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Showing posts from January, 2020

सत्ता, सियासत, समाज जब-जब कमजोर हुये है तब-तब सर्वकल्याण, सेवाभावी सियासत सार्थकता की मोहताज हुई है दरियादिली का दंश भोगता देश गांधी की सार्थकता में मिल सकता है स्वीकार्य समाधान विनाश की ओर बढती स्वार्थवत सियासत

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व्ही.एस.भुल्ले विधान के विरूद्ध संविधान को अंगीकार करने वालों की अनुशासनहीनता का फिलहाल अगर यहीं संदेश है तो भविष्य का अन्दाजा स्वतः सिद्ध दिखाई पडता है।  अहिंसा सर्वकल्याण, सेवाभाव में अकूत विश्वास रखने वाले अहिंसावादी गांधीजी की दरियादिली आज दंश के रूप में कभी इस तरह बदनाम होगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। कारण समाज, सत्ता, सियासत और संस्थाओं का कमजोर हो, कत्र्तव्य विमुख होना। अगर संविधान की शक्तियों का सदपयोग करने वाले लोकतंत्र में सजग, निष्ठावान रहते तो एक समृद्ध खुशहाल राष्ट्र को आज यह दिन नहीं देखना पडता। बहरहाल जो भी हो अगर सुधार की शुरूआत इस महान भूभाग पर हुई है तो सत्ता का राजधर्म है कि वह गांधीजी के उस सच को आमजन के बीच ले जाये जिसे दया की जगह स्वार्थवत सियासत के चलते र्दुदान्त सिद्ध करने की कोशिश हुई है। वो कौन लोग थे या कौन लोग है जिन्होंने गांधीजी की त्याग-तपस्या और कुर्बानी को दरकिनार कर अपना सियासी इकबाल बुलंद किया। निश्चित ही आज गांधीजी की रूह अगर कहीं है तो दुखित होगी। मगर प्रसंन्न भी जो आज उनके विचार, कार्यशैली की सार्थकता सिद्ध हो रही है। क्योंकि जिस दृष्ढ...

अपनों के बीच, आज बैठेंगे सिंधिया, होगा आमजन से सीधा संवाद

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वीरेन्द्र भुल्ले जिस समय की दरकार आमजन को वर्षो से थी लगता है कि वह समय आ चुका है। जब सिंधिया अपनों के बीच बैठ सीधा संवाद करेंगे। सेवा कल्याण की सियासत को आगे बढाने जिस तरह से उन्होंने गांव-गांव पैदलमार्च, विद्यालय-विद्यालय छात्रों से संवाद और सत्याग्रह के माध्यम से आमजन की समस्याओं के समाधान की शुरूआत कर यूं तो वह जब तब सार्वजनिक जीवन में आज की सियासत को नया संदेश देते रहे है। मगर जिस बात को लेकर सियासत गर्म रहती थी कि महाराज आमजन से सीधे नहीं मिल पाते और न ही आमजन सीधे महाराज को अपनी व्यथा बता पाते। मगर जो शुरूआत अब होने वाली है शिवपुरी के सर्किट हाउस से वह कितना आमजन को ढांढस बधा सिंधिया को समस्याओं के नये-नये स्वरूप और सियासत में आते बदलावों से अवगत करा पाती है यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल तो सिंधिया का संवाद आमजन के बीच शिवपुरी में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

तथाकथित अंधी, बेहरी, अचेत संस्कृति में, सृजन का सूत्रपात मुझे डर है कि कहीं स्वार्थवत संस्कृति मेरा माथा न चूम लें

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व्ही.एस.भुल्ले कहते है जब-जब सत्ताओं, समाज और संस्थाओं का पुरूषार्थ सामर्थ, स्वार्थवत संस्कृति, संस्कारों के सामने कमजोर हुआ है तथा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन अपने पुरूषार्थ से विमुख हुआ है। तब-तब सृजन में समृद्ध, खुशहाल जीवन संकटग्रस्त हो, सृजन में निष्ठा रखने वाले व निष्ठापूर्ण पुरूषार्थ कर, कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले समाज, संस्था, सियासत स्वयं की सार्थकता के मोहताज हुये है। जिस तरह से आज तथा कथित संस्कृति, संस्कारों का समाज, संस्था, सियासत के चलते पृथ्वी पर मौजूद महान भूभाग जिसे कभी जम्मूद्वीप भरतखण्डे के नाम से जाना जाता था और जो अनादिकाल से समृद्ध, खुशहाल भी रहा है और इस भूभाग पर ऐतिहासिक पुरूषार्थ भी होता रहा है। ऐसे में अस्तित्व बनाती तथाकथित अंधी बेहरी अचेत स्वार्थवत संस्कृति कहीं मेरा भी माथा न चूम लें। यहीं डर आजकल मुझे नासूर बना है।  डर तो कभी माथा न चूम लेने का गालिव को भी रहा था। क्योंकि जब वह 5-6 वर्ष के थे तब उनके बालिद पिता और चचा उनका माथा चूमकर अपने कत्र्तव्य निर्वहन को गये थे। उनकी मां और फूफी बताया करती थी कि उनके परिवार का संस्कार और संस्कृति क्या रही है...

