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Showing posts from May, 2020

जान और जहान से जूझते मजदूर, किसान जबावदेह लोगों की चुप्पी शर्मनाक

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जिस तरह से जान बचाने मजदूरों का झुण्ड कहीं सडक पर, तो कहीं पलायन में जुटा है तो दूसरी ओर अपने मेहनत का जहान बचाने किसान खरीदी केन्द्रों पर उमड रहा है। कोरोनाकाल में बनते यह हालात निश्चित ही चिन्ताजनक है। मगर जबावदेह लोगों को चिन्ता मुक्त रहना उतना ही घातक है जितना कि मजदूर, किसानों को है जो मजबूरी में जान और जहान को जोखिम में डाल जीवन निर्वहन के संघर्ष में जुटे है। जिस तरह की खबरे मजदूरों के बीच से उनके यात्रा करने की आ रही है और खरीदी केन्द्रों पर जिस तरह की प्रताडना किसानों के बीच मेहसूस हो रही है यह किसी भी समृद्ध सत्ता, सरकार और सिस्टम के लिये सुखद नहीं कही जा सकती। इसके पीछे का सच क्या है ये तो सिस्टम बनाने वाली सत्तायें और शासन चलाने वाले लोग ही जाने। मगर किसान, मजदूरों का दर्द कुछ कम नहीं।  कारण साफ है कि भ्रष्टाचार की वह महामारी जो मानवता निगलने में भी संकोच नहीं करती। दीमक की तरह मानवीय चरित्र को चट करने वाला यह भ्रष्टाचार कब रूकेगा ये तो सत्ता सरकारें और सेवा कल्याण के लिये सिस्टम में बैठे लोग ही जाने। मगर जिस तरह से को...

कोरोनाकाल में उमडती भीड, सत्ताओं के अस्तित्व पर सवाल कत्र्तव्य निर्वहन की आड में कत्र्तव्यनिष्ठा का मौन घातक

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  यूं तो लोकतंत्र हो या राजतंत्र, नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन को समृद्ध, खुशहाल अनुशासित बनाने में सत्ताओं की अहम भूमिका होती है और उनकी जबावदेही भी। क्योंकि निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पर ही सत्ताओं का अस्तित्व निर्भर होता है। सहज संसाधन, स्वच्छंद जीवन के साथ सुरक्षा का भाव ही सत्ताओं का मूल आधार रहा है। जिसके लिये उसके नैसर्गिक जीवन निर्वहन के साथ सत्ताओं के पोषण की जबावदेही भी उसके कंधों पर होती है। आज जब कोरोना जैसी महामारी के बीच सरकारों और समूचे सूचना तंत्र के माध्यम से कोरोना की प्रमाणिक दवा के आभाव में सोशल डिस्टेंस और मास्क, सेनेट्राईजर सहित हाथ साफ रखने के उपाय सुझाये जा रहे है तथा विश्व भर में संक्रमितों का आंकडा 50 लाख के पार हो चुका है और जिस तरह से भारत में संक्रमितों की संख्या बढ रही है ऐसे में नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन करने वालों के बीच कोरोना के प्रति कोताही कहीं मानवता के लिये श्राफ साबित न हो, यहीं आज सबसे बडा यक्ष सवाल है। मगर ऐसे में जब हर नागरिक और सत्ता से जुडे हर अंग की जबावदेही मानव रक्षा की है। ऐसे में जागरूकत...

बेहाल मजदूरों को कुछ बडा करने की तैयारी सिस्टम दुरूस्त रहा तो संकल्प होगा सार्थक

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जहान छोड, जान बचाने अपने-अपने घरों को लौट रहे मजदूरों के रोजगार को लेकर लगता है कि म.प्र. सरकार कुछ अधिक गंभीर है। इसलिये कहा जा सकता है कि रोजगार को लेकर म.प्र. में कुछ बडा होने वाला है। ये अलग बात है कि सत्ता के अहंकारी स्वभाव के चलते कभी-कभी सरकारों को वो सार्थकता सफलता सिद्ध नहीं होती जिनके लिये वह संकल्पित हो सेवा कल्याण के लिये अस्तित्व में होती है। अगर ऐसे में सत्ताओं की सेवा और सार्थकता को लेकर कोई सवाल होता है तो इसमें गलती न तो उन सत्ताओं की होती है जो लोकतंत्र की पगडंडियों से होकर सत्ता सिंहासन तक पहुंचती है और न ही सिस्टम से जुडे उन महानुभावों की कोई त्रुटि होती है जिनके लिये आजादी के बाद से लेकर आज तक कोई ऐसा मैकनिजिम खडा नहीं हो सका, न ही व्यवहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था जिससे उसका आचरण, जीवंत और संवेदनशील हो सके। बातें बहुत है मगर जिस तरह की तैयारी रोजगार को लेकर शहरी और ग्रामीण स्तर पर सत्तायें करने में जुटी है खासकर म.प्र., अगर सत्तारूपी अहंकार, सेवा कल्याण के आडे नहीं आया तो निश्चित ही सरकार के के प्रयास सार्थक भी होंग...

अधूरे तंत्र और आभावों के बीच संकटपूर्ण जीवन निर्वहन कत्र्तव्यनिष्ठा को कलंकित करती कृतज्ञता

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विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  पहले ही इतनी सारी दुष्वारियां ही इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या कम थी जिन्होंने लोकतंत्र के नरबस सिस्टम को भ्रष्टाचाररूपी महामारी से पहले ही बेजान कर रखा था। जिसको ठीक करते-करते भ्रष्टाचार तो खत्म नहीं हुआ बल्कि मानवता का नैतिक पतन ऐसा हुआ कि लोग भ्रष्टाचार को ही शिष्टाचार मान उसे स्वीकार्यता देने में सफल रहे। अगर यो कहें कि इस अर्थ दुनिया में अब भ्रष्टाचार कोई विषय नहीं रहा तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। फिर वो क्षेत्र राजनैतिक, सामाजिक या संस्थागत हो या मानव जीवन के निर्वहन के विभिन्न पहलुओं से बंधा हो। जिस तरह से आज संस्थागत सामाजिक कत्र्तव्य विमुखता भ्रष्टाचार के उदाहरण मौजूदा प्रमाण गली, मौहल्लों से लेकर महानगरों तक फैले पडे है वह किसी से छिपे नहीं। मगर बैवसी ऐसी कि उसके अलावा जिन्दा रहने अब कोई चारा भी नहीं। फिर चाहे वह पेयजल संकट हो, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा हो या फिर संचार या सेवा से जुडी अन्य सेवायें हो। सभी दूर लोगों की आशा-आकांक्षायें बिलखती नजर आयेंगी और यहीं कारण है कि अब मानव, समाज दो वर्गो की ओर बढ रहा है जो सोशक, पोशक के अलावा संपन्न आभा...

मानवता की रक्षा, सत्ता और सामर्थशालियों का धर्म अहंकार में बिगडते हालात सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ हुआ होता, तो हालात आज कुछ और होते

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कहते है सृजनपूर्ण सोच मन, कर्म, वचन और पुरूषार्थ सृष्टि में सम्मानजनक रहा है और वह समृद्ध, खुशहाल मानव कृति की पूंजी भी है। मगर अहंकार की आग अनादिकाल से मानव संततति का बडा नुकसान करती रही है और वह क्रम आज भी अनवरत जारी है। बैसे भी अनादिकाल से मानव व मानवता की रक्षा को सबसे बडा धर्म कहा गया है और उसकी और उसके अस्तित्व को बचाने समय-समय पर बडे-बडे संग्राम जिन पुरूषार्थियों और सत्ताओं ने सृजन, सृष्टि में मौजूद मानवीय सभ्यता जीव-जगत के कल्याण का साथ दिया और धर्म के लिये पुरूषार्थ किया वह हमेशा सफल रहे तथा जिनके कारण संतुलन का सिद्धान्त बिगडा और मानव और जीव-जगत के जीवन पर संकट हुआ वह सब संघार के पात्र बने। अब चूकि कोरोनाकाल की भयाभय दस्तक समूची मानवता पर टूट पडी और चर्मोत्कर्ष की ओर अग्रसर है ऐसे में राजधर्म, सत्ता धर्म और पुरूषार्थियों के पुरूषार्थ का अक्षम, असफल सिद्ध होना सबसे बडी खतरे की घंटी है। ये अलग बात है कि भारतवर्ष में भले ही दो माह बाद रफ्तार में तेजी आ रही हो। मगर फिलहाल इसे सृजन विरूद्ध ही कहा जायेगा। मगर एक लाख चालीस हजार के आ...

