रपट क्या आई उस पर सूबेदारो ने अन्तिम सत्य न होने की बात कहकर अपनी झोली ही झाड़ ली और उस पर भी सूबासदर की चुप्पी ने म्हारे जैसै लोगो जमी जमाई चैसर ही बिगाड़ दी , बोल एक बार फिर से पौं बारह । शायद पांशे सही पड़ जाये । 

भैयै - तने तो ऐसे बोल रिया शै जैसै थारे में गंाधार नरेश की रूह समा ली हो और थारे कहै अनुसार बाजी एक बार फिर से थारे सिपहसालारो के ही हाथ आ ली हो कै थारे को मालूम कोणी किसी गली मोहल्ले नगर शहर से नही हमारे ऐतिहासिक लाल किले से शिष्टाचार के नाम व्यवस्था में फैली बिष बैल को समूल जड़ मूल से उखाड़ फैकने की बात हुई है । सुनते है भाई ने एक बार कह दिया मानो खलास ये अमृत महोत्सव है । भारत समृद्ध खुशहाॅल कैसै हो बस एक ही मकसद है । सो मने तो बोल्यू भाया लगता है पांशे उल्टे हो लिये सो तने भी तेल देख और तेल की धार देख इतने पर चल जायेगी अगर ज्यादा चू चपट की तो म्हारे नव रतनो कि तिकड़ी कब म्हारे शांति के टापू पर सीधे लैन्ड हो जायेगी किसी को कानो कान खबर नही लग पायेगी । 

भैया - तने तो बाबला शै कै थारे को मालूम कोणी अभी तो समुचा लावोलश्कर मद्यनिषेध के पीछे पड़ा है । सिर्फ दिल्ली ही नही देश भर में छापे पर छापे डाल चूले तक खंगाल रहा है । 

भैयै - मगर काड़ू का कै करू जो आय दिन ऐड़ी से लेकर चोटी तक शिष्टाचार बालो के पीछे पढ़ा है मद्यनिषेद्य का धमइया सिर्फ दिल्ली ही नही इसका अखंड खेल तो म्हारे प्रदेश में भी चल रहा है । कही अरबो के पुल सड़क , बांध गबाने के बाद , अब तो सरेयाम गांब गली के गरीब बच्चो के हक पर पढ़े डाके पर सबाल हो रहा है । सुना है यह राशन पानी कमजोर माता बहिनो सहित कुपोषित बच्चो का था । इस पर आरोप कोई और नही बल्कि लेखा समिति का वह जमदूत कर रहा है । जिसने इस जिन्न को जन्नत से बाहर निकाला है । हालाकि जाप्ते मे माने तो यह कोई खास बात नही ऐसी बाते तो होती रहती है । आखिर सच क्या है ? 

भैया -  जब लोग मरे का खा जाते है तो ऐसे मे अगर जिन्दो का लोग खा रहै है तो हर्ज ही क्या ? अगर आज अपने वंशो को देश की खातिर कुर्बान करने बालो अपमानित कर विदेशी ठहराया जा रहा है । तो खास क्या? यह तो जन और तंत्र है सो ऐसे में जितनी जन सेवा हो जाये वह क्या कम है फिर 18 - 18 घन्टे सेवा करने बालो कि संख्या भी कहां कम है । सो भैयै जो जनहित में जो भी कर रहा है या अंधा हो अपने अपने घर भर रहा है इसमें गलत क्या ? राम की चिड़िया राम का खेत खालो चिड़िया भर भर पैट इसमें ऐसा नया क्या ?

भैयै - मने समझ लिया थारा इसारा मगर कै करू म्हारा दिल मानता नही भाई की मंशा तो मने आर पार की लागे सो जब घर में ही जंग छिड़ती दिख रही हो तो बात दिल पर तो आती है । अगर जंग छिड़ी तो निश्चित ही म्हारी जड़ो का हिलना तय है । और अच्छा खासे जमे जमाये साम्राज्य का जमी दोस होना तय है । जय स्वराज । 


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