नेताओं से इतर आमजन से सीधा संवाद कायम करेंगे- सिंधिया सर्किट हाउस पर आमजन से घण्टों मुलाकात की खबर बनी चर्चा जनाधार विहीन नेताओं की जान हलक में

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वीरेन्द्र शर्मा यूं तो सिंधिया परिवार के मुखियाओं का संवाद आमजन के बीच जब तब सीधा ही रहा है और यह कोई पहली मर्तवा भी नहीं जो सिंधिया आमजन के बीच सीधे संवाद के लिये घण्टों संवाद करने की शुरूआत कर रहे है। मगर इससे पूर्व वह जिस तरह से भीषण गर्मी, बारिस, ठण्ड के बीच दूरांचल ग्रामों में पहुंच लोगों से संवाद स्थापित करते रहे है। यहां तक कि उन्होंने लगभग 10 किलोमीटर तक ग्रामीणा क्षेत्रों में पैदलमार्च भी किया है। जब 15 साला भाजपा सरकार का शासन था तब भी सिंधिया आमजन की सार्वजनिक लडाई लडने में कभी पीछे नहीं रहे। नियमित बैठकों के माध्यम से उनके द्वारा लायी गई सैकडों हजारों करोडों की जनसरोकार से जुडी कल्याणकारी योजनाओं से जुडी समीक्षा रही हो या मीडिया के बीच संवाद के साथ सार्वजनिक संस्थानों सहित छात्रों से सीधी बात हो। उन्होंने संवाद और सेवा मंे कभी कोताई नहीं बर्ती। मगर दुर्भाग्य कि उनके सिपहसालार उनकी सर्वकल्याण की सत्याग्राही सोच और 18-18 घण्टे के अथक परिश्रम से आमजन को अवगत कराने से अक्षम असफल सिद्ध रहे।  परिणाम कि अब जब स्वयं सिंधिया अपने पूर्वजों की भांति चाहे वह कै. वासी माधौ महाराज...

उत्पादन, अधोसंरचना निर्माण, सेवा, संसाधनों का सार्थक दोहन, मांग पूर्ति, बाजार को सुव्यवस्थित कर होगी समृद्ध अर्थव्यवस्था- व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक स्वराज अल्प और दीर्घकालिक सार्वजनिक बोन्ड बन सकते है अर्थव्यवस्था के सार्थी टाॅप-टू वाॅटम मुद्रा प्रवाह होगा सार्थक मांग पूर्ति के संतुलन के साथ समस्या-समाधान, समृद्ध अर्थव्यवस्था का सूत्र

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जयनारायण शर्मा फिलहाल आर्थिक संस्थाओं का आकलन एक समृद्ध, आर्थिक विरासत तथा मौजूद संसाधनों को लेकर जो भी हो। फिर चाहे उसका स्वरूप सैद्धान्तिक, संभावित, व्यवहारिक हो। मगर किसी भी मजबूत समृद्ध अर्थव्यवस्था का सच यह है कि जब तक किसी भी व्यवस्था में उत्पादन अधोसंरचना निर्माण सेवा, संसाधनों का सार्थक दोहन और मांगपूर्ति के सन्तुलन के साथ बाजार सुव्यवस्थित ना हो, तब तक एक समृद्ध अर्थव्यवस्था दिव्य स्वप्न के समान ही होती है।  उक्त बात स्वराज के मुख्य संयोजक व्ही.एस.भुल्ले ने बजट पूर्व बच्चों के बीचे चर्चा के दौरान कही। उन्होंने कहा कि जब तक समृद्धि के लिए कोई भी राष्ट्र अल्प दीर्घकालिक सार्वजनिक बोन्ड को अपनी अर्थव्यवस्था के सार्थी के रूप में सिद्ध नहीं कर लेते तब तक ऐसे राष्ट्रों में मौजूद आर्थिक समस्याओं के निदान असंभव ही प्रतीत होते रहते है। किसी भी अर्थव्यवस्था के सटीक समाधान में जहां मांगपूर्ति का सन्तुलन और मुद्रा प्रवाह अहम होता है। मगर यह तभी संभव है जब सत्ताओं के बीच सर्वकल्याण का भाव सुनिश्चित हो और यह भारतवर्ष जैसे राष्ट्र में सहज संभव है। मगर इसके उलट जब तक समृद्धि का दिव्य स...

वोट नीति के भंवर में फसा, समृद्ध देश संघर्ष करती आशा-आकांक्षायें

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व्ही.एस.भुल्ले  कहते है किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तासीन होने में वोट का अहम किरदार होता है। मगर जब एक समृद्ध विरासत अपने सुनहरे भविष्य को लेकर मजबूर हो। ऐसे में वोट नीति के भंवर में फसी सियासत, सत्ता देश में वहां निवासरत लोगों के बीच स्वयं की पहचान स्थापित रख पाना अहम हो जाता है। खासकर तब की स्थिति में जब किसी भी समृद्ध भूभाग पर सत्ता की खातिर सियासत सत्ता के लिये वोट की खातिर परवान चढ रही हो उसके परिणाम भविष्य में जो भी हो। मगर वह सार्थक नहीं कहे जा सकते। एक समृद्ध भूभाग और पुरूषार्थ के परिपूर्ण विरासत वोट नीति के आगे जिस तरह से कलंकित हो रही है यह उस समृद्ध राष्ट्र, समाज, परिवार, व्यक्तियों को समझने वाली बात होना चाहिए। जो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र स्वयं पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करने में नहीं थकते। वहीं आज दुर्भाग्य बस स्वार्थवत संस्कार, संस्कृति और धन, सत्ता लालसा के चलते आज निराश है।   आज जब स्वयं की समृद्ध, खुशहाल विरासत के लिये वह भूभाग संघर्षरत है जिसकी समृद्धि के परिणाम हजारों वर्ष बाद भी प्रमाणिक तौर पर मौजूद ...

