पहचान विरूद्ध पुरूषार्थ परिणाम जीवन से घात
आचरण अनुभूति से बौखलाई आशा अकांक्षा बगाबत को तैयार
आधार विहीन ब्यान व्याख्यानो से बिबिलाया आत्म सम्मान
पहचान परिणाम आचरण व्यवहार पर उठे सबाल
मानवता , मानव धर्म सृजन में श्रेष्ठ आस्था विश्वास
व्ही.एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है जब जब सृजन में पहचान विरूद्ध पुरूषार्थ और परिणाम रहै है तब तब समृद्ध , खुशहाॅल के मार्ग के साथ उसे घात ही कहा गया है । क्योकि अनादिकाॅल से मानवता , मानवधर्म ही सृजन में श्रेष्ठ आस्था विश्वास का केन्द्र रहा है । क्योकि पहचान विरूद्ध आचरण व्यवहार कभी श्रेष्ठ सिद्ध नही हो सकता ऐसी मान्यता भी किसी भी सभ्य समाज में रही है । क्योकि जिस तरह से आधार विहीन ब्यान व्याख्यान सर्बकल्याण के नाम सत्ता तक पहुॅचने के अचूक शस्त्र सिद्ध हो रहै है वह किसी से छिपा नही मगर जिस आचरण व्यवहार से आज जिस तरह से आत्मसंमान बिलबिलाया है वह बड़ा ही घातक खबर यह है कि आचरण व्यवहार से बौखलाई श्रेष्ठ आशा आकांक्षाये अब बगाबत की ओर बढ़ रही है । सबाल की आढ़ में अदृश्य भावनाये आज भले ही शांत नजर आती हो मगर इतिहास अनुभव कभी गलत नही होते । ये सही है आज कि सत्ता सभाओ में विचार विमर्श और संवाद की संस्कृति संस्कारो में भले ही मरते आत्मसंमान के चलते श्रेष्ठ सिद्ध रहै और उनकी डाडी गली मोहल्ले ठाणी में पिटे मगर जीवन में पहचान अनुभूति का भाव कभी भ्रमित नही होता यह आज समझने बाली बात हर उस श्रेष्ठजन के अन्दर होना चाहिए जिसकी गहरी अपनी पहचान और सर्बकल्याण में हो जो श्रेष्ठ जीवन का आधार भी है और जीवन की श्रेष्ठ अनुभूति भी । शायद आज सिर्फ मानव जीवन ही नही उसे संरक्षित संबर्धित करने बाली सत्ताये , संगठन , सभा , परिषदे यह सत्य भूल रही है कि पहचान के विरूद्ध परिणाम पुरूषार्थ शस्त्र से पहले शास्त्र से पराजित हुआ है । यह इतिहास भी सिद्ध है और वह जीवन जिसने इसका दंश झेला है । बैहतर हो कि हम अपनी मानव होने के नाते अपनी पहचान को भ्रमित न होने दे वरना इतिहास तो इतिहास मौजूद जीवन भी कभी उस मानव या मानवता का सम्मान नही करता जो भय बस अपना निष्ठ आचरण व्यवहार रखने से जीवन चूक जाते और उपहास का कारण बन स्वयं को लज्जित कलंकित होने , स्वतंत्र छोड़ देते है क्योकि पहचान के लिये किया गया पुरूषार्थ ही वह सच्चा कर्म धर्म है जो उसे सृजन की सेवा और सर्बकल्याण का भाव जाग्रत करने सक्षम सफल रहा है । जय स्वराज ।।

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