आशा-आकांक्षाओं का कचूमर कूटता भीडतंत्र कत्र्तव्य विमुखता के कीर्तिमानों से थर्राया जीवन

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  आजकल सिद्धान्तः न सही व्यवहारिक तौर पर जिस तरह की कत्र्तव्य विमुखता आचरण व्यवहार में घर करती जा रही हो, परिणाम कि आशा-आकांक्षाओं का कचूमर कूटता भीडतंत्र इतना हावी हो चला कि लोग न तो व्यवस्थागत कानून समझने तैयार है और न ही पालनहार कानून का पालन कराने तैयार। हालात ये है कि मन चाहे ढंग से फूटते धमाके और किसी भी शिष्ट पुरूष के खिलाफ अर्नगल बयानबाजी बगैर जाने-सोचे समझे कि उसके कृत्य से जीवन में कौन-कौन से कष्ट संकट उत्पन्न हो सकते है। मगर स्वयं स्वार्थ में डूब जिस तरह का आचरण व्यवहार आज संस्कृति बन संस्कार का भाग बन रहा है वह बडा ही घातक है। उन सत्ता, सरकारों और समाज के लिये जो सेवा कल्याण, विकास को लक्ष्य मान सेवा कल्याण के कार्य में दिन रात जुटी है। काश इस व्यवहारिक सच को हम अपना स्वार्थ छोडा समझ पाये और सत्ता सिंहासन पर बैठे लोग अपने राजधर्म का पालन कर कोई ऐसा सिस्टम खडा कर पाये जहां कानून की सहर्ष मान्यता भी हो और निष्ठापूर्ण तरीके से कानून का पालन भी हो। 

अन्तरमुखी परमानन्दियों की ऐसगाह बनता लोकतंत्र अमृत्व का आनंद भोगते संरक्षक और सेवक बिलखते गांव, गली, मजदूर और मातम में डूबी आशा-आकांक्षा

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कोरोना ने समूचे विश्व में जिस तरह से कहर बरपाया है और जिस तरह से वह भारतवर्ष को धीरे-धीरे जकड रहा है ऐसी विपदा की कल्पना शायद ही किसी ने की हो। मगर गांव, गली, मजदूर और करोडों-करोड आशा-आकांक्षाओं पर इसका जो कहर टूटा है वह किसी से छिपा नहीं। कोरोना की कृतज्ञता को देख लगता है कि उसने विश्व में ऐसे किसी राष्ट्र को छोडा भी नहीं जो स्वयं को सबसे बडा बलशाली समृद्ध और शक्तिशाली समझते है। कोरोना से जंग तो दूर समूचा विश्व मिलकर अभी तक उससे बचाव के कोई कारगार कदम तक नहीं खोज सका। मगर जहां-जहां अपरिपक्व लोकतंत्र है वहां की व्यवस्थायें और सडक पर संघर्ष करते लोगों को देख नहीं लगता कि लोकतंत्र सेवा कल्याण और विकास की कारगार व्यवस्था है या फिर अंतरमुखी परमानन्दियों की ऐसगाह। ऐसे में अमृत्व का मुगालता पाल आनंद भोगते संरक्षक, सेवक जिस तरह से सेवा कल्याण में जुटे है उनकी कृतज्ञता को इतिहास किस नाम से जानेगा यह तो भविष्य के गर्व में है। मगर कहीं पर भी समूचे ब्रम्हाण्ड में कोई भी जीवन है तो उसकी मृत्यु भी सुनिश्चित है जिसका आधार संतुलन का सिद्धान्त ही कहा जा...

सत्ताओं का स्वभाव दमनात्मक या कल्याणकारी यक्ष सवाल को लेकर उठे सवाल

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  आज जब कोरोनाकाल में लोग अपने संघर्षपूर्ण जीवन की व्यस्ताओं से इतर जब एकाग्रचित हो, ऐसे में विभिन्न विषयों समस्या समाधान एवं विभिन्न स्वभावों पर सवाल होना लाजमी है। यूं भी पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग और शैतान का घर। ऐसे में अगर सत्ता स्वभाव को लेकर कुछ सवाल है तो उन पर विचार अवश्य होना चाहिए। कभी जब सत्तायें सेवाभावी कल्याणकारी और उन सत्ताओं पर आसीन लोग त्यागी, निःस्वार्थ कत्र्तव्य निर्वहन को अपना धर्म मानने वाले होते है और अपने कर्म को ही जीवन की सबसे बडी कृतज्ञता और कमाया धन समझते है तो उनके कत्र्तव्य निर्वहन को लोग सफल, सराहनीय समझते है तथा लोगों को सुखद जीवन और समृद्धि की अनुभूति तो होती ही है साथ ही ऐसी सत्ताओं को पाकर आमजन स्वयं को धन्य समझने लगता है। आज जब कभी रामराज की चर्चा होती है तो निश्चित ही लोग त्याग, सेवा कल्याण की उस पराकाष्ठा के दर्शन करते है और उस पुरूषार्थ को आज भी याद कर स्वयं पर गर्व मेहसूस करते है।  मगर विगत सैकडों वर्षो की सत्ताओं को देखें तो उनका स्वभाव लगभग संरक्षक बतौर व्यवस्थायें चलाने एक सोशक का ही कह...

लोगों का समृद्ध, खुशहाल जीवन, देखने सुनने से नहीं करने से बनेगा समृद्ध सियासत की दरकार

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कोरोनाकाल के बीच सेवा कल्याण की परवाह किये बगैर जिस तरह से सियासत म.प्र. में सातवे आसमान पर है उसको देखते हुये गांव, गली के आम गरीब का सावधान होना बहुत आवश्यक है। अगर अभी भी छोटे-छोटे स्वार्थो की पूर्ति व बडे-बडे सियासी दल नेताओं को भगवान मान अपने और अपनी आने वाली पीढी के सुखद समृद्ध जीवन की उम्मीद में है तो इससे बडा झूठ और कोई हो नहीं सकता। लोकतंत्र में वोट की ताकत अहम है और जिस भी व्यक्ति को सर्वाधिक वोट प्राप्त होते है वह विधायक कहलाता है जो सदन और सरकार से संघर्ष कर अपने क्षेत्र के लोगों का जीवन सुखद समृद्ध बना सकता है। बस इतनी सी बात अगर हर मतदाता ने अपने छोटे-छोटे स्वार्थ छोड समझ ली, तो विगत 70 वर्षो से झेलते आ रहे पीडा के दंश को हो सकता है आगे न झेलना पडें। इसलिये जरूरी है कि गांव-गांव, गली-गली लोग इकट्ठे हो निःस्वार्थ भाव से अपने-अपने सक्षम और संघर्षशील व्यक्ति को सामने रख चुनाव की तैयारियां रखे, नहीं तो जिस तरह से विगत 30 वर्ष से वोट लेने-देने का दौर सियासी दल व कभी न दिखने वाले चेहरों के रूप में बदली हैसियत में सामने आते है ...