म.प्र. में लोकतांत्रिक पुलिसिंग की मिशाल बनता पुलिस महकमा सिस्टम में पारदर्शी समाधान अहम 26 जनवरी से होगी एफआईआर की वीडियों रिकाॅर्डिंग

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वीरेन्द्र भुल्ले म.प्र.। आम लोगों के बीच मृदु, सौम्य, हसमुख स्वभाव की हनक के बीच सिस्टम को आम समन्वय के साथ जनसेवा में सिद्ध करने वाले 2010 बैच के पुलिस अधिकारी की कार्यशैली में अनुशासन तथा समस्या का पारदर्शी समाधान का हुनर यूं तो उन्हें उनके पारिवारिक संस्कारों से विरासत में मिला है। मगर सिस्टम की पेचीजिदियों के बीच अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को उन्होंने अपने वरिष्ठ अफसरों से सीखा है। सीहोर, भोपाल के बाद तीसरी मर्तवा पुलिस अधीक्षक के रूप में वह म.प्र. में र्दुदांत दस्यु प्रभावित रहे शिवपुरी जिले में 6 माह पूर्व ही उन्हें पदस्थ किया गया है। जहां उनकी पदस्थापना के साथ ही एक ऐसे जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में कत्र्तव्य निर्वहन का मौका मिला जो विगत 40-50 वर्षो से दस्यु समस्या से जूझता रहा है। तो वहीं शराब, रसद, रेत, खनन, माफिया की धमक भी इस जिले में कुछ कम नहीं। इससे पहले कि वह म.प्र. के शिवपुरी जिले की आवोहवा से पूर्णताः परिचित हो पाते कि धारा 370, आयोध्या प्रकरण सीईएए जैसे संवेदनशील मुद्दे भी चुनौती बने रहे। मगर सबसे चुनौती पूर्ण कार्य पुलिस अधीक्षक के रूप में राजेश सिंह चन्...

केसरीदूत अश्विनी कुमार का देहअवशान पत्रकारिता जगत की बड़ी क्षति: व्ही.एस.भुल्ले

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नीरज जाटव  पंजाब केसरी के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार स्व. अश्विनीकुमार के दुःखत निधन पर स्वराज मुख्य संयोजक व्ही.एस.भुल्ले ने कहा कि असमय ही पत्रकारिता जगत के स्तम्भ और पत्रकारिता के लिए दो पीढियों की कुर्बानी देने वाले परिवार के मुखिया का असमय चला जाना पत्रकारिता जगत के लिए बडी क्षति है। ऐसे कम ही विर्लय लोग होते जो अपने पूर्वजों की विरासत और संस्कृति को अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम से निडर होकर आगे बढाते है। उन्होंने एक समृद्ध, पुरूषार्थपूर्ण विरासत का नेतृत्व करते हुये तमाम दुष्वारियों के बावजूद अपने कत्र्तव्य निर्वहन को कभी कलंकित नहीं होने दिया और उन्हें अक्षुण रखा। यह उनके जीवन की सबसे बडी धरोहर समस्त पत्रकारिता जगत के लिये एक निष्ठापूर्ण संदेश के रूप में सभी के समक्ष है। ऐसे लोगों से प्रेरणा लें, राष्ट्र-जनकल्याण एवं समाज उत्थान में जुटे लोगों को सीख लेना चाहिए। 

मनमानी पर उतारू आजादी देर रात तक, दम से फूटते धमाके-फटाखे तथा दिल-दरबाजे, खिड़की हिला देने वाले डीजे सोई सत्ता शासन की कत्र्तव्य निष्ठा से सहमे लोग हर माह मोटी पगार कबाडने वालों की कत्र्तव्यनिष्ठा पर यक्ष सवाल

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वीरेन्द्र भुल्ले जिन धमाके फटाखे की गूंज से पशु-पक्षी सहर जाते है और दिल-दरबाजे हिला देने वाले डीजे की धमक से नागरिक, मरीज निढाल नजर आते है उनके सेवा कल्याण में तैनात सत्ता शासन में कत्र्तव्य विमुख लोगों की कत्र्तव्यनिष्ठा में गाडी भरे कत्र्तव्य निर्वहन करने में जुटी मोटी पगार कबाडने वालों की फौज पर सवाल होना स्वभाविक है। कत्र्तव्यनिष्ठा के दौर में आज के अशान्तपूर्ण माहौल में शान्तप्रिय जीवन निर्वहन करने वालों के सामने सबसे बडा यक्ष सवाल आज यहीं है। अगर आम व्यक्ति की माने तो उन्हें आभावों का जीवन आज उतना दुष्कर नहीं लगता जितना अशान्त, असुरक्षित, स्वच्छंद, शान्तिपूर्ण जीवन में अराजक वातावरण की बाधा आये दिन खुशी के वक्त चलने वाले धमाके फटाखों की कान-फाडू दिल-दरवाजे हिलाने वाली गूंज बेजुबान पशु-पक्षियों को ना आने वाली मौत से कम क्यांे ना हो। तो वहीं अनियंत्रित आवाजों में गंूजते डीजे की धमक दिल-दहला देने काफी है। आखिर शान्तिपूर्ण, स्वच्छंद जीवन की आकांक्षा पाले अपने खून पसीने की कमाई को विभिन्न टेक्सों में चुकाकर सत्ता, शासन को मोटी-मोटी पगारों से समृद्ध कर समस्त साधन उपलब्ध कराने वाले ...

