श्रेष्ठजनो की कर्तव्यविमुखता महात्वकांक्षा का दंश भोगता मानव जीवन
प्रारव्ध से परमसुख संसाधनो से समृद्ध श्रेष्ठजनो से ही सर्बकल्याण की अपेक्षा अनादिकाल से रही है व्ही. एस. भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा जीवन आज जिस जुजून के रथ पर सबार सर्बकल्याण का सारथी बन श्रेष्ठ कहलाना चाहता है उसमे उसे कितनी सफलता मिलेगी यह तो फिलहाॅल भबिष्य के गर्व है मगर जो सम्राज्य आज हर क्षैत्र मे सर्बकल्याण के नाम फलता फूलता नजर आता है उससे बहुत कुछ हासिल होने बाला है यह कहना फिलहाॅल जल्दबाजी हो सकती है मगर इतना तो तय है कि कर्तव्य की इस निष्ठा से कोई भला होने बाला नही जब तक की उसका भाव प्रमाणिकता की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध कर आम जीवन मे अनुभूति का एहसास कराने मे सक्षम सफल सिद्ध नही हो जाता क्योकि इस निष्ठा कर्तव्य की अपेक्षा अनादिकाल से ही श्रेष्ठजनो से रही है जो प्रारव्ध से परमसुख समृद्धि से सम्पन्न सम्द्ध रहै है । जिन्होने इस धर्म का पालन मानव जीवन मे किया वह आज पूजे जाते है सराहे जाते है जो अथक प्रयासो के बाबजूद अक्षम असफल रहै वह भी मानव जगत मे आज भी याद किये जाते है और जब तक यह दुनिया रहेगी याद किये जाते रहेगे मगर सबाल आज वही...