नैतिक पतन के बीच, सेवा कल्याण की उम्मीद दम तोडते संस्कार और विलखती संस्कृति स्वाभिमान समृद्ध, खुशहाल जीवन को दया की दरकार

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कहते है जब कोई मानवीय सभ्यता जीवन निर्वहन में तथा देखते जानते बूझते जब कोई भी इंसान क्षणिक स्वार्थवत मूर्ख बन दिमागी तौर पर दिवालिया हो जाये तो ऐसी सभ्यता और उसकी संस्कृति तथा संस्कारों का दम निकलना तय है। देखा जाये तो विगत 30 वर्षो के प्रमाणिक परिणाम सेवा कल्याण को लेकर लोगों की आंखों के सामने है और जिन आचार-विचार, व्यवहार तथा पहचान से वह आये दिन दो चार होता रहता है। अगर सही वक्त पर उसका भी संज्ञान न रहे तो उसे कैसा समाज कहा जाये। देखा जाये तो सूचना क्रान्ति के दौर में बडी लोगों की समझ और स्वयं के स्वार्थ तथा आलस्यपूर्ण निकम्मी बैवसी और फ्री में दया, भीख के उम्मीद के चलते जब वह निठल्ली हो जाये और उसे यह ज्ञान तक न रहे कि सच क्या है और गलत क्या तथा सच के सामने ही मुंह मोड वह शर्म मेहसूस न करें और इसी जीवन निर्वहन को जब वह अपना मान-सम्मान, स्वाभिमान मान खुशहाल, समृद्ध जीवन की कुंजी मान लें लगे तो इससे बडा दिमागी दिवालिया और सांस्कृारिक उजाड और कोई हो नहीं सकता। सियासत सत्ता को व्यवसाय समझ व्यापार बनाने वाली सियासत का सबसे बडा सत्य आज सेवा...

व्यथित प्रधानमंत्री ने आफत के बीच खुद संभाला मोर्चा पीडित प्रभावित वंचितों का हाल जानने स्वयं किया कूच कलेक्टर को नहीं पता, स्टार्टप क्या है ?

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कोरोना कहर के बीच 130 करोड जीवन की रक्षा हेतु प्रधानमंत्री यूं तो अपने आवासीय आॅफिस बैठ कोरोना से जंग का नेतृत्व स्वयं कर मोर्चा संभाले थे। कभी देश को समझाईस, तो कभी समझाईस की थप्पी कोरोना से बचाव के सुझावों के बीच व्यवस्थाओं की बागडोर संभालते रहे। अब जब देश के दो राज्य पंश्चिम बंगाल, उडीसा में समुद्री तूफान का कहर बरपा है ऐसे में कोरोना महामारी के बीच स्वयं का आवास छोड प्रधानमंत्री ने प्रभावित राज्यों की ओर कूच कर दिया। प्राकृतिक आपदाओं मानवीय भूल से हुई तबाहियों का अखाडा बने देश को बचाने जिस तरह से प्रधानमंत्री ने विगत वर्षो से बगैर विचलित हुये देश को नेतृत्व दिया और कोरोनाकाल के बीच देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये संकल्पित किया है वह प्रधानमंत्री के पुरूषार्थ की एक नजीर हो सकती है। मगर जिस देश का प्रधानमंत्री इतना संवेदनशील, दूर-दृष्टा पुरूषार्थी हो उस देश के 733 जिलों में से म.प्र. के एक जिले के कलेक्टर को यह भी पता न हो कि स्टार्टप क्या है यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। आॅनलाईन के अलाउद्दीन चिराग से जीवन की समृद्धि, खुशहाली तलाशती...

कागजी घोडे पर सवार सेवा कल्याण से कलफते लोग बैठकों की बाढ में बैवस आशा-आकांक्षा पहले ही जीवन में दुष्वारियां क्या कम थी जो कोरोना के कहर ने कोहराम मचा रखा है

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  विगत दो दशक से कागजी घोडो पर सवार सेवा कल्याण और आज कोरोना के कहर के बीच जीवन में जो कोहराम मचा है वहीं बैठकों की बाढ में जिस तरह से आशा-आकांक्षाओं को बैवस बना संकट का दंश झेलने मजबूर कर रखा है वह आज विचारणीय विषय होना चाहिए। कोरोना कहर से मानव सभ्यता का अंजाम जब होगा तब होगा। मगर जिस तरह से कत्र्तव्यनिष्ठा का दौर चल रहा है वह निढाल लोगों के दिल दहलाने काफी है। देश में एक ओर जहां हर रोज लगभग चार पाच हजार संक्रमितों की संख्या बढ रही है तो वहीं समूचे देश में आंकडा फिलहाल एक लाख के पार जा पहुंचा है। मगर यहां समझने वाली बात यह है कि सेवा कल्याण में पूर्व से ही सक्रिय शासकीय अमले की कमी का रोना तो पहले से ही था जिसका कारण उधार के माल पर सत्ताआंे का मोहताज रहना और कम स्टेप्लेप्स में कर्ज हासिल करना रहा है। अब जब अमले की सख्त जरूरत है तब कागजी घोडों के सहारे बैठकों की बाढ के बीच सेवा कल्याण विकास हो रहा है तो उस पर आज नहीं तो कल सवाल होना तो तय है। फिलहाल तो कोरोना के चलते आमजन जीवन जहां बेहाल है तो वहीं दूसरी ओर व्यवस्थायें कंगाल। अगर आज भी ...

अगर सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के साथ त्रिस्तरीय कोरोना शहर सेन्टरों की स्थापना न हुई तो परिणाम घातक हो सकते है न वर्क डायरी, न ही सार्थक मूल्यांकन बेपरवाह होता कत्र्तव्य निर्वहन

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  अगर 16 मार्च से लेकर 24 मार्च के बीच स्वराज के आग्रह पर विचार हुआ होता तो मानव जगत को यह दिन न देखना पड रहा होता। जिस तरह से होच-पौच माहौल के बीच लगातार कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ रही है वह निश्चित ही चिन्ता का विषय है। भले ही आंकडा फिलहाल एक लाख के पार पहुंच चुका हो, तो वहीं 35 फीसदी से अधिक संक्रमित लोगों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ हो। मगर जिस तरह से अपने-अपने घरों की ओर जाने की जिद मानव के मन में घर कर चुकी है कहीं यह जान की दुश्मन न बन जाये। स्वराज ने पूर्व में भी आबादी से दूर कोरोना चिकित्सा सेन्टर की स्थापना की बात कही थी जब मरीजों की संख्या देश में एक हजार से भी कम थी। अगर उसी समय आबादी से दूर त्रिस्तरीय कोरोना सेन्टर बन गये होते तो समूचा देश आज कोरोना की इस भयानक चपेट न होता और न ही इतने बडे स्तर पर मजदूरों का पलायन हो अर्थव्यवस्था चैपट होती। स्वराज ने सील सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के साथ कोरोना सेन्टर खोले जाने की बात कही थी। मगर कहते है कि जब सत्तायें अपने सिस्टम की मोहताज हो जाती है और शासक सेवकों के निर्णय पर निर्भर तो निर...

