जमीन पर यकीन का संकट

 


तबाही पर चुप्पी , निराशा पर चिंतन 

थिंकटेको पर सबाल , सकारात्मकता का अकाल 

वोटर नही कर पाये , वह कार्य ई.डी. ने कर दिया 

संकल्प का साथ , समय की जरूरत

खात्मे पर चिंतन और कवच भेदने पर मनन 

आलोचना और आरोप का मंथन 

तुम्हारे पांव नीचे जमीन नही , कमाल है कि फिर भी उन्है यकीन नही ......

विश्वविधालयो में शोघ खात्मे का या कवच भेदन का 

खात्मा और कवच पर खलिफा का यकीनन ऐलान 


ये मुकाम किसी चैनल या अखबार की सुुर्खियो का नही, 50 बर्ष का अनुभव  

व्ही. एस. भुल्ले 

8 फरवरी 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

यकीनन बहुत दिनो बाद कोई ऐसी बहस देश बासियो ने देखी और सुनी जिसमें एक संकल्प था और एक गंभीर संदेश अब समझने बाली बात यह है कि थिंकटेको के अकाल के बीच वह समझ कहा से सबाल शुरू करे  जिससे एक मुकंमल मुकाम 1.40 करोड़ को मुनासिव हो पाये ये चर्चा अजीबो गरीब थी या मुकंमल या भबिष्य की बात है । मगर जो भाव सर्बोच्य सदन में सुनने देखने मिला वह किसी न किसी सियासी दल , संगठन , संस्थाओ पर सबाल खड़े करने बाली आज के समय सबसे अहम बात है जब एक समृद्ध भारतीय कंपनी पर संकट के बादल मड़रा रहै है । और उसको बड़े नुकसान की खबरे आम हे ऐसे में समुची चर्चा केे दौरान तबाही पर चुप्पी और थिंकटेको का जो अकाल देखा गया वह भी जमीन पर किसी यकीन के संकट से कम नही , आलोचना से इतर आरोपो का यह मंथन ,कवच और खात्मे पर खालिफाओ का ऐलान किसकी जमीन सुनिश्चित करेगा और किसके कवच पर अचूक प्रहार कर समय अनुसार दिशा और दशा सुनिश्चित करेगा यह तो देखने बाली बात होगी । मगर इस चर्चा से इतना तो सुनिश्चित हो ही गया कि शोध खात्मे पर हो या कबच पर मगर संभावनाओ से इंकार नही किया जा सकता । पीढ़ित बंचित दलित , पिछड़ा बर्ग एवं जनजाति सहित महिला कल्याण शसक्तिकरण और उनकी सुविधाओ और अवसरो के बीच हाॅईटेक तकनीक का समय अनुसार प्रदर्शन साथ ही आम जरूरत और इन्फ्राइस्ट्र्क्चर का निर्माण एक प्रमाण है पुरूषार्थ का । मगर ई. डी. के पुरूषार्थ से सदन में ऐका क्या गुल , इस समृद्ध जीवन या सियासत में खिलायेगा यह देखने बाली बात होगी मगर कहते जीवन में प्रशिक्षु होना कोई अपमान और शर्म की बात नही बशर्ते उसका संकल्प से सर्बकल्याण सिद्ध हो । मगर इस चर्चा से एक बात तो सिद्ध है कि अगर जिसने भी इस चर्चा को गंभीरता से सुना देखा है तो यह बदलाव का एक बैहतर अवसर होना अवश्यम भावी हो जाता है । जो सीखने बाली बात है । वक्ता ने भले ही किसी का नाम लिया हो मगर संदेश स्पष्ट है । कि तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नही है , कमाल कि फिर भी उन्है यह यकीन नही है । यह कहावत हो सकती है । उस अनुत्तरित सबाल की उपेक्षा में जिसको लेकर सदन से लेकर सडत्रक तक कोहरात मचा है मगर सीखने बाली बात यह है कि अब विचार उन लोगो को इस बात पर करना चाहिए कि आखिर मजबूत प्रारव्ध होने के बाद खात्मे का सबाल बार बार क्यो उठ रहा है क्या वाक्य में ही जमीन अपने परायो के रहते इतनी कमजोर हो चुकी है जिसकी चर्चा एक जबाबदेह पुरूषार्थ ने सदन में पूरी जबाबदेही के साथ की है । क्या इस पर मंथन होना चाहिए और जिस कवच को न भेद पाने का संकल्प हुआ है उस चिंतन नही होना चाहिए क्योकि बात तो शोध की भी हुई है जिन्है विश्व के महाविद्यालयो पर छोड़ा गया है । मगर सच से इतर होना न तो इधर बालो के हित में है न ही उधर बालो के हित में यही आज का सबसे बड़ा सबाल है उन सबाल कर्ताओ और जमीन का पहचान पता यकीन पर सबाल खड़े करने बालो के सामने होना चाहिए ।  क्योकि कहते हे जब तक घर के अन्दर की जमीन का आकलन बाहर बालो तक नही होता तब इस बात पर यकीन करना की जमीन की तासीर क्या है और जो मानव शरीर और उसकी सोच है वह जमीन पर है या फिर हवा में लगता है जिन छेदो में मरम्मत का कार्य कठिन तपस्या के बीच सड़क पर कदम ताल करते हुआ शायद वह अभी भी उतने ही खुले है जिनके लिये यह तपस्या हुई शायद सबाल सार्थक है जैसी कि संभावना यात्रा के दौरान संपर्क को लेकर व्यक्त थी शायद पहली ही अहम बहस में उसके परिणाम सामने आने लगे है मगर समर दूर नही अखिर उस सीमा को तो तोड़ना ही होगा और उस आमो हवा के बीच खुले मन मस्तिस्क के साथ आना होगा जिसकी चर्चा देश के एक सफल पुरूषार्थ ने सदन के अन्दर बड़े ही गर्व से की है और उन पीढित बन्चितो को गौरानिवत सिद्ध किया है जो लोकतंत्र का मूल आधार मगर आज भी बैबस मजबूर है किसी भी ऐसी व्यवस्था को स्वीकारने पर जो आजकल आचरण व्यवहार सर चढ़कर बोल रही है मगर आत्मसात नही । सत्य की जय हो असत्य का विनाश हो । जय स्वराज ।। 


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