लोकल के वोकल पर स्टार्टप की लंबी छलांग......तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले भैया- मने तो लोकल के वोकल के अश्व पर सवार स्टार्टप की ऐसी लंबी छलांग, मुये सूतखोर और आदमखोर बैंकों की बगैर मदद के लगा पाऊंगा, मने सपने में भी न सोचा था। मगर कै करूं घडी गांठ का मेकाले की शिक्षा पर लुटा इतना कंगाल हो जाऊंगा और हाथों हाथ करोडों-लाखों लोगों को अपने संक्रमण की चपेट में लेने वाले कोरोना के कहर में बेरोजगार रह, पठानी बसूली वालो का सहयोगी और जनसेवक नहीं बन पाऊंगा, मने कै पता था कि हाथों-हाथ लोकल से वोकल और आॅनलाईन स्टार्टप का जमाना आने वाला है। मगर फिर भी म्हारी कोशिश है कैसे भी मने भी सेवा कल्याण के रथ पर सवार हो खूब सेवा कल्याण के नाम कमा रातों-रात समृद्ध खुशहाल हो जाऊं। कै अभी भी यह संभव है, नहीं तो शेष रहे म्हारे हंडे-कुंडे भी बिच जाये। मगर हमारे सेवा कल्याण के मार्ग सुरक्षित हो तो तने भी जोड-तोड बढा और म्हारे को हर हाल में सेवा कल्याण का जमाई बना, न जाने मुंआ ये कोरोना कब तक चलेगा और तब तक म्हारा लोकल का वोकल और स्टार्टप का सपना अधूरा ही रहेगा। भैये- मुये चुपकर तने भी सचिव, रोजगार सहायक शिक्षक या शासकीय सेवक बनना चावे। इतना सारा कचडा उडेल दिया म्हा...