बडे नुकसान से बेखबर, बैवस मानवता, मोहताज जीवन के मुहाने पर

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जिस मार्ग पर हम नैसर्गिक विधान को त्याग लगभग पौने दो सौ वर्ष की यात्रा को स्वार्थवत प्रायोजित शिक्षा और जीवन के आम विधानों के साथ समृद्ध, खुशहाल जीवन की प्रत्याशा में पूर्ण कर चुके है। परिणाम कि न तो हमारा जीवन समृद्ध हुआ, न ही वह खुशहाल हो सका और आज भी हम निर्जीव शिाक्षा, संस्कृति में समृद्ध, खुशहाल जीवन की खोज में जुटे है। अब तो हालात यहां तक आ पहुंचे है कि जितना गंभीर आज की चिकित्सा सेवाओं में मरीज नहीं उससे अधिक गंभीर बीमार तो हमारे नीम-हकीम नजर आते है। फिर क्षेत्र आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, संस्थागत हो या फिर हमारी सेवा सुविधाये हो। अगर यो कहे कि पारदर्शी रूप से समझ के पैमाने पर मरीज और हकीम एक दूसरे से जुदा है और मानवता छाती पीठ मातम मनाने में जुटी है तो कोई अति संयोक्ति न होगी।  वहीं दूसरी ओर सत्ता, धन, संसाधनों से समृद्ध, सियासत, संस्थायें अपने अमृत्व का मुगालता पाल स्वयं को सेवा कल्याण के नाम स्वयं सिद्धि में जुटी है। अगर यो कहे कि बडे नुकसान से बेखबर बैवस मानवता का कारवां कोरोना के मकडजाल में फसता नजर आ रहा है तो इसमें कि...

स्वकल्याण में बिलखता लोक-कल्याण विधि की आड में पनपती जनधन लूट की प्रवृति

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जब से विकास, सेवा के नाम पब्लिक, प्रायवेट पार्टनरशिप का मंत्र प्रचलन में क्या आया मानो लोगों को विधि सम्वत जनधन का लूट का लायसन्स मिल गया हो। फिर बात अधोरंचना निर्माण में पुल, सडक, पेयजल, बिजली उपलब्धता को लेकर हो या फिर संचार जैसी सेवासुविधाओं को लेकर सभी दूर एक ही लक्ष्य दिखाई पडता है। स्व-राजनीति और आर्थिक स्थिति चमकाने जिस तरह से गांव, गरीब, पीडित, वंचितों के साथ आर्थिक धोखा देने का जो गोलबंद कारवां शुरू हुआ है वह दिल दहला देने वाला है, न तो इस तरह की योजनाओं का आर्थिक कल्याणकारी लाभ देखा जाता और न ही आम लोगों को मिलने वाली सुविधाओं का पैमाना खोजा जाता है। बल्कि जगह-जगह पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप के नाम अस्तित्व में आये बसूली के धंधे से आम गरीब की कमर टूटने मजबूर है। चाहे वह रेल लाईनों से जुडे अनुपयोगी योजनायें हो या फिर हाईवे और नेटवर्क मोबाईल सुविधायें सभी दूर सेवा के नाम एकतरफा खेल चल रहा है जिसे राष्ट्र-भक्त, राष्ट्र-जन व जन और राष्ट्र कल्याण में आस्था रखने लोगों को अवश्य देखना चाहिए। अगर यहीं मनमाना क्रम विधि की आड में गोलबंद चल...

नैतिक पतन का नंगा नाच राक्षसी मानसिकता की पराकाष्ठा आपसी आर्थिक लूट से कांपी बैवस मानवता

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वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जीवन में मन, कर्म, वचन की कृतज्ञता से प्राप्त परिणाम मानव की श्रेष्ठता, सफलता, असफलता का पैमाना होते है। जब भी इन तीनों में से एक भी आचरण पथभ्रष्ट हो, तो सृष्टि जनित नैसर्गिक स्वभाव, मानवता की पहचान को कलंकित करने के कारक सिद्ध हो, तो वह सृजन में अपनी पहचान ही नहीं, अपना अर्थ भी खो देता है। तब की स्थिति में ऐसे आचरण, व्यवहार चरित्र की तुलना पशुवत करना भी जीवन में निष्ठापूर्ण नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले उन महान पशु, जीव, जन्तुओं का अपमान है और महापाप। कोरोनाकाल में जिस तरह से आम जरूरत की चीजों की खरीद में कोहराम मचा है जिसे हम कभी भ्रष्ट आचरण की संज्ञा देते नहीं थकते थे और पानी पी-पी कर सत्ता और सरकारों को कोसते से नहीं चूकते थे। मगर जब आज कोरोना से लडते घरों में बंद बैवस, मजबूर लोगों को जरूरत की चीजों की उपलब्धता के नाम पर ऊपर से लेकर नीचे तक मनमाने दामों पर यहां तक कि दो गुना दस गुना दामों पर माल बेचा जा रहा है वह मानव के राक्षसी गुण समझने काफी है। गली, मौहल्लों से लेकर बाजारों तक में पसरी व्यापार की इस नई संस...

गांव, गली में वोट कबाडुओं की बढती चहलकदमी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी

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वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा। शायद देश के प्रधानमंत्री जी ने प्राचीन किवदंति को बल देते हुये अपने राष्ट्र सम्बोधन में सही ही कहा था कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। ये अलग बात है कि यह बात उन्होंने कोरोना महामारी से बचने मुंह पर मास्क, गमछा या तोलिया से ढकने और दो गज की दूरी बनाये रखने के परपेक्क्ष में कही हो। अगर यह खबर सही है कि गांव, गली में कोरोनाकाल के बीच वोट कबाडुओं की चहलकदमी बडी है और जिस तरह से उपचुनाव को लेकर कोरोना के बीच सत्ता के लिये रायसुमारी चल रही है। ऐेसे में दीन दुनिया से घरों में बंद उन राजनैतिक दलों के बारे में आम नागरिक को अवश्य विचार करना चाहिए जिन्हें वह विगत 70 वर्षो से हर चुनाव में वोट देते आ रहे है। उनसे इस मौके पर पूर्ण विचार उपरांत यह सवाल अवश्य करना चाहिए कि आज हम क्यों अपने घरों में बंद रह सीधे कोरोना से सामना करने अकेले बैवस मजबूर है। क्यों हम अपने नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन में अक्षम, असफल साबित हो रहे है। आखिर 70 वर्षो में आप लोगों की ऐसी क्या बैवसी मजबूरी रही कि आप उत्तम, स्वच्छंद, शिक्षण व्यवस्था को कायम करने एवं सृजनपूर्ण, संस्कारिक ...

अव्यवहारिक निर्णयों से असमंजस में राष्ट्र-जन सत्ताओं की व्यवहारिक बुद्धिमता को लेकर उठते सवाल

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वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  वार्षिक परीक्षाओं के संबंध में केन्द्रीय विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालय स्तर पर जिस तरह से निर्णय लें, लोगों को बताया कि समझाया जा रहा है यह दुर्भाग्यपूर्ण है या यों कहें कि कोरोना को लेकर देशभर में मची होच-पोच और राज्य सत्ताओं के दूर दृष्टा न होने के जो दुष्परिणाम आज आमजन को भोगना पड रहे है वह दर्दनाक ही कहे जायेंगे। माना जाता है कि सत्तायें हमेशा दूरगामी सोच और सार्थक परिणामों की सार्थी और साक्षी रही है। मगर जिस तरह के निर्णय घण्टों-मिनटों में हो रहे है वह न तो कल्याणकारी ही हो सकते है और न ही कोई समाधान दे सकते है। अब इसे सत्ताओं का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि आज उनके पास समझ, सोच का इतना अकाल पडा है कि वह सटीक निर्णयों में भी अक्षम, असफल साबित हो रहे है। प्रमाण कुव्यवस्था के रूप में पर्याप्त मौजूद है। बेहतर हो कि कार्य प्रदर्शन में सुधार के साथ सर्वकल्याण का भाव स्पष्ट हो तभी हम इस महासंकट से निकल पायेंगे। 

सत्ताओं में सार्थक समाधानों का आभाव सेवा, समृद्धि में बडी बाधा, सांख्यिकीय ज्ञान के आभाव में दिशाहीन विकास और समाधान स्वार्थ की नींव पर सत्ताओं के महल शर्मनाक बगैर स्वराज के असंभव है आत्मनिर्भरता सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस ही हो सकता है प्रमाणिक समाधान

