राजकोष की लूट पर सिपहसालारो में खिची तलबार ...............तीरंदाज ? 

राजकोष को सबसे बड़ा खतरा राजपुरूषो से 

व्ही.एस. भुल्ले 


10 अप्रेल 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

भैया - म्हारी छाती तो फटने को है । सुना है अब तो अपना ही अपने को लूटने में लगा है । राजकोष , राजपुरूष तो दूर की कोणी अब हर कौर पर हेराम हो रहा है । कै मने सेकड़ो बर्ष पुराने चाड़क्य काल को झूठा मान लू और हाथो हाथ राजपुरूषो के बीच अपनी सैटिंग जमा लू , मगर कै करू किस पर विश्वास करू हर एक पुरूषार्थी एक दूसरे की खाल उधैड़ ऐसी धोकनी बनाना चाहता है जिससे सख्त से सख्त लोहा भी तार , वायर बन जाये और जहां जैसी जरूरत हो वहां वह उन अपनो के काम आये जो मुखिया बन स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे है , इतना ही नही स्वयं को युग पुरूष कहला स्वयं का जीवन सिद्ध करने शेष अन्य लोगो की तरह असफल कोसिस इस जीवन में कर रहै है । इतिहास गबाह है आज इस तरह के लोगो का न तो कोई वंशज है न ही नाम लेवा पानी देने बाला है । भाया में बर्तमान नही भूत की बात कर रहा हुॅ और बन्द पढ़े इतिहास के वह पन्ने पलट रहा हुॅ जिसमें लिखी हर अहम बात आज के जीवन और व्यवस्था को खुला संदेश हो सकती है । मगर भाया अब न तो राज व्यवस्था है न ही राजवंश प्रणाली अब तो जनतंत्र लोकतंत्र है अर्थात जनता द्वारा जनता के लिये चुने जाने बाली वह सत्ताये और जनतंत्र लोकतंत्र है । सो म्हारे को तो थारी बात मनगड़ंत लागे मगर कै करू मने भी तो मौजूद व्यवस्था के बीच एक अंग हुॅ अगर इसमें कुछ गड़बड़ है तो खुलेयाम बता और सिर्फ बात राजकोष कि नही जनधन कि है , अगर कुछ प्रमाण है तो म्हारे राष्ट्र् भक्तो को बता इतने पर तो थारी चल जायेगी वरना थारी हालत भी राष्ट्र् द्रोहियो कि तरह हो थारी सारी हिस्ट्री द्रोहियो के नाम से लिखी जायेगी । 

भैयै - मने जाड़ू मगर कै करू ये भी एक दौर चल रहा है जहां अपना ही अपनो का शिकार कर रहा है । 

भैया - मने तो बोल्यू चुप कर जा और बहती धारा में आचमन कर अपने और अपने बालो के पाप धौ इस श्रेष्ठ जीवन की कसौटी पर खरा उतर अपने बालो को समझा कि भले ही राजकोष जनता के गाड़े पसीने की कमाई हो मगर इसका भोग अनादिकाल से सत्ताये और राजपुूरूष ही करते आये है । सो इसमें कोई नई बात नही । 

भैयै - बात भोग उपभोग तो सीमित होती तो बात चल जाती मगर अब बात तो उस विश्वास अविश्वास पर आ टिकी है जो सत्ता का आधार रहा है और उन महानभावो पर आ टिकी है जिन्है सत्ता का भाग कहा जाता है फिर काल परिस्थिति जो भी रही हो मगर मने न लागे कि इस बैलाम हो चुकी व्यवस्था में कुछ खास होने बाला है । 

भैया - मने समझ लिया थारा इसारा मगर जिस तरह से हर कोर पर हेराम चल रहा है । और सत्ता में मौजूद श्रेष्ठजन संघर्षरत है कि इस महान कड़ी को तोड़ जीवन को समृद्ध खुशहाॅल बनाया जाये मने न लागे कि वह सत्ताओ के इस आचरण व्यवहार चलते कोई बहुत अधिक सफल होने बाले है जब तक पुरूषार्थ पूर्ण निष्ठा और मानव जीवन के नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप नही होगा तब जंगली आचरण व्यवहार सिर्फ जीवन ही नही इस समृद्ध व्यवस्था को ऐसे ही निगलता रहेगा । जय स्वराज । 


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