अंकों की मोहताज शिक्षा व्यवस्था में, दम तोडती बौद्धिक संपदा समृद्ध, सिद्धस्त, शैक्षणिक संस्थान ही दे सकते है समाधान

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व्ही.एस.भुल्ले गत दिनों रामलीला मैदान से बौद्धिक संपदा, प्रतिभा संरक्षण सहित समृद्ध, शिक्षा, व्यवस्था के लिये अमूलचूल बदलाव की बात नए भारत की पूर्व संध्या पर सत्ताधारी दल के 11वे अध्यक्ष की ताजपोशी के साथ हुई होती तो परीक्षा पूर्व चर्चा अवश्य ऐतिहासिक होती जिसे सराहा भी जाता और भारतीय नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप उसे स्वीकारा भी जाता जो समृद्ध, खुशहाल, राष्ट्र निर्माण में सार्थक भी होता और सफल भी। संदेश होता अंकों की दुनिया में उलझे उस समाज शिक्षा जगत को जो स्वयं की समृद्धि के लिए अंको के आंकडों को सफलता का मात्र एक मार्ग मानते हैं। मगर उस बौद्धिक संपदा प्रतिभाओं का क्या दोष जो अंको के मकड़ जाल में स्वयं की प्रतिभा प्रदर्शन को आये दिन दमन होता देखते हैं। कलंकित पुरुषार्थ के बीच काल कलबित कर्तव्य निर्वहन की आज की व्यवस्था में यह वह कलंक है जिसने एक संवेदनशील, जीवंत, समृद्ध समाज संवेदन शून्य बनाने मे बड़ा योगदान किया है। काश हम अपने यथार्थ, पुरुषार्थ को सिद्ध कर पाए। अहम अहंकार से इतर तो यही हमारी कड़ी उपलब्धि होगी और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिये समृद्ध, सिद्ध विरासत। जय स्वराज

सत्याग्रह को कमजोर करते, सियासी शागिर्द सफलता में अंक मजबूरी हो सकते हैं, मगर समाधान नही स्वयं को सिद्ध करने संपदाओं के सामने बड़ी चुनौती महत्वपूर्ण विभागों के बावजूद, प्रदर्शन शून्य परिवहन, राजस्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल विकास, रसद, राशन विभाग के निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन पर सवाल

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वीरेन्द्र शर्मा कहते हैं सत्य के लिए आग्रह ना तो कभी कमजोर हो सकता है और ना ही उसका यथार्थ ओझल। मगर जब किसी भी नेतृत्व के सियासी शागिर्द स्वार्थवत हो और निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन में स्वयं को अक्षम पाते हो, ऐसे में सत्य के लिये सेवा के लिये किये जाने वाला आग्रह स्वतः ही शून्य हो जाता है। मगर सत्ता की हनक में म.प्र. में सबकुछ चल रहा है। देखा जाये तो आमजन या जन सरोकारों से सीधे जुड़े अहम विभाग, राजस्व, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल विकास, खाद्य, रसद, राशन का विगत 1 वर्ष में एक भी सार्थक, सफल, सेवाभावी प्रयास नहीं हुआ। जिसे निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ सेवाभावी कल्याणकारी या सियासी कहा जा सके। इससे इतर एक वर्ष में ऐसे अहम विभागों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को दर्दनाक ही कहा जाएगा। जो मध्यप्रदेश की सत्ता का आज यथार्थ भी है और भविष्य भी। काश सेवा कल्याण जनसरोकारों के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन करने वाले अपने उस सेवाभावी सत्याग्राही के सेवा को सार्वजनिक या सियासी जीवन में समझ पाए तो उनके लिए यहीं सच्ची सार्थकता सेवा और जनकल्याण होगा जिसके लिए...

वे लाइन हुई आॅनलाईन सेवा

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व्ही.एस.भुल्ले म.प्र.। कहते है भोले-भाले बैवस, पीडित, वंचित, आभावग्रस्त लोगों के बीच जो हो जाये सो कम। मगर जिन आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति और सुनहरे भविष्य की खातिर अपने हाड-तोड पसीने की कमाई लुटा जिन लोगों पर विश्वास व्यक्त किया उन्होंने विकास सेवा कल्याण को सहज करने के बजाये हाईटेक करने गरीबों का पैसा वेभाव लुटा सारी सेवा कल्याण ही आॅनलाईन कर दी। जो आजकल ओंदें मुंह वेलाईन पडी है। जो काम बगैर लाईन के ही घंटे भर में निवट जाता था आज वहीं काम होने में 7-7, 8-8 दिन गुजर जाते है। मगर समाधान संभव नहीं हो पाता। अगर सेवा भावी मूडधन्य सेवकों की बात करें तो जिस तरह से हाईटेक सेवा उपलब्ध कराने बगैर 24 घंटे बिजली, इन्टरनेट की उपलब्धता जांचे। सेवा कल्याण की संस्थाओं में बाढ आई उसने आज आम नागरिकों को बेहाल कर रखा है। जो बंैक जिन उपभोक्ताओं की जमा सावदी से करोडो रूपये कमा अपने कर्मचारियों को हाईटेक सुविधा, वेतन, भत्ते मुहैया कराते है आज उन बैंकों में आम उपभोक्ताओं को दुदकार कर जिस तरह से अपमानित किया जाता है और आईपीसी की धारा का डर दिखा उसे शान्त कर कर दिया जाता है वह किसी से छिपा नहीं। शहर के शहर मे...