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का मूल आधार सियासी दलों की जन सामान में मान्यता और प्राप्त वोट का आधार होता है जहां जनसमस्याओं की बिना पर जनप्रतिनिधि या दल विश्वास और वोट से सत्ता हासिल कर उनके समाधान उसे ढूढने का अपना कत्र्तव्य निभाते है। मगर जब दल सत्ता के पिचलग्गू और सत्तायें स्वयंभू हो जाती है ऐसे में समझ और समाधान का संकट सांख्यिकी के आभाव में बढ जाता है। दुर्भाग्य कि सौभाग्य से कठिन संघर्ष कुर्बानी पश्चात हमें आजादी तो मिली। मगर हम 70 वर्ष बाद भी अपनी शिक्षा और लोकशाही के सिस्टम को उचित प्रशिक्षण नहीं दे पाये।  परिणाम कि आज हमारा तंत्र लोक, जन की भावना से जुदा तो सत्तायें सार्थक समाधान ढूंढने में अक्षम साबित हो रही है। सत्ताओं की बैवसी यह है कि वह स्थापित सिस्टम के बाहर नहीं जा सकती और सिस्टम की बैवसी यह है कि वह अपने विधि सम्वत स्थापित सिद्धान्त और प्रशिक्षण से प्राप्त हुनर केे बाहर नहीं आ सकती। इस दुष्चक्र के भंवर में फंसी आशा-आकांक्षाओं का भविष्य क्या होगा फिलहाल इन संभावनाओं के बीच स्पष्ट है। मगर इतना तय है कि जब त...

निःस्वार्थ नेतृत्व की अदभुत निष्ठा अगर निर्णय सार्थक है तो फिर सवाल स्वतः ही र्निरथक कहे जायेंगे गांव, गली, गरीब को खोला खजाना बैवस सियासत बडे निर्णय पुरूषार्थ की सिद्धता में साक्षी अदम्य साहस जबावदेहपूर्ण ज्वइंटवेंचर बन सकता है, आत्मनिर्भर समृद्ध अर्थव्यवस्था का अचूक अस्त्र शास्त्रार्थ, प्रदर्शन की प्रमाणिक न्यायपूर्ण व्यवस्था राजसत्ता का राजधर्म

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  जिस वृहत टीम के साथ आदर्श राजनीति एवं सर्वकल्याण के भाव के साथ मानव कल्याण को लक्ष्य मान आज की सियासत में जिस तरह से सैकडो वर्ष बाद राष्ट्र-जन कल्याण की शुरूआत व्यापक पैमाने पर नीतिगत तौर पर अब से 6़ वर्ष पूर्व यथार्थता हुई है। भले ही परिणामों का पैमाना जो भी हो। मगर अब कोरोनाकाल में ऐसे निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की उस नेतृत्व की चर्चा न हो तो यह आदर्श राजनीति के साथ बडा अन्याय होगा। हम चर्चा करें, इससे पूर्व धन्यवाद, साधूवाद के पात्र है वह महापुरूष जिन्होंने राष्ट्र-जन कल्याण के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर लोगों को जोड निःस्वार्थ भाव से संघर्षपूर्ण यात्रा शुरू कर कारवां को यहां तक पहुंचाया। धन्यवाद के पात्र है सत्ता के वह सहोदर जिन्होंने अपनी-अपनी समझ अनुसार राष्ट्र-जन कल्याण के लिये अदम्य साहस के साथ पुरूषार्थ कर अनगिनत कुर्बानियां दें, राष्ट्र को यहां तक पहुंचाया। मगर आज की सियासत में बिखरे पडे बर्बाद सियासी सार्वजनिक आदर्श सरोकारों को समेट सदमार्ग का रास्ता सर्वकल्याण का रास्ता जिस तरह से प्रस्त हो रहा है और राष्ट्र-जन की समृद्धि,...

मर कर भी अमर है, जिनकी जन के प्रति कृतज्ञता जनसेवा में धैर्य, साहस, दया की प्रतिमूर्ति थी राजमाता विजयाराजे सिंधिया

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वीरेन्द्र शर्मा  विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कोरोना महासंकट के बीच जिस तरह से स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया फांउडेंशन ट्रस्ट ने पीडित, वंचित, जरूरतमंदों के बीच मदद की, जो मिशाल प्रस्तुत की है वह राजमाता के जीवन में स्थापित उस संस्कृति का परिणाम है जो संस्कार के रूप में आज भी 20 वर्ष बाद लोगों के बीच जिन्दा है। जिस तरह से दो कदम आगे बढ फाउंडेशन के लोगों ने कोरोना महामारी के बीच मदद का बीडा उठाया क्या सरकारी, क्या गैर सरकारी, क्या पीडित, वंचित एवं पलायन करते मजदूरों की मदद कर वह निश्चित ही राजमाता की जनसेवा में कृतज्ञता को स्थापित करता है। जिस राजमाता ने स्वयं के जिन्दा रहते किसी आन्दोलन में दो छात्रों की पुलिस की गोली से मौत होने पर महल त्याग अपना विरोध दर्ज कराया और इमरजेंसी के दौरान जेल की सलाखों के बीच आमजन की खातिर महीनों का समय बिताया जो राजमाता डकैत समस्या के चलते पुलिस को यह उदाहरण देने से कभी पीछे नहीं रही कि जब महाराज थे तो डकैतों का सामना करने महाराज स्वयं जंगलों में जाकर कैम्प किया करते थे। आज उनके नाम से स्थापित फाउंडेशन ने जिस तरह से जनसेवा में अपनी सार्थकता सिद्ध की ...

ग्लोबल संस्कृति में जनसेवा की मिशाल आॅफिस और घरों में बैठ, बैठकों के माध्यम से फर्राटे भरती राहत और सेवा

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  आज के दौर में ग्लोबल संस्कृति से प्रतिपादित तकनीक सत्ताओं के लिये कभी इतनी कारगार होगी कि जिसकी कृतज्ञता का भान किसी को सपने में भी न रहा होगा। जिस तरह से आॅफिस घरों में तकनीक के माध्यम से वीडियों काॅन्फ्रिस से और एक क्लीक के माध्यम से राहत पीडित, वंचित, बैवस, मजबूरों तक पहुंच रही है वह काबिले तारीफ। सुना तो ये था कि कबीलाई प्रथा में कबीले का सरदार और राजशी प्रथा में राजा स्वयं मैदाने-ए जंग में अपने सैनिक साथियों के साथ संकट का सामना मिल-जुलकर किया करते थे। यहां तक कि अताताई, आक्रांता, लुटेरे भी मुखिया होने के नाते, सरगना होने के नाते अपना पुरूषार्थ सामूहिक रूप से मैदाने-ए जंग में किया करते थे। मगर धन्य है संस्कृति जिसने कम से कम हमारे मुखियाओं को इतना सक्षम बना उन्हें समर्थ बना दिया कि अब कोरोना जैसे महासंकट के आमने-सामने का युद्ध सैनिकों के बजाये जनता सीधे लड रही हो और कंधे से कंधा मिलाकर हमारी पुलिस स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डाल दिन रात लगे हो। मगर हमारे शासकों की दिनरात की कृतज्ञता भी कुछ कम नहीं जो तकनीक के सहारे बैठकें, वीड...

