संविधान, संवैधानिक संस्थाओं को सशक्त, सक्षम बनाने में संस्था, संगठनों की भूमिका अहम कृतज्ञता ही बना सकती है मजबूत लोकतंत्र
व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है कि कभी तो जाने अनजाने में ऐसा कुछ गलत हुआ है जिसकी प्रतिक्रिया बस ऐसा कुछ गलत अब हमारे सामने है। जो किसी भी बुद्धिजीवी समझदार जागरुक व्यक्ति को विचलित कर देता है। अब यह राष्ट्र जन प्रेम से ओत-प्रोत शान्ति, अहिंसा का मार्ग हो या फिर वह संघर्ष पूर्ण मार्ग जो हिंसा वेमन्यस्ता से होकर गुजरता है। ये अलग बात है कि दोनों का मुकाम और लक्ष्य एक थे। मगर रास्ते अनेक आज जिस तरह से संविधान की मंशा और संवैधानिक संस्थायें दबाव पूर्ण माहौल के बीच तथा आम जन, विचलित मानसिकता के साथ जीवन निर्वहन करने पर मजबूर है। ऐसे में सामाजिक, राष्ट्र भक्त, संस्था, संगठनों की भूमिका संविधान व संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत शसक्त बनाने में अहम हो जाती है। क्योंकि किसी भी व्यवस्था के लिए उसके संविधान से बड़ा और कोई विधान नहीं हो सकता व खासकर लोकतांत्रिक उस राष्ट्र के लिए तो बिल्कुल भी नहीं जहां के नागरिकों ने अपने विधान का मान-सम्मान रखते हुए अपने महान संविधान को अंगीकार किया हो। जिसकी मंशा व भावना की रक्षा की जबावदेही उन संवैधानिक संस्थाओ...