आत्मसात सत्ता और टूटता विश्वास
अंगीकार सत्ताओ पर बड़ा सबाल
स्थापित जीवन , सृजन मूल्य से घात खतरनाक
श्रेष्टजन , संस्थाओ , पर टिका समृद्ध खुशहाॅल जीवन का भार
सृजन , मानव धर्म रक्षा की दरकार
व्ही. पी. भुल्ले
8 अप्रेल 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है श्रेष्ठजनो का पुरूषार्थ सृजन , सर्बकल्याण में आदि अनादिकाल से सार्थक सफल और श्रेयकर रहा है । जिसके पीछे सत्ताओ पर अगाध विश्वास और उन सत्ताओ का सर्बकल्याण में वह पुरूषार्थ जिससे खुशहाॅल समृद्ध , सर्बकल्याणकारी जीवन का मार्ग प्रस्त होता रहा है । और उन जीवन मूल्य स्थापित जीवन सृजन सिद्धान्तो की रक्षा संरक्षण का कार्य निर्विघन ढंग से होता रहा फिर कीमत जो भी रही हो और समुचे जीव जगत कि इतनी लंबी सुखद यात्रा उसी विश्वास का परिणाम है जिसे जीवन आत्मसात कर आज तक समृद्ध खुशहाॅल जीवन के रूप में देखता भोगता आ रहा है मगर अब जबकि अंगीकार सत्ताओ से जीवन का विश्वास टूट रहा है तो ऐसे में समीक्षा उस महान सभ्यता संस्कृति संस्कार को अछुण रखने आवश्यक है जिसमें हर जीवन कि अगाध आस्था अनादि काल से रही है । जिसे कभी सत्ता तो कभी पालक संरक्षक के रूप में आम जीवन देखता मेहसूस करता आ रहा है मगर जब आज जीवन सत्ताओ के आचरण व्यवहार को लेकर बिचलित खिन्न नजर आता है और वह यह समझने में स्वयं अक्षम असफल पा रहा है । तो चिंता का गंभीर होना आम जीवन में स्वभाविक है । कहते है जब जब सत्ताये अहंकारी हुई है तब तब जीवन को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है फिर काल खण्ड जो भी रहा हो सत्ताओ का स्परूप पूज्यनीय रहा हो या फिर , वंशानुगत सत्ताओ कि राजवंश , कबिलाई या फिर सामाजिक सत्ता रही हो मगर जब आज जीवन आत्मसात विधान के साथ अंगीकार विधान व्यवस्था में समृद्ध खुशहाॅल जीवन की खोज करने दिन रात एक कर रहा नये नये अबिष्कार नई नई सभ्यताये , संस्कृति , संस्कारो , आचरण व्यवहार का आग्रही होता जा रहा जिसने आम जीवन में अशांति ही नही संघर्ष पैदा करने का पुूरूषार्थ किया इसके परिणामो के मिलते रूझानो से इतना तो स्पष्ट है । कि जिस समृद्धि खुशहाॅली का आग्रही जीवन सृजन हमेशा से रहा है वह और दूर होती जा रही है । बहरहाॅल अब यहां यक्ष सबाल यह है कि इस विकट संकट पर विचार कौन करे । क्या वह वैचारिक आधार जिनका आवरण तो सर्बकल्याण का मगर वह स्वयं ही खुद के अस्तित्व को बचाये रखने आत्मसात सत्ता से द्रोह करने बैबस मजबूर है । मजबूर है अंगीकार उन सत्ताओ के आगे जिनका आधार भी वह स्वयं है । क्योकि बगैर विचार संस्था के किसी भी लोकतंत्र में सत्ता का आधार खड़ा कर पाना असंभव ही नही नमुमकिन है । मगर अहम अहंकार के आगे जीवन यह कतई स्वीकारने तैयार नही कि वह जिस जीवन को आधार को सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक , या सत्तागत या संख्या बल के आधार पर गढ़ना चाहते है वह न तो समृद्ध खुशहाॅल जीवन के हित मे है न ही उन जीवनो के हित में जो सृजन कल्याण में एक जीवन आधार के रूप में अस्तित्व में है । बैहतर सिर्फ मानव धर्म ही नही उस सुजन जीवन सिद्धान्त की भी रक्षा होना चाहिए नही तो आने बाला समय उन समस्त जीवनो जो आज सत्ता का आधार है स्वयं को कलंकित होने आने बाले समय एक ऐसे अपमानित जीवन के रूप में जाने पहिचाने जायेगे जो अपने नैसर्गिक पुरूषार्थ का सर्बकल्याण में योगदान देने मे अक्षम असफल रहै । और वह इस सजृन और स्वयं मानव जीवन के साथ न्याय नही कर सके । जिसे श्रेष्ठ जीवन के लिये दुखद ही कहा जायेगा । जय स्वराज ।

Comments
Post a Comment