20 लाख करोड के सार्थक परिणाम, पुराने सडे सिस्टम से नहीं, नई लाईन से प्राप्त होंगे परिणाम बडे बदलाव के लिये उठाने होंगे बडे कदम दिशा-दशा तय करने उत्पादन, मांगपूर्ति तो ज्वलन्त विषय है ही, लेकिन रैपलेसमेंट तकनीक हो सकती है सार्थी सहज अवसर की दरकार

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  कोरोनाकाल के बीच 20 लाख करोड के आर्थिक पैकेज का बडा बूस्टर निश्चित ही जीवन से जूझती जिन्दगियों के लिये बडा मददगार कहा जा सकता है। मगर इसकी सफलता का आधार रेपलेसमेंट तकनीक के साथ सहज अवसर ही हो सकते है। मगर जब तक राज्य सरकारें केन्द्र सरकार की भांति अभूतपूर्व निर्णयों की साक्षी नहीं बनती, तब तक सारे प्रयास निरथक ही कहे जायेंगे। आज जरूरत पुरानी पाईप लाईन से लोगों तक राहत पहुंचाने की नहीं। अब्बल देश से 133 जिलों को सामने रख उनके प्रकृति अनुरूप संसाधन और उत्पादन के साथ उनके बाजार बढाने की है। मगर यह तभी संभव है जब सरकारें अपने स्थापित व्यवस्थागत अक्स से बाहर निकल जनआकांक्षाओं को अंजाम तक पहंुचाने निहित स्वार्थो को दरकिनार कर सार्थक प्रयास करे। 

मदमुग्ध, अमृत्व हुआ, वेलगाम जीवन से जद्दोहद करती जिन्दगियां

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  माननीय श्रीमानों आप तो बैसे भी विधि सम्वत समृद्ध, संरक्षित, शक्तिशाली है और हमारा आपके सेवक होने पर अगाद विश्वास, हमारी वोट की और टेक्स के रूप में मिलने वाले अर्थ की शक्ति ने आपको निर्भीक होकर जनसेवा कल्याण के लिये सक्षम, समृद्ध बनाया है। मगर आज जब उन खानाबदोस्सों की स्थिति में कोरोना के चलते सडकों पर हम बदहाल है ऐसे में हमें उम्मीद है कि आप हमारी इस असहनीय पीडा और स्थिति से बाकिब होंगे। जिस रोजगार की चाहत में कभी हमने अपना गांव घर द्वार छोडा और शहरों को हमने दिन रात मेहनत कर आवाद किया तथा समृद्ध शहर नगर होने का रूतवा दिया आज वहीं शहर और वो लोग हमारे लिये अंजान हो चुके है। हमारे पैर के छाले और छालों से हुये घाव इस बात के गवाह है कि भीषण गर्मी में वेहाल हम किस महासंकट को झेलने पर मजबूर है।  माननीय श्रीमानों आपके हाथ में कानून है, सत्ता है, समूचे संसाधन है अगर हम अपनी अक्षुण बुद्धि की माने तो हमारे पास जहाज, रेल, बस वाहनों का बेडा पूरे देश में भरपूर खडा है। लाॅकडाउन के दौर में 70 फीसदी अमला बेकार पडा है यह सही है कि सडे सिस्टम से मज...

प्रमाणिक पुरूषार्थ तभी संभव है जब परिणामों का आधार व्यवहारिक और शांख्किय हो संभावना, साक्ष के बीच सार्थक समन्वय हो सकता है सिद्धि का आधार क्रियान्वयन का सिद्धान्तः, व्यवहार दे सकता है अवसरों को उडान बगैर स्वराज असंभव है आत्मनिर्भरता 20 नहीं 100 लाख करोड खर्च से भी, कुछ नहीं होने वाला, जरूरत बेहतर समझ के साथ समन्वय की

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  यूं तो अनादिकाल से आध्यात्म आधारित ब्रम्ह ज्ञान, समाज, ज्ञान-विज्ञान ने स्थापित सिद्धान्त और नैसर्गिक व्यवहार का चोली दामन का साथ रहा है और पुरूषार्थ की पराकाष्ठा तथा उसके सार्थक परिणाम कहते है कि नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप स्थापित सिद्धान्तों को आधार मान किया गया निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कभी निष्पल नहीं रहा। मगर वर्तमान परिवेश में हम देखते है कि नये-नये नाम से नई-नई कार्य योजना और उनके क्रियान्वयन के अक्षम, असफल स्वरूप को भले ही उनके सिद्धान्तः और व्यवहारिक परिणाम कितने ही परिणाम मूलक, कल्याणकारी हो। मगर वह कभी सार्थक सफल नहीं हो सके, न ही वह अपनी सिद्धतः साबित कर सके और बडे पैमाने पर अक्षम, असफल ही सिद्ध हुये। अगर उदाहरण स्वरूप देखे तो जय जवान, जय किसान का नारा गुठ-निरपेक्ष संगठन की कल्पना नगर, पंचायतीराज की स्थापना शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और खादन्न के अधिकार या फिर स्वच्छता अभियान, जनधन, डिजीटल, ग्रीन स्र्टाटप, मेकइन इण्डिया, गंगा शुद्धिकरण और सडकों के जाल हो। कारण साक्ष, शांख्यिकीय संस्कृति का सिस्टम में आधार और निष्ठापूर्...

चाकचैबंद हुई स्वास्थ्य सेवायें 3 हजार का अमला दे रहा है सेवायें

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  अगर बात म.प्र. के शिवपुरी जिले की करें तो लगभग 18 लाख की आबादी वाले इस जिले में संक्रमितों की संख्या फिलहाल तीन ही रही है। मगर जिस तरह से जिला मुख्यालय स्थित इकलौते जिला चिकित्सालय में अपनी व्यवस्थायें कोरोना महामारी के साथ सामान्य मरीजों को देखने अलग-अलग सुनिश्चित की है वह काबिले गौर है। अगर यो कहे कि जिला चिकित्सालय में दो सेल बनाये गये है और अस्पताल में जाने का रास्ता एक जो फुल प्रूफ सेनेट्राई व्यवस्था के साथ स्क्रीनिंग का कार्य भी किया जा रहा है जो शिवपुरी के लोगों के लिये राहत की बात होना चाहिए।  ये अलग बात है कि पूर्व की भांति डाॅक्टरों की कमी आज भी जिला चिकित्सालय उतनी ही है जितनी पूर्व में हुआ करती थी अब जबकि कोरोना संकट चल रहा है। ऐेसे में म.प्र. सरकार उनके मंत्री, मुख्यमंत्री को चाहिए जब प्रदेश में अन्य काम अवरूद्ध पडे है ऐसें में चिकित्सकों की भर्ती अविलंम करनी चाहिए जिससे कि लोगों को चिकित्सीय सलाह सुविधा जिला चिकित्सालय ही नहीं दूर-सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी उपलब्ध हो सके इसके लिये सरकार चाहे तो ऐलोपैथिक, आयुवेर्दि...

सशक्त सप्लाई लाईन दे सकती है स्थाई समाधान सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस स्वच्छता को करना होगा आत्मसात सत्ता सरकारें जो भी रही हो, गरीबी क्यों विलखती है यक्ष सवाल

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  विश्व भर ही नहीं जिस तरह से भारतवर्ष में कोरोना पैर पसार रहा है इसका स्थाई समाधान सिर्फ और सिर्फ मजबूत सप्लाई की सुनिश्चिता ही दे सकती है। जिसमें स्वराज का मार्ग जीवन निर्वहन में सबसे अचूक अस्त्र है। अगर सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस स्वच्छता को जीवन निर्वहन में आत्मसात कर लिया जाये तो कोई कारण नहीं कि कोरोना का अस्तित्व भारत में जिन्दा रह सके। आज जब कोरोना महामारी के संकट से समूचा विश्व जूझ रहा है और संक्रमितों की संख्या 25 लाख के पार है। ऐसे में कुछ दिनों से लगभग प्रतिदिन चार हजार के एवरेज से बढते भारत में संक्रमित लोगों की संख्या भी अब 70 हजार के पार जहां पहुंची है। तीसरे लाॅकडाउन के दौर में चल रहे भारतवर्ष में जिस तरह से विभिन्न राज्यों ने लाॅकडाउन बढाने की मांग केन्द्र सरकार से रखी है निश्चित ही केन्द्र और राज्य सरकारों का आपसी समन्वय इस महासंकट से निवटने का कारगार माध्यम माना जा सकता है। मगर जब तक ऊपर से लेकर नीचे तक सप्लाई लाईन सशक्त नहीं हो जाती है तब तक लाॅकडाउन और संक्रमित लोगों की संख्या बढने के आसार प्रबल है। जब हम सील की बात ...