संस्कारों की होली और शर्मनाक सियासत सर्वोच्चतम संस्कारों की विरासत है शिवपुरी माँ बेटे के श्रद्धा, भक्ति, प्रेम की मिशाल 100 वर्ष पुराने संस्कारिक सर्वसुविधा युक्त स्वच्छ शहर की बर्बाद विरासत

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वीरेन्द्र शर्मा हो सकता है कि मेरी अदनी-सी समझ सोच लोगों को चापलूसी, गुलामी प्रतीत हो, जिसे वह नकारे या स्वीकारे, मगर मेरी अभिव्यक्ति मुझे अवश्य धिक्कारती है। मेरा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य, निर्वहन जो एक ऐसी स्वार्थवत, असंस्कारी, अहंकारी एवं तथा तथाकथित संस्कृति का चाहे अनचाहे रूप में भाग हो सकती है। क्योंकि मैं भी आज उस 100 वर्ष पुराने संस्कारिक, स्वच्छंद, सर्वसुविधायुक्त शहर सिंधिया स्टेट की पूर्व ग्रीष्मकालीन राजधानी का नागरिक हूं। जिस शहर में 100 वर्ष पूर्व रेल सड़क, बिजली, पानी, सीवर पार्क, तालाब, झील, झरने, घने जंगल, वन्य प्राणी, वृहत भवन, होस्टल, प्राचीन भव्य मंदिर, खेल मैदान, सांस्कृतिक भवन, चैड़ी-चैडी सडक, सुन्दर चैराहे तथा तालाबों की तलहटी में आम, अमरूद के बाग और पशुधन की समृद्धि सहित श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, सुख, शान्ति, समृद्धि के संस्कारिक सरोकार थे। जो किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज के सर्वोच्चतम संस्कारिक शिखर कहे जा सकते है। माँ के प्रति बेटे की श्रद्धा, प्रेम और समर्पणपूर्ण संस्कार यहां की आवो-हवा के भाग थे जिसे एक शासक ने सृजन में जीवन, निर्वहन के दौरान निष्ठापूर्ण ढंग से ...

समृद्धि को मुंह चिढ़ाती स्वार्थवत, सत्ता, सियासत, संस्कृति, संस्कार सत्ता, सियासत के बीच समृद्धि हुई कलंक पुरूषार्थ हुआ मोहताज

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व्ही.एस.भुल्ले अगर यो कहे कि हमारे महान भूभाग जिसके जर्रे-जर्रे में संपदा समृद्धि के भण्डार भरे पढे है तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए। मगर जिस तरह से स्थार्थवत सत्ता, सियासत, संस्कृति, संस्कारों के चलते हमारी नैसर्गिक संपदा समृद्धि को मुंह चिढाया गया और मौजूद पुरूषार्थ को कलंकित कर भविष्य को अंधकारमय बनाया है वह आने वाले भविष्य में शर्मनाक ही कहा जायेगा। क्योंकि हमारा महान भूभाग ना तो संपदा से कभी बांझ रहा है और ना ही पुरूषार्थ जो हमारी विरासत है।  ऐसे में स्वार्थवत, सत्ता सियासत के बीच कंगाल हमारी समृद्धि अपने आप में एक सवाल है। जिस पर विचार अवश्य होना चाहिए। जहां तक हमारी समृद्धि और अर्थव्यवस्था का सवाल है तो अगर हम चाहे तो डाॅलर को रूपये के बराबर खड़ा सकते है। मगर स्वार्थवत, सत्ता सियासत ने, ऐसा होने नहीं दिया। जिसका आज प्रार्दुभाव स्वार्थवत संस्कृत, संस्कृति के रूप में मौजद है। जो हमारे बुजुर्गो द्वारा कडी त्याग, तपस्या कुर्बानियांें से भरी विरासत पर कलंक है। आज उस महान राष्ट्र में विश्वास रखने वालो को सबसे बडी समझने वाली बात होना चाहिए। कहते है जो अपने अतीत अस्तित्व ...

वे विचार विरोध की व्यग्रता खतरनाक

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व्ही.एस.भुल्ले मौजूद भूभाग पर, राष्ट्र कोई सिर्फ किसी भी भूभाग का टुकड़ा मात्र भर नहीं, उसकी समग्रता, पहचान उसकी संस्कृति, संस्कार व त्याग तपस्या से स्थापित जीवन, मूल्य और सिद्धान्तों की विरासत होती है। जिसकी रक्षा करना उसका सम्मान करना हर उस नागरिक का धर्म होता है जिसकी सेवा कल्याण विकास का जिम्मा उन सत्ताओं का धर्म होता है जिन्हें विधि विधान अनुरूप समस्त अधिकार व्यवस्था संचालित करने के लिए प्राप्त होते है। जिन्हें अंगीकार कर हर नागरिक, सृजन में अपने जीवन निर्वहन के साथ अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते है। मगर जब बगैर विचार सिर्फ और सिर्फ स्वयं के स्वार्थ या सियासत चमकाने राष्ट्र-हित में लिये जाने वाले निर्णयों पर अभिव्यक्ति के नाम विरोध होता है वह सराहनीय नहीं कहा जा सकता, ना ही ऐसे विरोध को सर्वमान्य समर्थन हासिल हो पायेगा। खासकर तब की स्थिति में जब राष्ट्र-हित में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन हो रहा हो। ऐसे में ऐसे विरोध पर ना तो राष्ट्र कभी गर्व करेगा और ना ही उस राष्ट्र का नागरिक स्वयं को गौरान्वित कर सकेगा।  काश इस सच और समय की नजाकत को वह सियासी दल, समाज, परिवार, ...

