आत्म सम्मान से बांझ ,समृद्ध सृजन की दुर्दशा .........तीरंदाज ?


श्रेष्ठ जन, सभा , परिषदो की निष्ठा पर बड़ा सबाल 

व्ही.एस.भुल्ले 

14 अप्रेल 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


भैया - अब मने सिर्फ जमीदोस ही नही सुपुर्दे राख , खाक होना चाहुॅ । मने न लागे अब कोई इन्साफ होने बाला है । मने तो अब समझ नही आ रहा कि आखिर मने तो करू तो क्या करू ! अगर ऐसा ही नैसर्गिक समृद्ध जीवन में चलता रहा तो कैसा मानव मानवता , व्यक्ति , परिवार समाज , राष्ट्र् , विश्व का निर्माण होगा जिसका आधार सिर्फ और सिर्फ समृद्धि खुशहाॅली के नाम बांझ होने के अलाबा और कुछ नही होगा । क्या समृद्ध जीवन के मायने सिर्फ शरीर , भोजन , निद्रा , मैथुन , और निस्पादन तक सीमित हो जायेगा । मने तो जीवन का बर्तमान , भूत , भबिष्य को देख सिर्फ और सिर्फ राख होना चाहै । 

भैयै - बाबलै आखिर तने इतना हताश निराश क्यो हो लिया कै थारे को मालूत कोणी हर रात के बाद दिन भी होता है । यही समुचे जीवन का सत्य और इसकी प्रमाणिकता जीवन का आधार फिर तने क्यो बाबला हुआ जा रहा है ? 

भैया - दर्द म्हारे को म्हारा नही दर्द तो म्हारे को उस आस्था इन्सानियत का है जिसके लिये हजारो करोड़ो कुर्बानिया त्याग तपस्या इस लिये इुई जिससे पृथ्वी पर मौजूद जीवन समृद्ध खुशहाॅल बन सृजन में जीवन का श्रेष्ठ योगदान देता रहै मगर आत्म सम्मान के बांझपन और निष्ठा से श्रेष्ठजनो , सत्ताओ , सभा , परिषदो के द्रोह ने यह सिद्ध कर दिया कि आने बाले समय में जीवन एक कलंक बन जाये तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । 

भैया - मने जाड़ू मगर कै करू आत्मसम्मान , इंसानियत के लिये जाने जाने बाला वैचारिक आधार सियासी श्रेष्ठजनो के पुरूषार्थ के चलते जमीदोस हो रहा है । स्वस्वार्थ में डूबे सियासी लोगो कि महात्वकांक्षाओ का शिकार हो रहा है । सत्य के मार्ग को मायावी सियासत से यह सिद्ध करने का असफल प्रयास हो रहा है । जिसका समृद्ध खुशहाॅल भाव जीवन से दूर दूर तक का कोई बास्ता नही और न ही कोई अर्थ मगर दुर्भाग्य कि स्वस्वार्थ में डूबी सियासत और सियासी लोगो ने जीवन को आज एक ऐसे चैराहै पर ला छोड़ा है । जहां से उसे अपना अस्तित्व बचाने अपने ही अस्तित्व से संघर्ष करना पढ़ रहा है । कारण समर्पित जीवन के सियासी अनुभव का अभाव और सत्य में गहरी निष्ठा अनभिज्ञ नेष्ठ जनो की वह सभा परिषदे जिनके कंाधो पर समृद्ध सृजन का भार होता है। अब ऐसे में शेष श्रेष्ठ जीवन , किसी भी समृद्ध जीवन पर फिकते मखानो पर मातम ही मना सकता है या फिर दफन कफन होने से पूर्व परमपिता परमात्मा से यही कामना कर सकता है । कि जिस भूभाग पर स्वयं आपने अपनी सत्ता का अनुभव समय समय इस लोक में मौजूद जीवन को स्वयं कष्टो को आत्मसात कर समृद्ध मार्ग दिखाया आखिर वह पवित्र. भूभाग अपने श्रेष्ठजनो की त्याग तपस्या कुर्बानियो को कैसै भूल सकता है । ऐसे किसी भी सिद्धांत मान्यता या जीवन मूल को कैसे आत्मसात कर सकता है जो समृद्ध सृजन के नाम से बांझ हो और निष्ठा के नाम बैइमान मगर ऐसे में मौजूद आशा अकांक्षा जीवन उम्मीद तो कर ही सकती है । म्हारे को क्या ? 

भैयै - गर सुनना चाहै तो सुन मौजूदा जीवन के बीच ऐसा कुछ नया नही हो रहा जिस को लेकर थारे जैसै लोग छाती कूटे जा रहे है । बात समझने कि है । अगर महात्वकांक्षाये अनियंत्रित अहंकारी हो जाये तो सब कुछ हो सकता है इतिहास गबाह है । तो फिर थारे जैसे गबई गबार काले पीेले ब्लैक इन व्हाइट धीमी गति के समाचार को इतनी चिंता क्यो ? कै थारे को मालूम कोणी चिंता चिता की जड़ होती है सो मने तो सिर्फ इतना कहना चाहुॅ कि ऐसे मे तने चुप कर इतने पर तो चल जायेगी । वरना थारी और म्हारी खाल कही किसी धौकनी में पुरूषार्थ कर स्वयं की शोभा बढ़ाती नजर आयेगी । 

भैया - मने समझ लिया थारा इसारा अब मुॅह से भी ऐसे समाज व्यक्तियो के बीच ऐसा कुछ नही बोलूगा और जानते हुये भी वह राज कभी नही खोलूगा जो समृद्ध विरासत का आधार ही नही उसका मूल अस्तित्व है । न उस विश्व विरादरी सहित उस महान मानवता के बारे में कुछ बोलूगा जिसके समृद्ध खुशहाॅल जीवन के लिये न तो कोई प्रस्फुटन आने बाले भबिष्य में होने बाला है न ही सृजन में उसका कोई आधार सुनिश्चित होने बाला है । मगर जीवन समृद्धि उसकी खुशहाॅली से दूर होने बाला पुरूषार्थ कितना सफल असफल होगा यह देखने बाली बात होगी । मगर इतना सुनिश्चित है कि जिस मार्ग पर आज जाने अन्जाने में समृद्ध जीवन चल पढ़ा है वह बड़ा ही विनाशकारी और समृद्धि खुशहाॅली के नाम बांझ सिद्ध हो तो भबिष्य मे इस पर किसी को कोई अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । 

जय स्वराज ।। 


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