रोजगार कल्याण के क्षेत्र में सिद्धान्तः म.प्र. सरकार की धमाकेदार शुरूआत

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वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा। म.प्र. में कोरोना की व्यापक दस्तक क्यों हुई कौन दोषी है और क्यों दिन व दिन म.प्र. में कोरोना संक्रमितों के आंकडे बढ रहे है। ये अलग बात है मगर इस सत्य से भी मुंह नहीं मोडा जा सकता कि कोरोना जैसे महामारी के बीच ही न तो हमारी व्यवस्था और न ही हम स्वयं सुधरने तैयार है। मगर इस बीच म.प्र. सरकार ने स्वसहायता समूह और मनरेगा के तहत स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा सुलभ रोजगार के लिये श्रम कानूनों में जो सुधार किया है वह स्वागत योग्य ही कहा जायेगा। मगर कई मोर्चो पर पसरी अलाली और महामारी के बीच भी राजनीति चमकाने की जो संस्कृति चल पडी है वह शर्मनाक ही कही जायेगी। जिस तरह से जिन नेताओं के आभाव का दंश कोरोना महासंकट के दौर में लोग झेल रहे है और निर्जीव सेवा सिस्टम को देख रहे है उससे लोग बडे हताश और निराश है। अहम अहंकारी स्वभाव और सेवा के बीच संकटों से जूझते लोग भले ही सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस और लाॅकडाउन का पालन कर रहे हो। मगर फिलहाल इसके अलावा कोई समाधान भी नहीं। उम्मीद की जाने चाहिए कि जो सिस्टम कई पीढियों से जिस संस्कृति, व्यवहार में है उसका अचानक पलट पाना...

पुरूषार्थ से सबक लेने का वक्त समझना होगा त्याग-तपस्या और कडे परिश्रम की इस मिशाल को

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। यह इस महान भूभाग का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि आज भी इस कलयुग में हमारे बीच सृष्टि आधारित नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप त्याग-तपस्वी और सृजन में विश्वास रखने वाले लोग मौजूद है। उनसे सीख लें, सत्ता सियासत से जुडे लोगों को अवश्य सीख लेना चाहिए कि जिस तरह से सर्वोच्च पद को सत्ताओं ने सुशोभित करने वाले लोग पूर्ण प्रमाणिक पुरूषार्थ के साथ अपने कत्र्तव्य निर्वहन में लगे है। आज की सियासत को समझने वाली बात होना चाहिए। सत्ता सौपानों तक पहुंचे या बाहर बैठे लोगों को समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति मानव जीवन में कभी सम्पूर्ण र्निविकार नहीं हो सकता। सिर्फ उस आदृश्य शक्ति के जिसे सृष्टि, सृजन का आधार माना जाता है।  अगर हम रामायाणकाल के दौर में जायें तो माता सीता का वन गमन और प्रभु राम का त्याग उस निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की मिशाल थी जिसने यह साबित किया कि वह जिस भी क्षेत्र या अवस्था में जिस पद के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में है उसमें किंचित मात्र एक भी सवाल नहीं होना चाहिए फिर कीमत कत्र्तव्य निर्वहन के मार्ग में जो भी हो। यहीं उम्मीद आज जब मानव समूह के ...

पुरूषार्थ की पराकाष्ठा..............तीरंदाज ? सत्ताओं के सेवा कल्याण और कोरोना के कहर से कांपी मानवता

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व्ही.एस.भुल्ले भैया- अब न तो अष्ठ वक्र जैसा कोई विद्ववान इस पुण्य भूमि पर है जो अपने पिता की उम्र के विद्ववान, पुरूषों की सभा में विद्ववानों को  शास्त्रार्थ में परास्त कर उन्हें क्षमादान का बडा संदेश दें, सच्चे विद्ववान होने का ज्ञान दे, न ही ब्रम्ह और ज्ञान-विज्ञान का सच्चा अर्थ बताने वाला रहा और न ही राजाजनक की भांति अष्ठ वक्र की विद्धवत्ता का कायल हो, सत्ता शासन में व्याप्त कुरूतियों को तत्काल खत्म करने का आदेश देने वाला शेष रहा। म्हारे को तो इस अदने-से कोरोना वायरस, जो मुंआ दिखता भी नहीं और मिठता भी नहीं। भाया मने तो यह कोई मायावी शक्ति लागे। काश म्हारे पास भी आज कोई मायावी शक्ति अचूक अस्त्र होता तो दिन, महीने, साल घण्टे नहीं कुछ सेकेण्डों में ही चारों-खाने चित पडा होता। मगर भाया इस महासंकट के बीच म्हारे त्याग-तपस्वी प्रदान सेवक और बाबा, बहिन को छोड म्हारी महान सत्ताओं का संघर्ष पुरूषार्थ की पराकाष्ठा केबिनों में बंद बैठ कुछ कम नहीं दिखती। जिनकी त्याग-तपस्या, जनसेवा, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सेवा कल्याण को देख कोरोना कहर से समूची मानवता कांप रही है। म्हारा बस चले तो सेव...

गंभीर हालात और सहज सवाल सार्थक समाधान में समझ बनती है मिशाल

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जिस तरह से विश्व भर में कोरोना का कहर बरपा है और जिस तरह से हमारा देश भी अब इसके शिकंजे की ओर बढ रहा है यह कोई साधारण बात नहीं। मगर कहते है कि समाधान सृष्टि में एक सहज समझ का आधार रहा है और यहीं समझ आज सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस, स्वच्छता के माध्यम से सार्थक हो सकती है। हो तो इससे पूर्व भी बेहतर हो सकता था मगर कहते है कि समय के आगे बडी-बडी समझ फैल हो जाती है। सील का तात्पर्य स्वयं को दूर रख बंद जैसे वातावरण में रखना सप्लाई का मतलब जीवन बगैर अवरूद्ध हुये चलना और सोशल डिस्टेंस का मतलब व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी स्वच्छता से तात्पर्य स्वयं को स्वच्छ रखते हुये हाथ धोना अशुद्ध वायु स्पर्श न करें इसके लिये मुंह को ढकना, अगर मौजूद संसाधनों के बीच ठीक से समझ बन पाये तो निश्चित ही कोरोना क्या किसी भी ऐसे महासंकट से निवटा जा सकता है। काश हमारे समझदार इस सत्य को समझ पाये तो मानव सभ्यता ही नहीं इस सृष्टि के प्रति उनका बडा योगदान होगा।  जय स्वराज

24 घण्टे भी न रह सका ग्रीन जाॅन व्यवस्था को लेकर उठे सवाल

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विलेज टाइम्स समाचार सेवा। म.प्र.। निश्चित ही 3 मई के बाद म.प्र. के कुछ खास जिलों को ग्रीन जाॅन का खिताब मिला ही था कि 24 घण्टे भी पूरे न हो सके और कोरोना संक्रमित निकल बैठा। कोरोना संक्रमित की आमद पर सवाल फिलहाल यक्ष है। देखना होगा कि प्रशासन की जांच और कोताही का सत्य कब सामने आता है। फिलहाल तो म.प्र. के शिवपुरी जिले में एक मरीज मिलने के बाद सन्नाटा खिच गया है।

स्वार्थी, अहम अहंकारी, महत्वकांक्षी सत्ताओं ने अनादिकाल से ही सृष्टि के अनमोल अंश मानव सभ्यता का बडा नुकसान किया है देव स्वरूप अमृत हासिल होने का मुगालता पालने वालों को समझना होगा कि यह सतयुग नहीं कलयुग है नैसर्गिक निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की अचूक अस्त्र