कुतर्क, कलंक से जूझती निष्ठापूर्ण कृतज्ञता सियासी कालिक से हलाकान लोकतंत्र सृजन में स्वाहा होते जन सरोकार

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व्ही.एस.भुल्ले एक लम्बे अंतराल के बाद आज जब निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सृजन में जनसरोकारों को लेकर हो रहा ऐसे में जो सियासी तौर पर आजकल सडकों पर चल रहा है। ऐसे में कुतर्कपूर्ण, कलंकित सियासत से हलाकान विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र की कृतज्ञता कुतर्क कलंक से हैरान-परेशान है। जिस तरह से संविधान की रक्षा के नाम नामी ग्रामी शिक्षण, संस्थानों से लेकर सडक तक संवैधानिक सर्वोच्च संस्थाओं के निर्णय पर कोहराम मचा है। यह इस राष्ट्र के विधा, विद्ववान, सियासत, सत्ता, समाज और सृजन में आस्था रखने वाले सज्जन पुरूषोें के लिए विचारणीय ही नहीं समझने वाली बात होना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1984 से लेकर आज तक हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और जन सरोकार, कैसी सियासत, संस्कृति, सत्ताओं के बीच फला फूला है। आज जब सृजन में जन सरोकारों की बात हो रही है तो ऐसे में संस्थाओं से लेकर सडक तक सियासी कोहराम आखिर क्यों ? बहरहाल जो भी हो इतिहास गवाह है जिस भी सत्ता, सभा, परिषद, जनपद ने सृजन में जन-जीवों के सरोकारों की खातिर अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन किया है वह इतिहास में आज भी जिन्दा है और हजारों सैकड...

मिनीमम टाइम, मैक्जिमम वर्क, पुरूषार्थ दिखाते परिणाम

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वीरेन्द्र भुल्ले म.प्र.। सत्ता की हनक के बीच पुरूषार्थ दिखाते परिणाम इस बात के गवाह हो सकते है कि किस तरह सेवा कल्याण में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम से मौन रह मिनीमम टाइम और मैक्जिमम वर्क आउट कर सार्थक परिणाम प्राप्त किये जा सकते है। ऐसा ही कुछ म.प्र. के शिवपुरी जिले में पदस्थ एक युवा आईएएस अनुग्रह पी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के क्षेत्र में कर दिखाया है। फिलहाल अगर चर्चाओं में सरगर्म मुद्दे शिक्षा और रोजगार को उपलब्ध संसाधनों की बात करें तो वहीं रोजमर्रा के कार्यो से फारिख हो, आमजन से जुडे सरोकारों की बात हो तो समूचे म.प्र. में आजकल शिवपुरी में इकोफ्र्रेडंली एक ऐसा अजूबा कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम देखने मिल सकता है जो समूची व्यवस्था के लिए व्यवहारिक तौर पर एक नजीर साबित हो। सतत बैठकें और बैठकों में मातहतों को सटीक सीख के साथ नियमित प्रमाणिकता जांचने भ्रमणों के दौर के साथ जो कत्र्तव्य निर्वहन हो रहा है उसके भविष्य के परिणाम जो भी हो मगर प्रयासों पर सवाल नहीं हो सकते। म.प्र. के शिवपुरी जिले में दूरांचल क्षेत्रों में मौजूद विद्यालयों स्कूलों के चमचमाते भवन व समय से स्क...

सत्याग्रह और सर्वकल्याण से जुडी सियासत के लिए सिंधिया की नई शुरूआत

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वीरेन्द्र शर्मा जिस तरह की सियासी सुगबुगाहट सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में उनके दौरों को लेकर चल रही है और विपक्ष जिस तरह से उनके दौरों से पूर्व हमलावर दिखाई दे रहा है उससे लगता है कि सिंधिया सत्य के आग्रह सर्वकल्याण और मूल सिद्धान्तों की सियासत को लेकर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे है। अपने स्वभाव अनुरूप जिस तरह से उन्होंने विगत 15 वर्षो की सियासत के दौरान जो सर्वकल्याण और विकास की लम्बी रेखा आज की सियासत में खींची है। ये अलग बात है और विचारणीय प्रश्न भी कि उनकी सार्थक सहानुभूति उनके संघर्ष को भले ही समूचे प्रदेश में मिली हो। मगर उनके संसदीय क्षेत्र से वह सहानुभूति क्यों ओझल हुई यह आज की सियासत में और सेवा कल्याण सहित सर्वकल्याण में विश्वास रखने वालों के लिए चर्चा का विषय हो सकता है। मगर लगता नहीं सिंधिया की कार्यशैली से कि उन्होंने आज भी अपना मार्ग बदला है या षड़यंत्रपूर्ण सियासत से वह विचलित हो वह हताश निराश हुये है।  चूंकि सिंधिया परिवार की कार्यशैली को आगे बढाते हुये उन्होंने जनकल्याण, सेवा भाव और क्षेत्र के अदभुत विकास को हमेशा से प्राथमिकता दी है। मगर सियासी व्यस्तायें और ...

सत्ता की हनक में डूबा शासन सियासी दांव पेंच में स्वाहा होते सरोकार

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वीरेन्द्र भुल्ले जिस तरह की सत्ता हनक का आगाज विगत 26 वर्षो से इस म.प्र. के समृद्ध भूभाग और भोले-भाले नागरिकों की आकांक्षाओं पर भारी पड रहा है वह रूकता दिखाई नहीं पडता। ये अलग बात है कि म.प्र. की भोली-भाली भावुक जनता इस उम्मीद में तीन बार म.प्र. का निजाम इन 26 वर्षो में अपनी वोट की ताकत से कुचल चुकी है। मगर सियासत है कि सीख लेने का नाम ही नहीं लेती और ना ही वह उन आशा-आकांक्षाओं को समझना चाहती जिसके लिए सत्तायें, सरकार और सियासत किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्तित्व में होती है। आज जिस तरह से सियासत बंटी हुई है और संपदा सहित संसाधनों पर अपना हक जमा अपने मंसूबे सिद्ध करने पर तुली है वह किसी से छिपा नहीं।  मगर कहते है कि संवैधानिक व्यवस्था में जितने अधिकार और कत्र्तव्य चुनी हुई सत्ताओं के है उससे कहीं अधिक व्यवहारिक अधिकार शासन के निमित होते है। मगर इस संवैधानिक सन्तुलन से इतर शासन, सरकारों के पलडे़ में बैठ सेवा कल्याण विकास से इतर सियासत के इशारे पर जुटा है वह ना तो न्याय प्रिय ही कहा जायेगा और ना ही कभी सराहा जायेगा। सत्तासीन दल की हनक गाये-बगाये जो भी हो। मगर सर्वकल्याण का भ...

