डरी शहमी सियासत गिगिड़ाते सरोकार


अहंकार के आगे दम तोड़ता सामथ्र्य पुरूषार्थ 

जोशी मठ जैसी तबाही में तब्दील सियासत 

इवेन्टो के आगे धरासायी मूमेन्ट 

प्रतिभा , संपदा , पुरूषार्थ को अवसर की दरकार 

ग , गिरोह बन्द संस्कृति में स्वाहा होते गैं, समृद्ध संस्कार 


व्ही. एस. भुल्ले 

19 जनवरी 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

तबाही शब्द ही बुरा है तबाही कही भी , किसी भी क्षैत्र में हो सुखदायी सराहनीय नही हो सकती यह यथार्त है । जब बात समृद्ध जीवन और खुशहाॅली कि हो तो बिल्कुल भी नही , मगर आज का सच यही है कि अहंकार के आगे सामथ्र्य , पुरूषार्थ दम तोड़ने पर बिबस मजबूर है । गैंग गिरोह बन्द संस्कृति में स्वाहा होते सरोकार इस बात के गबाह है कि इवेन्टो के आगेे मूमेन्ट धरासायी हो बिलबिला रहै है । मगर निश्ठुर सियासत है कि प्रतिभा संपदा पुरूषार्थ को अवसर देने ही तैयार नही फिर क्षैत्र सामाजिक हो या राजनैतिक , आर्थिक या प्रतिभा प्रदर्शन का हो । ये सही है कि जोशी मठ की तबाही को भाई लोग भलेे ही प्राकृतिक आपदा सिद्ध कर दे मगर इसकी गहराई में जायेगे तो मानव जीवन या सियासी अहंकार के प्रमाण अवश्य मिल जाये तो किसी को कोई अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । खबरो की माने तो आजकल ऐसा ही कुछ मौजूद सियासत में भी चल रहा है । जिसकी सुनामी का सामना मानव जीवन कब और कैसै करेगा यह तो फिलहाॅल भबिष्य की बात हो सकती है । मगर मौजूद डरी शहमी सियासत इस बात का प्रमाण है कि आने बाला भबिष्य गिड़गिड़ाते सरोकारो के चलते सुखद रहने बाला है । 

ये अलग बात है कि सियासत में निष्ठापूर्ण कोसिसे भी हो रही है मगर वह सिर्फ सत्ता के लिये , जो सर्बकल्याण में गैंग गिरोहबंद संस्कृति के चलते न काॅफी साबित हो रही है । एक बड़े त्याग तपस्या के बाद संघर्षरत प्रतिभा , संपदा , पुरूषार्थ प्रदर्शन के अवसर आज भले ही सबालो के घेरे मेें हो मगर आज की सियासत जो फसल बो रही है उसका उसे भी पता नही कि फसल कैसी होगी । कारण सियासत का वह डर और शर्म जिसके चलते वह परिणाम आज जन मानस के सामने नही जिसकी कि हर जीवन को दरकार अनादिकाल से रही है । मगर अहंकार और भय का भाव उसे उस सामथ्र्य पुरूषार्थ का सामना करने से बन्चित करता है जिसका वह हकदार है जो उसे उन प्रतिभा संपदा का दमन करने मजबूर बैबस करता है जो प्रकृतिजन्य उस समृद्ध खुशहाॅल जीवन के आधार है जिसकी जरूरत समुचे विश्व को आज है । समुचे विश्व में बढ़ती जनसंख्या न रोजगार न ही संसाधन आज कोई बड़ा सबाल है न ही वह हिंसक प्रवृति जो भय बस समृद्ध खुशहाॅल जीवन सरोकारो को त्याग आज हिंसा के मार्ग पर चल निकली है । जो किसी के हित में नही । यही आज सबसे बड़ी समझने बाली बात हर जीवन को होना चाहिए । अगर हम पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण में से किसी को भी समृद्ध खुशहाॅल जीवन का अगुआ मानते है तो हमें समझना होगा उस सत्य को जिसको हम अपने निहित स्वार्थो के चलते भुला देना चाहते है । मौजूद संसाधन , सामथ्र्य पुरूषार्थ इस बात के प्रमाण है कि प्रयास कोसिसे बैसी नही हो रही जो होना चाहिए । मगर हम सूर्य उदय और अस्त के उस सत्य को नही झुठला सकते जो सत्य है और आज भी प्रमाणिक , इसलिये बैहतर हो कि आम जीवन इस सत्य को पहचाने और सृजन सिद्धान्त अनुसार जीवन व्यवहार को आत्मसात कर अपने निष्ठापूर्ण कर्तव्यो का निर्वहन कर इस समृद्ध सृजन को और समृद्ध बनाने में अपने जीवन का योगदान दे । जय स्वराज । 


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