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व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है कि जब जबावदेह लोग कत्र्तव्य विमुख और सत्तायें स्वार्थी, अहम-अहंकारी, महत्वकांक्षी हो जाये तो विनाश सुनिश्चित होता है। बैसे भी अनादिकाल से स्वार्थी अहम-अहंकारी सत्ताओं ने सृष्टि की अनमोल धरोहर मानव सभ्यता का बडा नुकसान किया है। जिसका दंश कई पीढियां भोग आज तक अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माघ्यम से स्वयं को सक्षम, समृद्ध बनाती रही है। जिनकी आज हम पहचान है। रावण से लेकर कंस तक और कंस से लेकर दुर्योधन तक एक लम्बी चैडी फैरित हमारे सामने है तथा मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक की चर्चाऐं हमारे साक्षी है। इस बीच सिर्फ उन्हीं सत्ताओं को सराहा गया जिन्होंने सृष्टि, सृजन में सर्वकल्याण के भाव के साथ अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृष्टि, सृजन में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन किया। आज भी जब हम जिस मार्गदर्शी इतिहास का उल्लेख कर रहे है निश्चित ही वर्तमान हालातों के मद्देनजर इनका पूर्व की भांति कोई अर्थ नहीं। मगर एक उम्मीद अवश्य है कि सृजन में विश्वास रखने वाली सत्ता शासकों से। मगर वर्तमान हालातों के मद्देजनर कारण साफ है और जरा भी इंसानियत के प्र...

कत्र्तव्य आधारित दण्ड व्यवस्था अहम: मुख्य संयोजक स्वराजव्ही.एस.भुल्ले

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विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कोरोना के कहर के बीच जिस तरह से मानव सभ्यता कांप रही है। ऐसे में व्यवस्थाओं को लेकर उठते सवाल इस बात की ओर इंग्गित करते है कि मौजूद व्यवस्थाओं में दण्ड प्रक्रिया कत्र्तव्य आधारित हों। क्योंकि जिस तरह से आम नागरिक से उसके जाने-अनजाने में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन और कानून पालन की जबावदेही की अपेक्षा सत्ता गत व्यवस्थाओं, संस्थाओं को होती है। ठीक उसी प्रकार सत्ता और व्यवस्था में भी कत्र्तव्य आधारित दण्ड व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए।  देखा जाये तो व्यवहार में होता ये है कि व्यवस्थागत जिन लोगों का कत्र्तव्य होता है वह अधिकार बस अपने कत्र्तव्य भूल दूसरों को दण्ड देने में अधिक काबलियत समझते है। जबकि उनके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का खांका कोरा और कानूनन संरक्षित बना रहता है। अगर एक आम नागरिक से कत्र्तव्य निर्वहन की अपेक्षा सत्ता को अधिकार बस होती है तो फिर सत्ता, संस्थाओं में बैठे लोगों के कत्र्तव्य भी सुनिश्चित होना चाहिए। जिस तरह से चाहे बिजली, व्यापार, जीवोत्पार्जन, स्वच्छता से जुडे मामलों में या व्यवस्थागत सत्ताओं द्वारा निर्धारित नियम कानूनों के ...

म.प्र.ः दुकान खोलने नहीं तैयार शराब ठेकेदार कोरोना के कहर से, कांपी सरकार

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वीरेन्द्र शर्मा   विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कभी लगभग 12 हजार करोड से अधिक धन प्राप्ति का माध्यम रहा म.प्र. में शराब कारोबार फिलहाल संकट में पड गया है। एक ओर जहां शासन शराब ठेकेदारों पर बैठकों के माध्यम से यह दबाव बनाने में लगी है कि जो लोग शराब दुकानों के ठेके या रिन्युवल करा चुके है वह शासन निर्देषों के अनुसार दुकानें खोले, तो वहीं दूसरी ओर वर्ष भर ठेकों की निर्धारित राशि जमा करा चुके ठेकेदार एक माह कोरोना के कहर से बंद दुकानों के चलते होने वाले घाटे के मद्देनजर शराब दुकान खोलने तैयार नहीं है। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो म.प्र. के 32 ठेकेदार न्यायालय की शरण में जहां चुके है। अब जबकि केन्द्र सरकार की गाईड लाईन अनुसार म.प्र. सरकार कलेक्टरों के प्रस्ताव पर ग्रीन जाॅन में दुकानें स्थिति अनुसार खोल या नहीं खोल सकती है। ऐसे में ठेकेदारों की शराब दुकानो को खोलने को लेकर मनाही सरकार के सामने एक बडा संकट है। ज्ञात हो कि कोरोना का कहर फिलहाल इतनी जल्द खत्म होने वाला नहीं। ऐसे में कभी शराबबंदी करने की बात करने वाली सरकार क्या निर्णय लेगी यह तो वहीं जाने। मगर बगैर धरना प्रदर्शन और...

अमानत में खयानत को लेकर खौफजदा कोरोना से लडते लोग

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विलेज टाइम्स समाचार सेवा। भोपाल। जिस तरह से जरूरी संसाधनों के आभाव में कोरोना वोलंटियर या फिर घरों में बंद लोग संसाधनों के आभाव में कोरोना से लडने बैवस मजबूर है उन्हें देखकर नहीं लगता कि पहले से ही कत्र्तव्य विमुख सत्ता संस्थायें अपना पूर्व आचरण छोड मानव अस्तित्व के प्रति निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करना चाहती है। जिस तरह से बिना मास्क लगाये लोग विचरण करते दिख जाते है, तो वहीं बगैर पीपीई किट, हेंड गिलब्स, साधारण मास्क के साथ सेवायें देते नजर आते है उससे साफ हो जाता है कि कत्र्तव्य निष्ठा का पैमाना किस मुकाम पर है। अगर अपुष्ट खबरों की माने तो जिस तरह से म.प्र. में आयुर्वेदिक काडे के पैकेट बांटे जाने की खबरे और राहत सामग्री पहुंचाए जाने की खबरे हवा-हवाई है उन्हें देखकर नहीं लगता कि हमारी सत्ता, सरकारें कोरोना के कहर के बीच बहुत कुछ गंभीर है। देखना होगा कि आखिर कब और कैसे कत्र्तव्यनिष्ठा के भाव में सुधार की गुंजाइस नजर आती है। 

आर्थिक समृद्धि का जरिया बनता लाॅकडाउन 20 का बिन्डल 30 में तो 10 की पुडिया 40 में मिल रही है पसंद-नपसंद का सवाल ही नहीं

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विलेज टाइम्स समाचार सेवा। वाजिब दाम और उत्तम क्वालिटी की लालसा लें भरे बाजारों में खरीददारी करने वालों का आलम यह है कि लाॅकडाउन खुलती दुकानों से रोजमर्रा की खरीददारी के वक्त न तो वाजिब दाम का कोई पैमाना रहा और न ही क्वालिटी की पसंद-नपसंद का। मजे की बात तो यह है कि जिन बिन्डल, पुडिया के आदि को लोगों जो बिन्डल 20 का तो पुडिया 10 रूपये की मिलती थी उनकी कीमत क्रमशः 30 और 40 हो चुकी है। कारण चैपट व्यवस्था इतनी बडी मशीनरी समूचे संसाधन और कानून का डंडा होने के बावजूद बैवसी पर आर्थिक समृद्धि के महल खडा करने वालो का लाॅकडाउन में जो पुरूषार्थ बढा है वह थमने का नाम नहीं ले रहा। बैवस लोग एक ओर तो घरों में बैठ कोरोना से लड रहे है, तो दूसरी ओर पैसे के लिये आदमखोर हो चुके उन लोगों से लड रहे है तो तीसरी ओर सत्ताओं की अकर्मण्यता को निहारने पर मजबूर है।