सीमित, संकुचित सोच और स्वार्थी संस्कार न तो हमारी विरासत है और न ही स्वभाव समृद्ध जीवन ने सत्ता, समाज को कभी निराश नहीं किया
व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। निश्चित ही मेरा यह भाव न तो कोई खबरचियों के लिये खबर है और न ही समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये सबकुछ दाव लगा स्वयं की नैसर्गिक कृज्ञता को कलंकित करने वालों के लिये ज्ञान की बात। हो सकता है कि उन्हें यह बेकार की बात लगे जो जीवन में आज की समृद्ध, सुसंस्कृत पीढी के लिये अछूत हो चुका आध्यात्म लगे। अगर यों कहें कि 150 वर्षो के कालखण्ड में हमारी निष्ठापूर्ण, त्याग-तपस्या अनगिनत कुर्बानियां और हमारी उस महान शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों का कचूमर निकल चुका है जिस पर कभी समूची मानव सभ्यता को नाज था तो कोई अति संयोक्ति नहीं होगी। यह कटु कडवा सच है कि सैकडो वर्षो से समृद्ध जीवन ने सत्ता, समाज और सरकारों को बहुत कुछ दिया और वह क्रम सेवा कल्याण के नाम आज भी जारी है, तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर सत्तायें, समाज इतना निष्ठुर स्वार्थी कैसे हो सकता है और उनका स्वभाव इतना अव्यवहारिक असंवेदनशील कैसे हो सकता है। अगर वाक्य में ही हमारे बीच यह भाव है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि आज मानव ही नहीं समूचा जीव-जगत बडे संकट में है। कौन नहीं जानता कि विश्व के...