जागिरो में बटा लोक , जमीर बैचता तंत्र ...........? तीरंदाज
व्ही. एस. भुल्ले 25 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा भैया - चुनावी वैला पर तनै कै अर्र बर्र बोल रिया शै कै थारे को मालूम कोणी पूर्ण चुनाव से पूर्व उपचुनाव चल रिया शै जिससे म्हारे महान लोकतंत्र का कोरम पूरा हो सके और म्हारा अर्धतंत्र बैखौफ जागिरो मे बटे लोक की सेवा कल्याण पूरे मनो भाव से कर सके और थारे जैसै चिन्दी पन्ने चैका बालो का मुॅह बन्द कर सके । रहा सबाल जागिर जमीर बैचने का सो भाया लोकतंत्र मे गाहे बगाहे खरीदने बैचने का इतिहास है अगर कोई नया इतिहास लिखा हो रहा है म्हारे माननीय द्वारा तो थारी छाती मे दर्द कैसा ? भैयै - दर्द ही नही छाती फटे थारे जैसै बिघन संतोषियो की जो हर सेवा कल्याण पर सबाल उठाना अपना धर्म समझते है और कर्म के नाम सिर्फ और सिर्फ बौद्धिक अययासी या फिर कलदारो के आगे चापलूसी करते है जमीर द्रोही बन अपनी ही कौम को बदनाम करते है । भैया - सच बोल्या जमीर तो न जाने कब का द्रोह के चलते दम तोड़ चुका है । सेवा कल्याण मे के सर्राटे मे अब तो सिर्फ गरीब खड़ा है जिसके दर अब तो अमृत बरस रहा है । गांब गलियो मे सर्राटे भरता सेवा कल्याण भय , भूख , भ्रष्टाचार से मुक्त...