निर्दयी मानवता से दहला समृद्ध समाज 

बांझ नैतिकता से , तार तार होते जीवन सरोकार 

समृद्ध खुशहाॅल जीवन का मूल , सिद्धांत एक है भले ही समझ अलग अलग , समझ के अभाव में , बैआधार होता , जीवन आधार 

अहंम अहंकार अनादिकाॅल से अनिष्ट का द्योतक रहै है  

व्ही.एस. भुल्ले 


17 अप्रेल 2023 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

काश स्वकल्याण से दूर , समृद्ध समाज यह समझ पाये कि सत्य क्या है जीवन का अर्थ क्या है मानव का धर्म कर्म क्या है और मानवता के मायने क्या है ? तो यह उस समृद्ध समाज के लिये सबसे बड़ी उपलब्धि होगी जिसके लिये किसी भी भूभाग पर जीवन को समृद्ध समाज के रूप में जाना जाता है । जिसकी पहचान बैरहम त्याग तपस्या और अनगिनत कुर्बानियो बैखोफ पुरूषार्थ कर , जीवन मे स्थापित कि और जो प्रमाणिक भी है । मगर दुर्भाग्य आज उसी पुरूषार्थ के उत्तराधिकारी उस सत्य और समता भाव से अनभिज्ञ हो , ऐसा आचरण व्यवहार शिक्षा , संस्कृति , संस्कार के रूप में स्थापित करने पर तुले है जिससे मौजूद ही नही आने बाली पीढ़िया तक आने बाले समय में स्वयं पर गर्व करने के बजाये स्वयं को शर्मसार मेहसूस कर स्वयं को कलंकित मेेहसूस करे तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । काश सत्य समता भाव के लिये वह समृद्ध समाज उन संस्कारो को आत्मसात , अंगीकार कर उस निष्ठा को सिद्ध कर पाये जो उसकी निष्ठा पहचान आदि अनादिकाल से रही है । मगर क्या ऐसा हो पायेगा । आज समस्त जीव जगत के लिये यह सबसे बड़ा सबाल होना चाहिए । मगर लगता नही कि मौजूदा हालात इसकी इजाजत दे मगर किसी संभावना से इन्कार किया जाना बड़ी भूल हो सकती है । कहते है सृजन में कुछ श्रेष्ठ करने का अवसर प्रकृति में मौजूद हर जीवन को अवश्य मिलता है ।  यह जीवन की श्रेष्ठता भी है मगर वह जीवन उसे किस रूप में अंगीकार स्वीकार करता है जिसके लिये वह अस्तित्व में है । मगर सबसे यक्ष सबाल यह है कि जब प्रकृति जन्य शेष जीवन नैसर्गिक स्वभाव अनुसार अपनी निष्ठा का निर्वहन पूर्ण निष्ठा के साथ कर सकते है । और सृजन सिद्धान्त का पालन कर अपनी श्रेष्ठता अपनी पहचान कायम रख सकते तो फिर जीवनो में श्रेष्ठ मानव जीवन , सत्ताये , सभाये , परिषदे ऐसा क्यो नही कर सकती ? मगर यह भी सत्य है कि जीवन में कोई भी ऐसी निष्ठा या कार्य नही जिसे श्रेष्ठ जीवन समृद्ध जीवन करने में अक्षम असफल हो , मगर लाख टके का एक ही सबाल कि शुरूआत कहां से हो , और शुरूआत कैसै हो , कौन करे ऐसा पुरूषार्थ जो उसकी निष्ठा और पहचान को कायम रख सके । सबाल बड़ा है मगर असंभव कुछ भी नही । जय स्वराज ।। 


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