राष्ट्र को समर्पित सिद्धता का वक्त था, वाराणासी का सियासी संग्राम
वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जिस काॅग्रेस का महान इतिहास अनगिनत कुर्बानियों के नाम से जाना जाता है। जिसकी राष्ट्र-जन, कल्याण के प्रति सिद्धता और समर्पण रहा है। उसका स्वयं सिद्धता से बीच सियासी संग्राम से रण छोड़ हो जाना एक सुनहरे इतिहास पर कलंक है। देखा जाये तो चुनावों में हार-जीत मजबूत लोकतंत्र के दो धु्रव है। मगर हार के डर या जीत के अतिविश्वास से स्वयं को सर्वोपरि मानना सार्थक नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में लोकमत ही सर्वोपरि और सिद्ध होता है और लोकमत का सम्मान उसका आर्शीवाद किसी भी व्यक्ति, संगठन, दल की सिद्धता में सहायक होता है। काॅग्रेस को वाराणासी सियासी संग्राम में यहीं समझने वाली बात होना चाहिए थी। मगर कि ऐसा हो न सका, जो काॅग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात हो सकती है।