सार्थक होता सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय अवज्ञा, गुठ निरपेक्ष आन्दोलन

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व्ही.एस.भुल्ले आज जिस मुहाने पर विश्व और हमारा समृद्ध, महान भारतवर्ष खडा है उसका सार्थक, स्वीकार्य समाधान भी आज यहीं महान भूभाग दे सकता है। अपने महान आध्यात्म संस्कृति, पुरूषार्थ, समृद्धि के लिए जाने पहचाने जाने वाले इस महान भूभाग का आज भी ना तो उसका आध्यात्म, पुरूषार्थ बांझ हुआ है ना ही उसकी बौद्धिक संपदा और समृद्धि। मगर सवाल आज भी सौ टके का वहीं है कि सत्य का आग्रह स्वीकारने वाले या सविनय अवज्ञा के पक्षधर विश्व विरादारी ही नहीं इस महान भारतवर्ष में कितने लोग है जो मानव, कल्याण और सृजन में स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने गुठ निरपेक्ष आन्दोलन के पक्षधर है। अगर इन सवालों के जबाव निष्ठापूर्ण ढंग से दुनिया और हमारा देश ढूंढ पाया तो यह समस्त जीव जगत मानवता के हित में है यह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन उस सत्ता, सियासत, सरकारों, सियासी दल,  समाज, संगठन, राष्ट्र, नागरिकों के हित में भी है जिनकी निष्ठापूर्ण आस्था समृद्ध, खुशहाल, जीवन एवं अन्य जीव जगत में संरक्षण में अपने नैसर्गिक कत्र्तव्य अनुसार है या जो अपना कत्र्तव्य निर्वहन सृजन में स्वयं की उपायदेयता के रूप में सत्य को साक्षी मान सिद...

सत्ता, शिक्षाविद, सामर्थवानों का कत्र्तव्य रहा है संपदा संरक्षण और सेवा कल्याण, इतिहास साक्षी है भारतवर्ष की पहचान उसका पुरूषार्थ और आध्यात्म है

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व्ही.एस.भुल्ले सर्वकल्याण में गांधी दर्शन, अहिंसा, सेवा, त्याग उस महामानव का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन ही कहा जायेगा जो गांधी जी ने अपनी कृतज्ञता से सिद्ध किया और आज भी वह स्वतः सिद्ध है और सार्थक भी। मगर मानव सभ्यता के बीच मौजूद या पूर्व में रही सत्ताओं के बीच दम तोड चुकी लोकतांत्रिक आस्थाओं के बीच एक समय वह भी था जब इस महान भूभाग से पंडित नेहरू के रूप में पंचशील सिद्धान्त, गुठ निरपेक्ष आंदोलन और नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप समाजवाद की चर्चा हुई और उसके के लिए निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन भी किया गया। मगर कहते है कि समय के साथ बदलाव संस्कृति का एक स्थापित सिद्धान्त है और उसे साक्षी मान उसमें स्वयं को समाहित करना मानवता स्वभाविक गुण है। स्व. शास्त्री जी के निर्णायक पुरूषार्थ के साथ उनकी अपनी संवैधानिक पद और सार्वजनिक कृतज्ञता के साथ जय जवान, जय किसान की बात हो या फिर स्व. इंदिरा गांधी का जागिरदारी-जमीदारी, सूतखोरी, जनसंख्या नियंत्रण के लिए भू-प्रबंधन में चकबंदी, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रीवियर्स की समाप्ति, परिवार नियोजन के साथ राष्ट्र सुरक्षा को लेकर निर्णायक आक्रमक शैली, तो वहीं लि...

गिरोहबंद सियासत, सिसकता लोकतंत्र अब तो जागो महान विरासत के वंशजों समृद्ध, सुसंस्कृत संस्कारिक भूभाग पर खुुशहाल जीवन के लाले

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व्ही.एस.भुल्ले  निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले महापुरुषों की शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों के अभाव में जो लोग आज भ्रमित है और छप्पन भोग का सुख और समृद्धि का मान भोगने वाले हर नागरिक, परिवार, समाज के लिए आज समझने वाली बात यह है कि किस तरह गिरोहबंद, स्वार्थवत सियासत एक समृद्ध खुशहाल भूभाग का सत्यानाश करने पर तुली है। अगर जल्द ही इसका निदान नहीं खोजा गया तो महान भारतवर्ष पर गर्व करने वाली कौम आने वाले समय में ऐसी कलंकित होगी जिसकी भरपाई असंभव ही नहीं नामुमकिन होगी। फैसला इस महान भूभाग के उन नागरिकों को करना है जिनके पूर्वज बचपन, जवानी का सूरज देखे बगैर स्वाभिमान के साथ लाख कष्टों के बावजूद अपना निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन करने में जुटे रहे। क्या हम उस महान भूभाग समृद्धि खुशहाली को गिरोहबंद सियासत का निवाला से होने मे स्वयं असफल अक्षम पाते हैं। अगर यह सच है तो हमें आज यह प्रष्न विचारणीय होना चाहिए जो हमारे बेहतर वर्तमान और भविष्य का सार्थी सिद्ध हो सके।  जय स्वराज

अगर झूठ फरेब ही सियासत सत्ता का सच है तो फिर कैसे संभव है सेवा कल्याण

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व्ही.एस.भुल्ले                       इस महान राष्ट्र ही नहीं हर जीवंत भूभाग का इतिहास गवाह है कि नैसर्गिक कर्तव्य निर्वहन के साथ सर्व कल्याण में सृष्टि का मात्र एक ही सूत्र है जिसका निर्वहन पशु, पक्षी, जीव सभी निष्ठा पूर्ण कर रहे हैं। मगर मानव के कर्तव्य निर्वहन पर आज बड़ा सवाल है। जिसके जीवन की सार्थकता सिद्ध के लिए उसे मानव नाम प्राप्त हुआ। जिसके कंधों पर समस्त जीव जगत की सेवा कल्याण की नैसर्गिक जवाबदेही है। जिसके कल्याण का भार अनादिकाल से उसी के स्वयं सिद्ध विधान अनुरूप सियासत और सत्ता पर है जो मानव द्वारा अंगीकार विधान अनुरूप होती है। मगर इसे हम मानव सभ्यता का आज सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कहें जो मानव द्वारा अंगीकार अवस्था में मानवता खुलेआम कलंकित हो स्वयं के कृत्य पर गौरवान्वित होने से परहेज नहीं कर रही। अब्बल होना तो यह था कि मौजूद मानव सभ्यता सृष्टि की अनमोल धरोहर मानव पर गर्व करती है। पग पग नीर क्षीर बाले भूभाग पर खुशहाल, समृद्ध, स्वस्थ जीवन के लाले अपने आप में एक बड़ा सवाल है। काश इतिहास से हम कुछ सीख पाते। बहरहाल सीखन...

अगर निष्ठापूर्ण स्वह या सर्वकल्याणकारी जीवन निर्वहन ही जीव और सृष्टि का सत्य है तो फिर द्वेषपूर्ण समाज संस्कृति और सियासत क्यों ?

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व्ही.एस.भुल्ले जिस तरह के हालात मौजूदा समझ और प्रमाणिक रूप में पूर्व में रहे और वर्तमान सभ्यता और समाज में आज हमारे सामने आ रहे है। ऐसे में इन पर चर्चा ही नहीं उनके सानिध्य में सीख लेने की आवश्यकता है। यूं तो सर्वकल्याणकारी व्यवस्था स्थापित करने की जबावेदही अनादिकाल से सत्ता, सियासत और कल्याणकारी ऐसे संस्थानों की रही है जिनके कंधों पर समूचे जीव-जगत ही नहीं बल्कि पशुवत जीवन निर्वहन करने वाले लोगों के कल्याण की भी रही है। क्योंकि अनादिकाल से मानव का कर्म ही नहीं धर्म रहा है कि वह स्वह शिक्षित और स्वयं के कल्याण के साथ दूसरों को शिक्षित कर उनके कल्याण में अपना कत्र्तव्य निष्ठापूर्ण ढंग से करे, यह सत्य है क्योंकि जितने भी महा मानव, महापुरूष जिने हम सभी जानते और मानते है। अगर यह सत्य है तो फिर उनके मार्ग से उनके बताये रास्तों से स्व कल्याण के भाव से सत्ता, सियासत, संसाधनों का शोषण और दुरूपयोग क्यों ? आज की सत्ता, सियासत बुद्धिजीवी, समाजसेवी और शिक्षा ग्रहण करने वाले युगों और बच्चों के लिए यहीं समझने वाली बात होना चाहिए।  मगर दुर्भाग्य कि समस्त जीव, जगत ही नहीं, मानव और समाज को शिक्षि...

नैतिक बल और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन ही हमारी पहचान प्रेस क्लब और स्वराज के तत्वाधान में नव-वर्ष मिलन समारोह और गोष्ठी संपन्न उपस्थित सभी पत्रकार बंधुओं ने बेहतर कत्र्तव्य निर्वहन, जनसरोकार को लेकर कैसे हो इस पर अपने-अपने विचार प्रकट किये स्वराज एवं प्रेस क्लब ने किया अतिथियों का सम्मान

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शिवपुरी। स्वराज एवं प्रेस क्लब के तत्वधान में होटल हैप्पीनेस में नव-वर्ष के उपलक्ष्य पर एक संक्षिप्त चर्चा एवं विचारों के आदान-प्रदान हेतु गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्री प्रमोद भार्गव तथा शिव शंकर शर्मा, वीरेन्द्र वशिष्ठ, अनुपम शुक्ला, आलोक इन्दौरिया को शाॅल श्रीफल से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के पूर्व में स्वराज के मुख्य संयोजक एवं प्रेस क्लब अध्यक्ष व्ही.एस.भुल्ले ने कार्यक्रम की रूपरेखा एवं पत्रकारिता को और अधिक उत्तरदायी होने के साथ निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कैसे हो इस संबंध में सभी के विचारों को साक्षा करने का उपस्थित पत्रकारगणों से आग्रह किया।  इस मौके पर उपस्थित पत्रकारगणों में अशोक अग्रवाल, परवेज खांन, रंजीत गुप्ता, केके दुबे, विपिन शुक्ला, उमेश भारद्वाज, सेमुअलदास, देवू समाधिया, लोकेन्द्र सेंगर, फरमान अली, सत्यम पाठक, मुकेश जैन, लालू शर्मा, राजू शर्मा, मणीकान्त शर्मा, अखलेश वर्मा, धु्रव शर्मा, रशीद गुड्डू खांन, राजू यादव, योगेन्द्र जैन, नेपाल वघेल, भूपेन्द्र नामदेव, छोटू, धर्मेन्द्र गुर्जर, सनी कुशवाह, इस्लाम खांन, पवन राठौर,...